बारिश उस दिन बहुत धीमी थी।
वो किस्म की बारिश जो शोर नहीं करती — बस खिड़की के शीशे पर हल्के-हल्के दस्तक देती रहती है। जैसे कुछ पूछना हो, पर हिम्मत न हो।
रिया अपने पुराने घर के आँगन में बैठी थी। वो घर जिसके हर कोने में उसकी ज़िंदगी के किसी न किसी टुकड़े की खुशबू थी। वो खिड़की जहाँ वो बचपन में बैठकर बारिश गिनती थी। वो दीवार जिस पर अभी भी उसकी ऊँचाई के निशान थे।
तभी — दरवाज़े पर दस्तक।
“चिट्ठी है आपके नाम।”
रिया उठी। डाकिया था। हाथ में एक पीला-सा लिफाफा।
आज के ज़माने में चिट्ठी। हाथ से लिखी। उसके नाम पर।
उसने लिफाफा लिया — और एक पल के लिए उसकी साँस रुकी।
लिखावट।
वो लिखावट जिसे वो कहीं भी, किसी भी भीड़ में पहचान लेती। वो लिखावट जो उसने 20 साल से नहीं देखी थी — लेकिन कभी भूली भी नहीं थी।
अमन।
वो नाम जो उसने ज़िंदगी से मिटाने की कोशिश की थी। या शायद — कभी मिटा ही नहीं पाई थी।
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चिट्ठी
काँपते हाथों से उसने लिफाफा खोला। काग़ज़ पुराना था — जैसे बरसों से किसी दराज़ में रखा हो। लेकिन स्याही साफ़ थी। हर शब्द जैसे बहुत सोच-समझकर लिखा गया हो।
प्रिय रिया,
अगर ये चिट्ठी तुम तक पहुँची है, तो समझो मैंने अपनी आखिरी कोशिश कर ली है।
मुझे नहीं पता तुम अब कहाँ हो, कैसी हो। पर मैं आज भी वहीं खड़ा हूँ, जहाँ तुम मुझे छोड़कर गई थी।
उस दिन स्टेशन पर मैं तुम्हारा इंतज़ार करता रहा। घंटों। फिर दिनों। फिर — सालों तक।
मैंने बहुत ढूंढा तुम्हें। पर तुम कहीं नहीं मिली। हर साल तुम्हारे जन्मदिन पर मैं एक चिट्ठी लिखता रहा — उम्मीद थी कि कभी न कभी पहुँच जाएगी।
आज डॉक्टर ने कहा है कि मेरे पास ज़्यादा वक्त नहीं है।
शायद यही आखिरी चिट्ठी है।
अगर कभी ये तुम्हें मिले — तो बस एक बार उस पुराने स्टेशन पर आ जाना। मैं आज भी हर शाम वहाँ बैठता हूँ। उसी बेंच पर।
— अमन
रिया पढ़ती रही।
एक बार। फिर दूसरी बार। जैसे शब्द पहली बार में पूरे उतरे न हों।
20 साल। हर साल एक चिट्ठी। उसके जन्मदिन पर।
और वो — ज़िंदगी जीती रही, बेखबर।
उसकी आँखों में आँसू थे — लेकिन रोई नहीं। उस वक्त रोना नहीं आता जब दर्द बहुत गहरा हो। वो बस जम जाता है — छाती में कहीं।
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20 साल पहले
दिमाग़ में वो दिन घूम गया।
बारिश थी। स्टेशन था। और अमन — प्लेटफॉर्म पर खड़ा, घड़ी देखता हुआ, हर आती ट्रेन की तरफ उम्मीद से देखता हुआ।
लेकिन रिया नहीं आई थी।
इसलिए नहीं कि वो नहीं आना चाहती थी।
बल्कि इसलिए — उसके पिता ने उस सुबह ही उसे किसी दूर के शहर में भेज दिया था। कोई बात नहीं, कोई समझाइश नहीं — बस एक फ़ैसला, जो उसकी ज़िंदगी बदल गया।
उसने अमन को बताने की कोशिश की थी। लेकिन उस ज़माने में फोन नहीं थे। चिट्ठी भेजी — लेकिन पता नहीं पहुँची या नहीं।
और धीरे-धीरे — ज़िंदगी आगे चली गई। जैसे चलती है। जैसे चलनी पड़ती है।
लेकिन वो बेंच। वो स्टेशन। वो बारिश — कभी पूरी तरह गई नहीं।
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स्टेशन
रिया ने बैग उठाया।
बिना सोचे। बिना किसी से पूछे। जैसे 20 साल से यही करना था — बस वक्त आने का इंतज़ार था।
बाहर बारिश तेज़ हो गई थी।
वो भीगती रही। हर कदम के साथ दिल में एक डर — अगर वो न हो? अगर बहुत देर हो गई हो?
और एक उम्मीद — अगर हो। अगर अभी भी वहीं हो।
स्टेशन आया।
सब कुछ बदल गया था — नई इमारत, नए प्लेटफॉर्म, नई भीड़।
लेकिन एक चीज़ नहीं बदली थी।
वो बेंच।
कोने में। छत के नीचे। जहाँ बारिश नहीं पहुँचती।
और उस बेंच पर — एक बुज़ुर्ग आदमी। सिर झुकाए। हाथ घुटनों पर।
रिया के पैर रुक गए।
फिर धीरे-धीरे — आगे बढ़े।
“अमन…?”
आवाज़ में 20 साल का वज़न था।
उस आदमी ने सिर उठाया।
चेहरे पर झुर्रियाँ थीं। बाल सफ़ेद थे। वक्त ने अपना काम किया था।
लेकिन आँखें — वही थीं। वही गहराई। वही पहचान। जैसे कुछ चीज़ें वक्त नहीं बदल पाता।
उसके होंठों पर एक हल्की मुस्कान आई।
“मुझे पता था… तुम आओगी।”
रिया फूट पड़ी।
“मुझे माफ़ कर दो — मैं नहीं आ पाई थी — मुझे जाने नहीं दिया गया — मैंने कोशिश की थी—”
शब्द आँसुओं में घुल गए।
अमन ने धीरे से उसका हाथ थामा।
ठंडे हाथ। लेकिन मज़बूत पकड़।
“कोई बात नहीं, रिया। इंतज़ार का भी अपना मज़ा होता है। और देखो — तुम आ गई ना।”
बारिश अब भी हो रही थी।
लेकिन वो पहले जैसी नहीं थी।
पहले वो दूरी की बारिश थी — जो दो लोगों के बीच गिरती थी।
अब — मिलन की।
20 साल।
20 चिट्ठियाँ।
और एक बेंच — जो इंतज़ार करती रही।
कुछ प्यार वक्त से नहीं डरते।
कुछ इंतज़ार — टूटते नहीं, बस पकते हैं।
और कुछ बारिशें — दर्द नहीं देतीं,
बस याद दिलाती हैं कि तुम अकेले नहीं थे।