बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, और हॉस्टल के पुराने गलियारे में सन्नाटा इतना गहरा था कि मुझे अपनी धड़कनें साफ़ सुनाई दे रही थीं। घड़ी में रात के ठीक 2:15 बज रहे थे। प्यास से गला सूख रहा था, लेकिन बिस्तर से उठने की हिम्मत नहीं हो रही थी। तभी वो आवाज़ आई—’टप… टप… टप…’ जैसे कोई गीले पैरों से ठंडे फर्श पर चल रहा हो। आवाज़ उसी दिशा से आ रही थी… उसी पुराने बाथरूम की तरफ से जिसे पिछले 10 सालों से जंग लगे ताले के पीछे कैद कर दिया गया था।
लोग कहते थे कि सेंट जेवियर्स हॉस्टल का विंग-सी शापित है, खासकर वो कोना जहाँ बाथरूम का चौथा स्टॉल है। मेरा रूम पार्टनर समीर पिछले तीन दिनों से लापता था। पुलिस ने इसे महज़ एक गायब होने का मामला माना था, लेकिन मैं जानता था कि समीर ने उस रात कुछ ऐसा देखा था जिसे देखना मना था।
वो बंद दरवाज़ा
मैंने हिम्मत जुटाई और मोबाइल की टॉर्च जलाई। गलियारे की पीली रोशनी बार-बार झपक रही थी, जैसे कोई अदृश्य ताकत बिजली के तारों से खेल रही हो। बाथरूम के करीब पहुँचते ही हवा में एक अजीब सी सड़न महसूस हुई—पुरानी लकड़ी और काई की मिली-जुली महक।
जैसे ही मैंने बाथरूम के दरवाजे को धक्का दिया, वो एक कराह के साथ खुल गया। सामने चार स्टॉल थे। पहले तीन खुले थे, लेकिन चौथा स्टॉल… वही पुराना, काला पड़ चुका लकड़ी का दरवाज़ा, आज खुला हुआ था।
मेरे हाथ कांपने लगे। ‘समीर? क्या तुम वहाँ हो?’ मेरी आवाज़ दीवारों से टकराकर वापस लौट आई। कोई जवाब नहीं मिला, बस उस बंद स्टॉल के अंदर से किसी के धीरे-धीरे रोने की आवाज़ आने लगी। वो आवाज़ किसी इंसान की नहीं लग रही थी, उसमें एक ऐसी गहराई थी जो सीधे कलेजे को चीर रही थी।
आवाज़ जो सुनाई नहीं देनी चाहिए थी
जैसे-जैसे मैं उस चौथे स्टॉल की ओर बढ़ा, तापमान गिरने लगा। मेरी सांसें सफेद धुएं की तरह हवा में जम रही थीं। तभी अचानक स्टॉल के नीचे से लाल रंग का कुछ बहकर बाहर आने लगा। पानी? नहीं, वो खून था। गाढ़ा और काला पड़ता हुआ खून।
‘आर्यन… भाग यहाँ से…’
एक दबी हुई आवाज़ मेरे कान के बिल्कुल पास गूंजी। मैं उछल पड़ा। पीछे मुड़कर देखा तो कोई नहीं था। लेकिन जब वापस स्टॉल की तरफ देखा, तो दरवाज़े पर खून से सनी उंगलियों के निशान बन रहे थे। जैसे कोई अंदर से बाहर निकलने के लिए दीवारें खुरच रहा हो।
मेरा दिल किसी नगाड़े की तरह बज रहा था। भागने का ख्याल आया, लेकिन तभी मुझे स्टॉल के अंदर समीर की घड़ी चमकती हुई दिखाई दी। वही घड़ी जो उसके पिता ने उसे आखिरी जन्मदिन पर दी थी। क्या समीर अंदर है? क्या वो मुसीबत में है?
अतीत का खौफनाक पन्ना
तभी मुझे याद आई वो कहानी जो वार्डन ने एक बार नशे में सुनाई थी। 10 साल पहले, राहुल नाम के एक छात्र को उसके सीनियर्स ने इसी बाथरूम में रात भर बंद रखा था। रैगिंग इतनी क्रूर थी कि उन्होंने उसे चौथे स्टॉल में बांधकर छोड़ दिया और बाहर से ताला लगा दिया। अगले दिन जब सफाई कर्मचारी आया, तो उसे राहुल की लाश मिली। उसकी उंगलियाँ घिसकर आधी रह गई थीं, क्योंकि वो रात भर दरवाज़ा पीटता रहा था।
कहा जाता है कि राहुल की रूह आज भी इंसाफ ढूंढ रही है। और आज, शायद वो समीर को अपना गवाह बना चुकी थी।
‘आर्यन… मुझे बचाओ…’ इस बार आवाज़ समीर की थी, जो स्टॉल के ठीक अंदर से आ रही थी।
बिना सोचे-समझे, मैंने उस पुराने लकड़ी के दरवाज़े पर लात मारी। दरवाज़ा चरमराकर खुला और जो नज़ारा सामने था, उसने मेरी चीख गले में ही दबा दी। समीर वहां नहीं था। वहां कोई नहीं था। सिर्फ एक टूटा हुआ शीशा था, और उस शीशे में मेरा अक्स नहीं, बल्कि राहुल खड़ा था। उसका चेहरा नीला पड़ चुका था, गर्दन एक तरफ झुकी हुई थी, और उसकी आँखों की जगह सिर्फ दो गहरे काले गड्ढे थे।
आखिरी सचाई
राहुल ने अपना हाथ शीशे से बाहर निकाला। वो बर्फीला हाथ सीधा मेरे गले की तरफ बढ़ा। मैं पीछे हटा, लेकिन फर्श पर मौजूद उस खून ने मेरे पैर फिसल दिए। मैं नीचे गिरा और मेरा सिर सिंक के कोने से टकराया। आँखों के सामने धुंधलापन छाने लगा।
मरते-मरते मैंने देखा कि बाथरूम की दीवारों पर हज़ारों उंगलियों के निशान उभर आए थे। वो सब वो लोग थे जो पिछले 10 सालों में इस हॉस्टल से गायब हुए थे। समीर भी उनमें से एक था। उसकी रूह अब उस दीवार का हिस्सा बन चुकी थी।
‘अब तुम्हारी बारी है,’ एक गूँजती हुई आवाज़ मेरे दिमाग में धमाका कर गई।
सुबह जब वार्डन ने बाथरूम खोला, तो वहां सब कुछ सामान्य था। कोई खून नहीं, कोई सड़न नहीं। बस चौथे स्टॉल का दरवाज़ा हल्का सा खुला था। वहां सिर्फ दो चीजें पड़ी थीं—समीर की घड़ी और मेरा मोबाइल।
आज भी, जब हॉस्टल में कोई नया लड़का आता है, उसे हिदायत दी जाती है कि रात 2 बजे के बाद विंग-सी के बाथरूम में मत जाना। क्योंकि राहुल को अब सिर्फ गवाह नहीं, बल्कि साथी चाहिए। और अगर आप ध्यान से सुनें, तो आज भी उस बंद बाथरूम से दो लोगों के फुसफुसाने की आवाज़ आती है… शायद दूसरा मैं हूँ।
