माया देवी और शांति निवास का कॉमेडी सर्कस

Team Maunam
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रमेश बाबू के लिए ‘शांति निवास’ का नाम ही एक सबसे बड़ी विडंबना बन चुका था। जब उन्होंने तीन महीने पहले इस अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर 402 में कदम रखा था, तो उन्हें लगा था कि नाम के अनुरूप यहाँ का वातावरण उनके आईटी के भारी-भरकम काम के लिए एकदम शांत और सुकून भरा होगा। लेकिन उन्हें क्या पता था कि फ्लैट नंबर 401 की दीवार के उस पार माया देवी रहती हैं, जो खुद में एक चलता-फिरता और कभी न खत्म होने वाला कॉमेडी सर्कस थीं। माया देवी, उम्र साठ के करीब, लेकिन ऊर्जा ऐसी कि किसी बीस साल के एथलीट को भी मात दे दें। उनका पहला परिचय रमेश को तब हुआ जब उन्होंने देखा कि माया जी अपनी बालकनी में खड़ी होकर एक छाते को धूप खिला रही थीं।

जी हाँ, छाता खुला था और वह उसे बड़े प्यार से सहला रही थीं जैसे वह कोई पालतू कुत्ता हो। जब रमेश ने पहली बार झिझकते हुए पूछा, “आंटी, यह क्या कर रही हैं? धूप तो ठीक है, पर छाते को ऐसे सहला क्यों रही हैं?” तो उन्होंने बड़ी संजीदगी से जवाब दिया, “बेटा, कल रात यह छाता एक डरावने सपने में बहुत भीग गया था, बेचारा डर से कांप रहा है, इसे सुखाना और पुचकारना ज़रूरी है।” रमेश का मुँह खुला का खुला रह गया। उसने सोचा शायद बढ़ती उम्र का असर है, पर यह तो बस शुरुआत थी।

अगले हफ्ते की बात है, रमेश अपने ऑफिस की एक महत्वपूर्ण ज़ूम मीटिंग में व्यस्त थे। अचानक उनके दरवाज़े पर ज़ोर-ज़ोर से दस्तक हुई। रमेश ने झुंझलाकर दरवाज़ा खोला तो सामने माया देवी खड़ी थीं, उनके हाथ में एक वैक्यूम क्लीनर था और चेहरे पर गोताखोरी करने वाला स्नॉर्कल मास्क लगा हुआ था। रमेश को लगा शायद कोई गैस लीक हो गई है या आग लग गई है।

उन्होंने घबराकर पूछा, “आंटी! क्या हुआ? आप यह मास्क पहनकर क्यों खड़ी हैं?” माया देवी ने मास्क के अंदर से ही दबी हुई आवाज़ में कहा, “बेटा, तुम्हारे घर से ‘डिजिटल धूल’ आ रही है। मेरा वैक्यूम क्लीनर उसे पकड़ नहीं पा रहा, इसलिए मुझे यह विशेष मास्क पहनना पड़ा ताकि मैं सांस ले सकूँ। क्या मैं तुम्हारे वाई-फाई राउटर के पास झाड़ू लगा सकती हूँ?” रमेश ने अपना सिर पकड़ लिया। उन्होंने बड़ी मुश्किल से उन्हें समझाया कि वाई-फाई से कोई भौतिक धूल नहीं निकलती, लेकिन माया देवी मानने को तैयार नहीं थीं। उनका तर्क था कि अगर डेटा हवा में तैर सकता है, तो धूल क्यों नहीं?

जैसे-जैसे दिन बीतते गए, माया देवी की हरकतें और भी अजीब होती गईं। एक दिन रमेश ने देखा कि वह अपनी गैलरी में खड़ी होकर अपने फ्रिज को योगा सिखा रही थीं।

उन्होंने फ्रिज का दरवाज़ा खोल रखा था और उसके सामने बैठकर ‘शीतली प्राणायाम’ कर रही थीं। उन्होंने रमेश को देखते ही कहा, “बेटा, यह बेचारा दिन-भर अंदर की चीज़ों को ठंडा रखने के चक्कर में खुद बहुत गर्म हो जाता है, इसे थोड़ा मानसिक सुकून चाहिए।” रमेश ने चुपचाप अपना दरवाज़ा बंद कर लिया। अब तक उन्हें समझ आ गया था कि माया देवी से तर्क करना भैंस के आगे बीन बजाने जैसा है।

