कहते हैं कि आदमी के दिल का रास्ता उसके पेट से होकर जाता है, लेकिन मेरे मामले में वो रास्ता सीधा अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड की तरफ मुड़ गया था। मेरा नाम है पप्पू, और मेरी कहानी उन लोगों के लिए एक चेतावनी है जो यूट्यूब पर दो मिनट का वीडियो देखकर खुद को संजीव कपूर का उत्तराधिकारी समझने लगते हैं।
बात उस दिन की है जब मेरी होने वाली ससुराल वाले पहली बार हमारे घर लंच पर आने वाले थे। मेरी माँ ने साफ़ कह दिया था, ‘पप्पू, तू बस ड्राइंग रूम में बैठकर बातें करना, रसोई की तरफ मुड़कर भी मत देखना।’ लेकिन मेरे अंदर का सोया हुआ ‘मास्टरशेफ’ जाग चुका था। मैंने सोचा कि अगर मैं अपने हाथों से बना ‘शाही पनीर’ उन्हें खिलाऊंगा, तो ससुर जी पिघल जाएंगे और शायद शादी में दहेज में कार की जगह पूरा शोरूम ही दे दें।
मैंने माँ को किसी तरह मंदिर भेज दिया और अपनी छोटी बहन रिंकी को पांच सौ रुपये की रिश्वत देकर चुप करा दिया। अब किचन मेरा था, और मैं उस साम्राज्य का अकेला सम्राट। मैंने सफ़ेद एप्रन पहना, सिर पर एक तौलिया लपेटा (शेफ वाली टोपी का एहसास देने के लिए) और यूट्यूब खोला। वीडियो का टाइटल था—‘बिना मेहनत के ढाबा स्टाइल शाही पनीर’। मुझे लगा, ‘बिना मेहनत’ वाला शब्द तो सीधे मेरे लिए ही बना है।
सबसे पहले बारी थी प्याज और टमाटर काटने की। वीडियो वाले शेफ ने तो ऐसे चाकू चलाया जैसे कोई जादुई छड़ी हो। मैंने भी स्टाइल मारने के चक्कर में अपनी उंगली का नाखून थोड़ा सा ट्रिम कर लिया। रिंकी हॉल से चिल्लाई, ‘भैया, खून?’ मैंने बहादुरी से कहा, ‘ये खून नहीं है पगली, ये तो कला के प्रति मेरा समर्पण है!’ खैर, बैंडेज लगाकर मैं फिर मैदान में उतरा।
प्याज काटते वक्त मेरी आंखों से इतने आंसू निकल रहे थे जैसे मैं अपनी ही शादी की विदाई में रो रहा हूं। प्याज कटे नहीं, बल्कि कुचले गए। अब बारी थी मसालों की। यूट्यूब वाले भाई साहब ने कहा, ‘स्वाद अनुसार नमक डालें।’ ये ‘स्वाद अनुसार’ दुनिया का सबसे बड़ा धोखा है। मुझे लगा कि शाही पनीर है, तो स्वाद भी शाही होना चाहिए, इसलिए मैंने तीन बड़े चम्मच नमक झोंक दिया।
अगला कदम था पनीर को तलना। वीडियो में पनीर के टुकड़े सुनहरे हो रहे थे, लेकिन मेरे पैन में जाते ही उन्होंने आपस में चिपक कर एक गुट बना लिया। मैंने उन्हें छुड़ाने की कोशिश की, तो पनीर के छोटे-छोटे टुकड़े बिखर गए। अब वो पनीर नहीं, बल्कि फटे हुए दूध का अवशेष लग रहा था। मैंने सोचा, कोई बात नहीं, ग्रेवी में सब छिप जाएगा।
असली तमाशा तब शुरू हुआ जब मैंने मिक्सी चलाई। गरम-गरम प्याज और टमाटर का पेस्ट मैंने बिना ठंडा किए मिक्सी में डाल दिया। जैसे ही बटन दबाया, एक धमाका हुआ। मिक्सी का ढक्कन सीधे छत से टकराया और पूरी रसोई की दीवारों पर लाल-पीले धब्बे ऐसे फैल गए जैसे किसी ने होली खेली हो। मेरी शक्ल किसी हॉरर फिल्म के भूत जैसी हो गई थी। रिंकी किचन के दरवाजे पर आकर जोर-जोर से हंसने लगी। मैंने गुस्से में कहा, ‘हंस मत, ये मॉडर्न आर्ट है!’
