एक दिन बिना मोबाइल के

Team Maunam
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बब्लू के जीवन में सूर्योदय सूरज की किरणों से नहीं, बल्कि उसके स्मार्टफोन की नीली रोशनी से होता था। उसकी आँखें खुलने से पहले उसका हाथ तकिए के नीचे दबे उस जादुई डिब्बे को टटोलने लगता था। फेसबुक की नोटिफिकेशन, इंस्टाग्राम के लाइक्स और व्हाट्सएप के अनगिनत ‘गुड मॉर्निंग’ संदेश उसके लिए ऑक्सीजन की तरह थे। लेकिन उस मनहूस मंगलवार की सुबह कुछ ऐसा हुआ जिसकी कल्पना मात्र से बब्लू की रूह कांप उठती थी।

हुआ यह कि बब्लू सुबह-सुबह आँखें मलते हुए बाथरूम की ओर बढ़ा। एक हाथ में टूथब्रश था और दूसरे में उसका वफादार मोबाइल। वह रील स्क्रॉल कर रहा था और एक ‘फनी कैट’ वीडियो पर ठहाका लगाने ही वाला था कि तभी उसका हाथ साबुन की फिसलन का शिकार हो गया। मोबाइल एक कलाबाजी खाते हुए सीधे पानी से भरी बाल्टी में ‘छपाक’ से जा गिरा। बब्लू के हलक से ऐसी चीख निकली जैसे उसका कोई सगा संबंधी डूब रहा हो। उसने फुर्ती से हाथ बाल्टी में डाला, पर तब तक देर हो चुकी थी। मोबाइल की स्क्रीन एक बार झिलमिलाई और फिर हमेशा के लिए काली हो गई।

बब्लू ने उसे चावल के बोरे में दबाया, हेयर ड्रायर से सुखाया, यहाँ तक कि उसे धूप में रखकर प्रार्थना भी की, पर वह निर्जीव डिब्बा टस से मस न हुआ। अंत में हारकर उसे पास के रिपेयरिंग सेंटर पर छोड़ना पड़ा। दुकानदार ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘भाई साहब, शाम को आना, इसे आईसी (IC) का दौरा पड़ा है।’ अब बब्लू के पास एक पूरा दिन था—बिना मोबाइल के। यह उसके लिए किसी ‘डिजिटल संन्यास’ से कम नहीं था।

घर लौटते समय बब्लू को पहली अजीब अनुभूति हुई। उसे लगा कि उसकी दाहिनी जेब में कंपन (vibration) हो रहा है। उसने झट से हाथ डाला, पर वहां सिर्फ रुमाल था। इसे डॉक्टर ‘फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम’ कहते हैं, पर बब्लू को लगा कि शायद उसके मोबाइल की आत्मा उसे पुकार रही है। वह घर पहुँचा और सोफे पर बैठ गया। अब क्या करें? आमतौर पर इस समय वह मीम्स शेयर करता था। उसने खालीपन भरने के लिए अपनी माँ के पास जाकर बैठने का फैसला किया।

माँ रसोई में मटर छील रही थीं। बब्लू को अपने पास बैठा देख वह चौंक गईं। ‘क्या हुआ रे? तबीयत तो ठीक है? आज सूरज कहाँ से निकला है?’ माँ ने माथे पर हाथ रखते हुए पूछा। बब्लू ने उदास होकर कहा, ‘माँ, बस आज आपका हाथ बंटाने का मन किया।’ माँ ने उसे घूरकर देखा और बोलीं, ‘मोबाइल खो गया या टूट गया?’ माँ की पारखी नज़रें सब जानती थीं। अगले एक घंटे तक बब्लू ने मटर छीले। उसे पहली बार पता चला कि मटर के दानों में भी एक अलग संगीत होता है और माँ की बातें फेसबुक की वॉल से कहीं ज्यादा दिलचस्प होती हैं। माँ उसे बचपन की कहानियाँ सुना रही थीं और बब्लू को एहसास हुआ कि वह पिछले पांच सालों से माँ के पास बैठा तो था, पर कभी उनके साथ नहीं था।

दोपहर हुई तो भूख लगी। बब्लू की आदत थी कि खाना खाते समय वह यूट्यूब पर कोई वेब सीरीज जरूर देखता था। आज सामने सिर्फ थाली थी। उसने रोटी का टुकड़ा तोड़ा और गलती से अपनी उंगली स्क्रीन समझकर स्वाइप करने लगा। उसे खुद पर हंसी भी आई और गुस्सा भी। उसने दाल का स्वाद लिया। उसे पहली बार महसूस हुआ कि माँ दाल में हींग का तड़का कितना जबरदस्त लगाती हैं। बिना स्क्रीन के ध्यान भटकाए खाना खाना उसे एक ‘मेडिटेशन’ जैसा लगा।