रहस्य तब और गहरा गया जब रमेश के दोस्त सुरेश ने माया देवी को रात के दो बजे अपनी कार के पास मोमबत्ती जलाकर आरती करते देखा। सुरेश ने रमेश को फोन किया, “भाई, तेरी पड़ोसन कोई तांत्रिक तो नहीं है? मेरी कार की आरती उतार रही थी और कह रही थी कि लोहा भी जब थक जाता है तो उसे शांति की ज़रूरत होती है।” रमेश और सुरेश ने मिलकर तय किया कि वे माया देवी की इन अजीब हरकतों के पीछे का असली कारण पता लगाएंगे।

क्या वह सच में पागल थीं, या फिर उनके पीछे कोई गहरा रहस्य छिपा था? सुरेश ने मज़ाक में कहा, “हो सकता है वह किसी दूसरे ग्रह से आई एलियन हों जो इंसानी व्यवहार को समझने की कोशिश कर रही हों, पर गलत तरीके से!”

एक रात, रमेश ने देखा कि माया देवी एक बड़ा सा काला झोला लेकर चुपके से नीचे पार्किंग की तरफ जा रही हैं। उन्होंने तुरंत सुरेश को मैसेज किया और दोनों ने जासूसी शुरू कर दी। माया देवी अंधेरे में दबे पाँव सोसाइटी के पिछले हिस्से में बने छोटे से बगीचे में गईं।

वहाँ उन्होंने मिट्टी खोदना शुरू किया। रमेश और सुरेश एक झाड़ी के पीछे छिपकर देख रहे थे। रमेश ने फुसफुसाते हुए कहा, “देख लेना सुरेश, इसमें पक्का कोई कीमती खज़ाना है या फिर कोई सबूत जिसे वह छुपाना चाहती हैं।”

तभी माया देवी ने उस झोले से कुछ निकाला। वह कोई गहने या पैसे नहीं थे, बल्कि ढेर सारे पुराने खराब हो चुके बिजली के बल्ब थे। वह हर बल्ब को मिट्टी में गाड़ रही थीं और कह रही थीं, “बेटा, यहाँ सो जाओ, अगले जन्म में तुम सूरज बनकर उगोगे।”

सुरेश की हंसी छूटते-छूटते बची। उसने रमेश की कोहनी मारते हुए कहा, “भाई, तेरी पड़ोसन तो ‘इलेक्ट्रिक गार्डनर’ निकली!” लेकिन सस्पेंस अभी खत्म नहीं हुआ था। अगले दिन पूरे शांति निवास में हड़कंप मच गया। सोसाइटी की सालाना मीटिंग थी और माया देवी ने घोषणा की थी कि उनके पास एक ऐसी ‘सुनहरी चाबी’ है जो सोसाइटी के हर सदस्य की किस्मत खोल सकती है।

लोग उत्सुक भी थे और डरे हुए भी। मीटिंग हॉल में सब जमा हुए। माया देवी मंच पर आईं, उनके गले में एक विशालकाय पीतल की चाबी लटकी हुई थी जिसे उन्होंने पीले रंग से पेंट किया था। उन्होंने माइक संभाला और कहा, “मेरे प्यारे पड़ोसियों, आप सब मुझे पागल समझते हैं, है न? कोई बात नहीं। लेकिन आज मैं आपको सच बताऊँगी। इस चाबी से वह तिजोरी खुलती है जो इस अपार्टमेंट की नींव में गड़ी है।”

पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। सेक्रेटरी खन्ना जी ने पूछा, “माया जी, आप किस तिजोरी की बात कर रही हैं? यहाँ तो सिर्फ सीवर की पाइपें हैं।” माया देवी ने रहस्यमयी मुस्कान के साथ कहा, “यही तो समस्या है खन्ना जी, आप लोग सिर्फ वही देखते हैं जो आँखों के सामने है। मैंने पिछले तीन महीनों में यहाँ जो प्रयोग किए हैं, वे सब उस तिजोरी को खोजने के लिए थे। जब मैं छाते को सुखा रही थी, तो मैं दरअसल बादलों से संकेत ले रही थी। जब मैं फ्रिज को योग करा रही थी, तो मैं उसकी फ्रीक्वेंसी सेट कर रही थी। और कल रात जो बल्ब मैंने गाड़े, वे दरअसल भूमिगत प्रकाश व्यवस्था का हिस्सा थे!” लोग एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे। कुछ लोग डर के मारे बाहर निकलने लगे, जबकि कुछ रमेश की तरह अपनी हंसी दबाने की कोशिश कर रहे थे।