दीवारें साफ़ करने का वक्त नहीं था, क्योंकि ससुर जी के आने में सिर्फ आधा घंटा बचा था। मैंने जैसे-तैसे उस पेस्ट को कड़ाही में डाला। तभी मुझे याद आया कि शाही पनीर में तो मलाई या क्रीम भी डलती है। फ्रिज खोला तो मलाई नदारद थी। रिंकी ने सुझाव दिया, ‘भैया, दही डाल दो, सफ़ेद ही तो होता है।’ मैंने सोचा बात तो सही है। मैंने फ्रिज में रखा एक डब्बा निकाला और आधा डब्बा कड़ाही में उलट दिया।
जैसे ही मैंने उसे चलाया, एक अजीब सी खुशबू आने लगी। न तो वो पनीर की थी, न सब्जी की। मैंने डब्बा चेक किया—हे भगवान! वो दही नहीं, रिंकी का फेस मास्क वाला मुल्तानी मिट्टी और पुदीने का पेस्ट था जो उसने कल ही बनाया था। मेरी रूह कांप गई। लेकिन मेरा आत्मविश्वास देखिए, मैंने सोचा कि पुदीना तो वैसे भी खाने में डलता है, मुल्तानी मिट्टी से पेट साफ हो जाएगा। मैंने उसमें थोड़ा और पानी और ढेर सारा लाल मिर्च पाउडर डाल दिया ताकि रंग बदल जाए।
अब बारी थी प्रेशर कुकर में चावल बनाने की। मैंने चावल डाले, पानी डाला और ढक्कन बंद कर दिया। उधर दरवाजे की घंटी बजी। ससुर जी, सास जी और मेरी मंगेतर पिंकी आ चुके थे। मैं पसीना पोंछते हुए बाहर गया। ससुर जी ने पूछा, ‘बेटा पप्पू, क्या खुशबू आ रही है!’ मैंने मन ही मन सोचा, ‘अंकल, ये खुशबू नहीं, आने वाले तूफान की आहट है।’
हम सब बैठकर बातें कर रहे थे कि अचानक किचन से एक ऐसी आवाज आई जैसे कोई रॉकेट लॉन्च हो रहा हो। कुकर की सीटी नहीं बजी, बल्कि कुकर खुद हवा में उड़कर सीधे सिंक में जा गिरा और चारों तरफ भाप ही भाप फैल गई। ससुर जी घबराकर खड़े हो गए, ‘भूकंप आया क्या?’ मैंने मुस्कुराकर कहा, ‘नहीं-नहीं, वो बस दाल को तड़का लग रहा है, थोड़ा हाई-टेक तरीका है हमारा।’
किसी तरह मैं उन्हें डाइनिंग टेबल तक लाया। मैंने अपनी वो ‘शाही पनीर’ वाली डिश परोसी। दिखने में वो किसी दलदल जैसी लग रही थी जिसमें पनीर के टुकड़े डूबकर अपनी जान बचा रहे थे। ससुर जी ने पहला निवाला लिया। उनकी आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने धीरे से कहा, ‘बेटा, इसमें क्या डाला है?’
मैंने गर्व से कहा, ‘ये मेरा सीक्रेट मसाला है अंकल।’
ससुर जी बोले, ‘बेटा, सीक्रेट ही रहने देते तो बेहतर था। मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं किसी कंस्ट्रक्शन साइट का मसाला खा रहा हूं।’ सास जी ने चखा और तुरंत पानी का जग खाली कर दिया। पिंकी ने तो डिश को हाथ भी नहीं लगाया, वो बस मुझे ऐसे देख रही थी जैसे मैं कोई दूसरा ग्रह का प्राणी हूं।
तभी रिंकी ने राज खोल दिया, ‘पापा, भैया ने इसमें मुल्तानी मिट्टी मिलाई है!’ ससुर जी का चेहरा देखने लायक था। उन्होंने अपना चश्मा उतारा और बोले, ‘बेटा पप्पू, शादी के बाद चेहरा चमकाने के लिए मुल्तानी मिट्टी सुनी थी, पेट चमकाने के लिए पहली बार देख रहा हूं।’
माहौल गंभीर हो गया था। मुझे लगा अब तो शादी पक्का टूटेगी। तभी मेरी माँ मंदिर से वापस आ गई। किचन की हालत देखकर उन्होंने अपना सिर पकड़ लिया। दीवारों पर ग्रेवी, छत पर चावल और सिंक में पड़ा टेढ़ा-मेढ़ा कुकर। माँ ने ससुर जी से माफ़ी मांगी और तुरंत पड़ोस के रेस्टोरेंट से खाना मंगवाया।
खाना खाते समय ससुर जी थोड़े शांत हुए। उन्होंने हंसते हुए कहा, ‘चलो, कम से कम पप्पू ने कोशिश तो की। वैसे पप्पू, एक बात बताओ, अगर मैं तुम्हें अपनी बेटी दे दूं, तो क्या तुम उसे भी यही मुल्तानी मिट्टी वाला पनीर खिलाओगे?’
सब हंसने लगे। मेरी जान में जान आई। उस दिन के बाद से मैंने कसम खा ली कि रसोई में कदम तभी रखूंगा जब मुझे पानी पीना हो। आज भी जब घर में शाही पनीर बनता है, तो रिंकी धीरे से पूछती है, ‘भैया, मुल्तानी मिट्टी लाऊं क्या?’ और मैं बस मुस्कुराकर अपना चेहरा छिपा लेता हूं।
सीख: यूट्यूब के शेफ और असल जिंदगी के रसोइए में उतना ही फर्क है जितना एक साइकिल और हवाई जहाज में। कुकिंग एक कला है, और मैं उस कला का सबसे बड़ा दुश्मन!