असली चुनौती तो दोपहर के बाद शुरू हुई। बब्लू को अपने एक दोस्त के नए ऑफिस जाना था। उसने आदत के अनुसार जेब में हाथ डाला ताकि गूगल मैप्स खोल सके, पर जेब खाली थी। अब क्या? उसने हिम्मत जुटाई और सड़क पर निकल पड़ा। उसे रास्ते का धुंधला सा अंदाजा था। चौराहे पर पहुंचकर वह रुक गया। वहां एक बुजुर्ग सज्जन अखबार पढ़ रहे थे। बब्लू ने हिचकिचाते हुए पूछा, ‘अंकल, ये शांति नगर जाने वाला रास्ता किधर है?’ अंकल ने चश्मा नीचे किया और बोले, ‘बेटा, सीधे जाओ, वहां एक पीपल का पेड़ मिलेगा जो १९९८ में आधा कट गया था, वहां से बाएं मुड़ जाना। फिर एक पीली कोठी आएगी…’ बब्लू चकरा गया। गूगल मैप्स तो कहता था ‘२०० मीटर बाद दाएं मुड़ें’ और यहाँ अंकल १९९८ के इतिहास की बातें कर रहे थे। खैर, धक्का खाते-खाते, चार लोगों से रास्ता पूछते हुए वह ऑफिस पहुँच ही गया। उसे एहसास हुआ कि इंसानों से बात करके रास्ता खोजना भी एक कला है, जिसमें ‘लोकेशन’ के साथ-साथ मोहल्ले की गप्पें भी मुफ्त मिलती हैं।

शाम को पार्क में टहलते समय बब्लू ने एक अद्भुत नज़ारा देखा। लोग एक-दूसरे से बात कर रहे थे, बच्चे मिट्टी में खेल रहे थे और बुजुर्ग ठहाके लगा रहे थे। उसने देखा कि एक लड़का अपनी प्रेमिका के साथ बैठा था, पर दोनों अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त थे। बब्लू को लगा जैसे वह कोई आईना देख रहा हो। उसे उन पर तरस आया। वह खुद एक बेंच पर बैठ गया और डूबते हुए सूरज को देखने लगा। उसने सालों बाद आसमान के उन रंगों को देखा था जो किसी ‘फिल्टर’ के मोहताज नहीं थे। तभी उसके पास एक छोटा बच्चा आया जिसकी फुटबॉल झाड़ियों में फंस गई थी। बब्लू ने उठकर उसे गेंद निकाल कर दी। बच्चे की वह मासूम मुस्कान किसी ‘लाइक’ या ‘हार्ट इमोजी’ से कहीं ज्यादा कीमती थी।

रात को घर लौटते समय उसे रिपेयरिंग शॉप से अपना फोन मिल गया। फोन चालू होते ही ‘टिंग-टिंग’ की आवाजों का सैलाब आ गया। ४५२ व्हाट्सएप मैसेज, १८ मिस्ड कॉल और अनगिनत फेसबुक नोटिफिकेशन। बब्लू ने एक बार उन सबको देखा। आधे से ज्यादा मैसेज फालतू थे, कुछ फॉरवर्डेड जोक्स थे और कुछ सेल के विज्ञापन। उसने एक गहरी सांस ली। वह जिसे अपनी ‘दुनिया’ समझता था, वह महज एक कृत्रिम शोर था।

उस रात बब्लू ने अपना फोन चार्जिंग पर लगाया और उसे दूसरे कमरे में ही छोड़ दिया। उसने अलमारी से वह पुरानी डायरी निकाली जिसे उसने सालों से नहीं छुआ था। उसने लिखना शुरू किया—’आज मैंने जिया।’ उसने महसूस किया कि मोबाइल एक साधन है, जीवन नहीं। बिना मोबाइल के उस एक दिन ने उसे सिखाया कि असली ‘नेटवर्क’ दिल से दिल का होता है, न कि टावर के सिग्नल्स का।

अगले दिन जब बब्लू सोकर उठा, तो उसका हाथ फिर से मोबाइल की तरफ बढ़ा, पर इस बार उसने उसे सिर्फ समय देखने के लिए उठाया और वापस रख दिया। वह खिड़की के पास गया, ठंडी हवा का आनंद लिया और अपनी माँ को आवाज लगाई, ‘माँ, आज नाश्ते में क्या है? आज मैं फिर से मटर छीलने में आपकी मदद करूँगा।’

बब्लू का यह बदलाव देखकर घरवाले हैरान थे। उसके दोस्त परेशान थे कि बब्लू ऑनलाइन क्यों नहीं आ रहा। पर बब्लू अब एक अलग ही दुनिया में था—एक ऐसी दुनिया जहाँ ‘डाटा’ सीमित नहीं था, जहाँ ‘बैटरी’ खत्म होने का डर नहीं था और जहाँ हर पल ‘हाई डेफिनेशन’ में जिया जा रहा था। उसे समझ आ गया था कि मोबाइल की कैद से बाहर निकलकर ही असली आज़ादी मिलती है। आज भी वह मोबाइल इस्तेमाल करता है, पर अब मोबाइल उसे इस्तेमाल नहीं करता। उसकी हंसी अब ‘LOL’ या ‘ROFL’ तक सीमित नहीं थी, वह अब खुलकर गूंजती थी। अंततः, एक दिन की उस डिजिटल खामोशी ने बब्लू के जीवन में असली संगीत भर दिया था।

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