तभी अचानक वहां एक लड़का दाखिल हुआ। वह कैमरा और ट्राइपॉड लिए हुए था। उसने चिल्लाकर कहा, “कट! परफेक्ट शॉट मम्मी!” सब चौंक गए। माया देवी ने तुरंत अपनी गंभीर मुद्रा छोड़ी और खिलखिलाकर हंसने लगीं। उन्होंने माइक पर कहा, “देवियों और सज्जनों, बुरा न मानिए, यह सब एक प्रैंक था! मेरा बेटा राहुल एक फिल्ममेकर है और वह ‘सनकी पड़ोसी’ नाम की एक कॉमेडी वेब सीरीज बना रहा है। हम बस आप लोगों के नेचुरल रिएक्शंस रिकॉर्ड कर रहे थे। वो देखिए, बालकनी में और गमलों के पीछे छिपे हुए कैमरे!”

पूरा हॉल ठहाकों से गूंज उठा। रमेश, जो सबसे ज्यादा परेशान था, वह भी अपनी हंसी नहीं रोक पाया। उसे याद आया कि कैसे उसने फ्रिज वाले दिन अपने घर का दरवाज़ा डर के मारे बंद कर लिया था।

सुरेश ने चिल्लाकर कहा, “आंटी, आपने तो हमें जासूस बना दिया था! हम तो बल्ब वाले सीन के बाद पुलिस को फोन करने वाले थे।” माया देवी ने हंसते हुए कहा, “अरे रमेश बेटा, तुम्हारे उस स्नॉर्कल वाले लुक की फोटो तो बेस्ट आई है, राहुल उसे पोस्टर पर इस्तेमाल करने वाला है।” रमेश ने अपना माथा पीट लिया, “तो वह डिजिटल धूल और वाई-फाई का झाड़ू भी एक्टिंग थी?”

अगले कुछ दिनों तक शांति निवास में सिर्फ इसी की चर्चा होती रही। माया देवी अब सबकी पसंदीदा बन चुकी थीं। लोग अब उनके अजीब कामों से डरते नहीं थे, बल्कि उनके साथ शामिल हो जाते थे। लेकिन कहानी में एक ट्विस्ट अभी बाकी था।

वेब सीरीज की शूटिंग खत्म हो गई, राहुल वापस अपने काम पर मुंबई चला गया। सब कुछ सामान्य हो गया। एक सुबह रमेश जब ऑफिस के लिए निकल रहे थे, उन्होंने देखा कि माया देवी अपने हाथ में एक बड़ा सा हथौड़ा लिए अपनी ही दीवार को ठोक रही थीं। रमेश ने मुस्कुराते हुए पूछा, “क्यों आंटी, अब कौन सी फिल्म की शूटिंग चल रही है? राहुल वापस आ गया क्या?”

माया देवी ने धीरे से पीछे मुड़कर देखा, उनके चेहरे पर कोई हंसी नहीं थी। उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा, “राहुल? नहीं बेटा, वह तो चला गया। मैं तो बस इस दीवार के अंदर छुपे हुए ‘अदृश्य संगीतकार’ को बाहर निकालने की कोशिश कर रही हूँ। वह पिछले दो घंटे से बेसुरा वायलिन बजा रहा है, मेरी नींद खराब कर दी है उसने।” रमेश हंसते हुए बोले, “वाह आंटी! क्या एक्टिंग है।

आप तो प्रो हो गई हैं।” रमेश हंसते हुए अपनी कार की तरफ बढ़ गए। लेकिन जैसे ही वह लिफ्ट में घुसे, उन्हें अचानक याद आया कि माया देवी की दीवार के उस पार तो किसी का घर नहीं था, वहाँ तो केवल एक पुरानी खाली लिफ्ट शाफ्ट थी जो बरसों से बंद पड़ी थी। रमेश के पैर ठिठक गए। क्या वह सच में एक्टिंग कर रही थीं? या फिर…?

