पहले दिन जब मैंने उस कुएँ को देखा — लगा बस एक पुरानी, सूखी जगह है। पत्थर टूटे हुए, चारों तरफ मिट्टी, कोई खास बात नहीं।
लेकिन रात होते ही — वही कुआँ मुझे देखने लगा।
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भीमरपुर में पहली बार आया था। नाना का गाँव। शहर से इतना दूर कि रास्ते में नेटवर्क कब गया, पता ही नहीं चला।
गाँव जितना शांत था — उतना ही अजीब भी। एक खामोशी जो सुकून नहीं देती, बल्कि कुछ छिपाती है।
पहली रात दादी ने बुलाया। हाथ पकड़ा। और धीरे से कहा —
“रात के बाद घर से बाहर मत निकलना। और उस पुराने कुएँ के पास — बिल्कुल नहीं।”
मैंने हँसकर पूछा — “कुएँ में ऐसा क्या है?”
उन्होंने मेरी आँखों में देखा। एक पल रुकीं।
“वहाँ कोई रहता है।”
आवाज़ में डर नहीं था। यकीन था। और यकीन डर से ज़्यादा डरावना होता है।
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कुआँ
अगले दिन जिज्ञासा मुझे वहाँ खींच ले गई।
गाँव के बीचोंबीच। टूटा-फूटा पत्थर का कुआँ। चारों तरफ सूखे पेड़ — जैसे उन्होंने बरसों से पानी नहीं पिया हो। और एक ठंडक जो मौसम से नहीं, किसी और चीज़ से आती थी।
मैंने अंदर झाँका।
गहराई इतनी थी कि नीचे का अंधेरा ठोस लगता था। जैसे कुआँ नहीं — एक गड्ढा हो जो कहीं खत्म नहीं होता।
तभी पीछे से आवाज़ आई — “वहाँ मत देखो।”
मैं पलटा। एक बूढ़ा आदमी खड़ा था। झुकी कमर, गहरी आँखें — जिनमें वो भाव था जो सालों की बातें देख चुके हों।
“इस कुएँ में जो देखता है…” उसने कहा, “वो फिर कभी पहले जैसा नहीं रहता।”
वो मुड़ा और चला गया। बिना कुछ और बोले।
मैं खड़ा रहा। कुएँ और मेरे बीच एक अजीब-सा रिश्ता बन रहा था — जैसे वो मुझे जानता हो। जैसे मेरा आना तय था।
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रात के दो बजे
उस रात नींद नहीं आई।
करवटें बदलता रहा। छत देखता रहा। बाहर गाँव की खामोशी थी — वो किस्म की खामोशी जिसमें छोटी-छोटी आवाज़ें और बड़ी लगती हैं।
करीब दो बजे — कुछ सुनाई दिया।
बहुत धीरे। बहुत दूर से। लेकिन साफ़।
“आओ… नीचे आओ…”
कुएँ की दिशा से।
मैंने खुद को रोकने की कोशिश की। बिस्तर पकड़ा। आँखें बंद कीं। लेकिन पैर उठ गए। जैसे शरीर ने फैसला कर लिया हो और दिमाग़ को बताने की ज़रूरत न हो।
धीरे-धीरे — मैं बाहर था। रात की ठंडी हवा। खाली गलियाँ। और वो कुआँ — जो अंधेरे में भी दिख रहा था, जैसे खुद रोशन हो।
पास पहुँचा तो हवा और ठंडी हो गई। और अंदर से —
“तुम आ गए… आखिर तुम भी आ गए…”
जैसे इंतज़ार था। जैसे पता था।
मैंने झाँका।
नीचे पानी नहीं था।
एक लड़की खड़ी थी।
आँखें पूरी काली। चेहरा उस सफेदी से भरा जो ज़िंदगी के बाद आती है। और होंठों पर — एक हल्की मुस्कान। वो किस्म की जो किसी खुशी से नहीं, किसी इंतज़ार के खत्म होने से आती है।
“मुझे बाहर निकालो।”
मेरे पैर पीछे हटना चाहते थे। लेकिन हटे नहीं।
“सब मुझे छोड़कर चले गए…” उसने कहा। और आवाज़ अब सिर्फ कानों से नहीं — दिमाग़ के अंदर से आ रही थी। “तुम भी जाओगे?”
और तभी —
पीछे से किसी ने धक्का दिया।
ज़ोर से। अचानक।
मैं कुएँ में गिरा।
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नीचे
गिरना बंद हुआ।
मैं ज़मीन पर था। चोट नहीं लगी — जो अपने आप में अजीब था। कुएँ के अंदर। लेकिन ज़िंदा।
और सामने — वही लड़की। अब वो मुस्कुरा नहीं रही थी।
“अब तुम भी यहीं रहोगे।”
“मुझे बाहर जाना है!” मैंने चिल्लाया — और आवाज़ उस गहरे अंधेरे में कहीं खो गई।
वो हँसी। हल्के से।
“सब यही कहते हैं। कोई जाता नहीं।”
तब मैंने देखा — मैं अकेला नहीं था।
चारों तरफ — और लोग। कुछ दीवार से सटे बैठे थे, घुटने छाती से लगाए। कुछ खड़े थे — आँखें ऊपर, उस छोटे होते गोले की तरफ जो आसमान था। सबके चेहरे पर एक ही भाव — वो भाव जो तब आता है जब उम्मीद जाती नहीं, बस धुंधली होती जाती है।
मैंने ऊपर देखा।
कुएँ का मुँह — छोटा हो रहा था। धीरे-धीरे। जैसे कोई ऊपर से बंद कर रहा हो।
मैंने पूरी ताकत से चिल्लाया — “बचाओ!”
आवाज़ गई। लेकिन ऊपर कोई नहीं था।
और तब — किसी ने मेरे कान में फुसफुसाया।
इतने पास कि साँस महसूस हुई।
“अगर बचना है… तो किसी और को नीचे लाना होगा।”
मैं जम गया।
यही। यही था।
जिसने मुझे धक्का दिया — वो भी यहीं था। किसी और ने उसे धक्का दिया होगा। और उससे पहले किसी और ने। यह कुआँ खुद नहीं भरता — लोग एक-दूसरे को खींचते हैं। एक के बाद एक। पीढ़ी दर पीढ़ी।
मैंने उस लड़की की तरफ देखा।
वो मुस्कुरा रही थी।
“अब तुम्हारी बारी है।”
अगली सुबह।
गाँव वाले उस कुएँ के पास जमा थे।
एक नया लड़का — शहर से आया, उत्सुक, अनजान — कुएँ के अंदर झाँक रहा था।
और पीछे खड़ा था — मैं।
मैंने धीरे से कहा —
“वहाँ मत देखो।”
उसने पलटकर देखा।
मुझे देखा।
मुस्कुराया।
और फिर — फिर भी झाँका।
क्योंकि जिज्ञासा हमेशा जीतती है।
हमेशा।
