नौकरी मिली तो सबने यही कहा।
पड़ोसी ने। चाय वाले ने। यहाँ तक कि सरपंच ने — जो आमतौर पर किसी बात को ज़्यादा तवज्जो नहीं देते।
सबने एक ही बात कही, जैसे रटी हुई हो —
“रात 12 के बाद अंदर कुछ मत देखना। और अगर किसी ने तुम्हें पुकारा — जवाब मत देना।”
मैं हँस पड़ा था। मन में सोचा — लोग बेवजह डराते हैं। कब्रिस्तान बस एक जगह है। मुर्दे सोते हैं, जागते नहीं।
लेकिन पहली ही रात — मुझे समझ आ गया।
यह जगह सिर्फ मरने वालों की नहीं थी।
कुछ और भी यहाँ जागता था।
— ✦ —
रात 11:45
टॉर्च जलाई। गेट बंद किया। ताले की चाबी जेब में डाली।
कब्रिस्तान उस वक्त वैसा ही था जैसा होना चाहिए — शांत, अंधेरा, खाली। पत्थर की कब्रें चाँद की हल्की रोशनी में धुंधली दिख रही थीं। हवा चल रही थी — लेकिन पत्ते नहीं हिल रहे थे।
यह पहली अजीब बात थी। हवा थी, लेकिन पत्ते जमे हुए थे।
और तभी — ठंडी हवा का एक झोंका मेरे कान के पास से गुज़रा। इतने पास कि लगा किसी ने फुसफुसाया —
“आ गया… नया चौकीदार…”
मैंने पलटकर देखा।
कोई नहीं।
सिर्फ कब्रें। सब शांत। सब चुप।
“दिमाग़ खराब हो रहा है,” मैंने खुद से कहा। “नई जगह है, रात है, दिमाग़ ऐसी चीज़ें बनाता है।”
मैं अपनी कुर्सी पर बैठ गया और चाय का थर्मस खोला।
घड़ी में 11:58 था।
— ✦ —
12 बजे
12 बजे — जैसे किसी ने स्विच पलटा।
हवा रुक गई। पूरी तरह। अचानक।
और फिर — रोने की आवाज़।
किसी औरत की। बहुत धीमी। इतनी धीमी कि पहले लगा सुनाई नहीं दिया — लेकिन थी। जैसे मिट्टी के अंदर से आ रही हो। जैसे कोई बहुत गहरे से साँस ले रहा हो और हर साँस में दर्द हो।
मैंने टॉर्च घुमाई।
कब्रें — सब वैसी ही। पत्थर। मिट्टी। नाम।
लेकिन तभी — पीछे से।
“इधर देखो।”
मैं जम गया।
आवाज़ इंसानी थी — लेकिन उसमें कुछ था जो इंसानी नहीं था। एक गहराई। एक खालीपन। जैसे किसी ने इंसान की आवाज़ की नकल की हो, लेकिन पूरी तरह नहीं।
मैंने हिम्मत जोड़ी। आवाज़ दी — “क… कौन है?”
जवाब नहीं आया।
लेकिन टॉर्च की रोशनी में मैंने देखा — एक कब्र की मिट्टी हिल रही थी।
धीरे-धीरे। नीचे से ऊपर की तरफ। जैसे कोई अंदर से हाथ चला रहा हो। जैसे कोई बाहर आना चाहता हो और मिट्टी उसे रोक नहीं पा रही।
मेरे हाथ काँप रहे थे। थर्मस नीचे गिर गया।
और उसी पल —
टॉर्च बुझ गई।
— ✦ —
अंधेरे में
अँधेरा।
पूरा। ठोस। वो किस्म का अँधेरा जो सिर्फ आँखों में नहीं होता — जिस्म में उतर जाता है।
और उसी अँधेरे में — बहुत पास से — किसी ने कहा:
“तुमने मना किया था न देखने को।”
न सामने से। न पीछे से। बगल से। एकदम पास।
मैं भागना चाहता था — पैर नहीं उठे। जैसे ज़मीन ने पकड़ लिया हो। जैसे कब्रिस्तान की मिट्टी ने फैसला कर लिया हो कि आज मैं यहाँ से नहीं जाऊँगा।
और तब — मेरी गर्दन के पास।
किसी ने साँस ली।
ठंडी। सड़ी हुई। वो गंध जो क़ब्रों के पास होती है — मिट्टी, नमी, और कुछ और जो बयान नहीं होता।
मैं चिल्लाना चाहता था। आवाज़ नहीं निकली।
और तब — टॉर्च जली।
अपने आप।
और उसकी रोशनी में जो मैंने देखा — उसके लिए कोई शब्द नहीं है।
मेरे सामने — मैं खड़ा था।
वही चेहरा। वही कपड़े। वही क़द।
लेकिन चेहरा — जैसे महीनों से मिट्टी में रहा हो। आँखों में रोशनी नहीं थी — मिट्टी भरी थी। होंठ फटे हुए। और फिर भी — वो बोला।
“अब तुम्हारी बारी है। इस कब्रिस्तान का चौकीदार बनने की।”
चीख निकल गई।
उसके बाद — कुछ याद नहीं।
सुबह गाँव वालों ने देखा।
कब्रिस्तान के गेट पर — वही कुर्सी। वही आदमी बैठा।
आँखें खुली थीं। लेकिन देख नहीं रहा था।
किसी ने पास जाकर कंधा हिलाया।
वो नहीं हिला।
और अंदर — कब्रिस्तान के सबसे नए हिस्से में — एक ताज़ी मिट्टी की क़ब्र।
पत्थर अभी नहीं लगा था — लेकिन नाम लिखा था।
पुराना चौकीदार
पहली और आखिरी रात
उस दिन से गाँव में नया नियम बना —
कब्रिस्तान में रात को चौकीदार नहीं रखा जाएगा।
लेकिन जो भी रात को उस गेट के पास से गुज़रता है —
कहता है कि वहाँ अभी भी एक आदमी बैठा दिखता है।
आँखें खुली। बिल्कुल शांत।
और कभी-कभी — वो मुड़कर देखता है।