तभी उन्हें लिफ्ट के अंदर एक धीमी सी आवाज़ सुनाई दी, जो किसी बेसुरा वायलिन बजाने जैसी ही थी। रमेश के पसीने छूटने लगे। उन्होंने जल्दी से लिफ्ट का बटन दबाया और नीचे की तरफ भागे। शाम को जब वह वापस आए, तो उन्होंने देखा कि माया देवी आराम से बैठकर चाय पी रही थीं। उन्होंने रमेश को देखते ही कहा, “बेटा, डर गए क्या? संगीतकार ने वायलिन बजाना बंद कर दिया, मैंने उसे चाय पर बुलाया था।”

रमेश ने हिम्मत जुटाकर पूछा, “आंटी, सच-सच बताइए, सुबह वह कोई प्रैंक था या सच?” माया देवी ने अपनी चाय का घूँट भरा और रहस्यमयी अंदाज़ में आँख मारी, “बेटा, ज़िंदगी एक रंगमंच है और हम सब कठपुतलियाँ। कभी-कभी एक्टिंग इतनी असली होती है कि एक्टर भी भूल जाता है कि वह नाटक कर रहा है, और कभी-कभी हकीकत इतनी फिल्मी होती है कि लोग उसे प्रैंक समझ लेते हैं। अब तुम खुद सोचो कि हकीकत क्या है!”

उस दिन के बाद से रमेश ने कभी माया देवी से उनकी हरकतों का कारण नहीं पूछा। उन्होंने समझ लिया था कि माया देवी के साथ रहने का मज़ा उनके तर्क खोजने में नहीं, बल्कि उनकी अतरंगी दुनिया का हिस्सा बनने में है।

शांति निवास में अब भी कभी-कभी अजीब आवाज़ें आती थीं, कभी-कभी माया देवी वैक्यूम क्लीनर लेकर बालकनी में नाचती दिखती थीं, और कभी-कभी वह पक्षियों को गणित पढ़ाती हुई पाई जाती थीं। रमेश अब उनसे परेशान नहीं होते थे, बल्कि अपनी बालकनी में बैठकर चाय पीते हुए उनके अगले ‘एक्ट’ का इंतज़ार करते थे।

एक बार सुरेश ने पूछा, “भाई, तुझे डर नहीं लगता कि किसी दिन वह सच में कुछ बड़ा कर देंगी?” रमेश ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “डर कैसा भाई? जिस पड़ोस में ऐसी मनोरंजन की मशीन हो, वहाँ बोरियत के लिए कोई जगह नहीं होती।

वैसे भी, कौन जानता है कि वह पागल हैं या हम सब? हम सब अपनी-अपनी छोटी सी दुनिया में कुछ न कुछ अजीब तो करते ही हैं, बस माया आंटी उसे खुलकर करती हैं।” और तभी बगल वाले फ्लैट से आवाज़ आई, “रमेश बेटा! ज़रा इधर आना, मेरा आईपैड भूख से रो रहा है, इसे क्या खिलाऊँ?” रमेश हंसते हुए खड़े हुए और बोले, “आ रहा हूँ आंटी! उसे थोड़ा डिजिटल नूडल्स खिला देते हैं!”

शांति निवास के उस छोटे से ब्लॉक में, जहाँ पहले लोग केवल काम और तनाव की बातें करते थे, अब हँसी और ठहाकों का माहौल रहता था। माया देवी की अजीब हरकतों ने न केवल रमेश की बोरियत दूर की थी, बल्कि पूरी सोसाइटी को एक सूत्र में बाँध दिया था। लोग अब एक-दूसरे से मिलते थे, हँसते थे और माया देवी के नए ‘कारनामों’ पर चर्चा करते थे।

उस ‘सुनहरी चाबी’ ने सच में सबकी किस्मत खोल दी थी, बस वह कोई तिजोरी की चाबी नहीं बल्कि खुशियों और हँसी की चाबी थी। रमेश को अब अपने फ्लैट नंबर 402 से इतना प्यार हो गया था कि वह किसी आलीशान बंगले के लिए भी उसे छोड़ने को तैयार नहीं थे। आखिर ऐसी ‘इंटरटेनिंग’ पड़ोसन और ऐसी जादुई दीवार हर किसी के नसीब में कहाँ होती है!

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