एक समय की बात है, जब दुनिया आज की तरह भाग-दौड़ भरी नहीं थी। उस समय के एक छोटे से गाँव ‘सुस्तपुर’ में एक महाशय रहते थे जिनका नाम था रामू। रामू का नाम सुनते ही गाँव के लोग अपने सिर पर हाथ रख लेते थे। रामू के बारे में प्रसिद्ध था कि यदि आलस की कोई ओलंपिक प्रतियोगिता होती, तो स्वर्ण पदक, रजत पदक और यहाँ तक कि सांत्वना पुरस्कार भी रामू को ही मिलता। रामू के लिए हिलना-डुलना एक दंड के समान था। उसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य था—लेटे रहना।
रामू की पत्नी, शांति, उसके नाम के ठीक विपरीत थी। वह दिन-भर चक्की चलाती, गाय का दूध निकालती और खेतों में काम करती। लेकिन रामू? रामू का सुबह का मुख्य काम था खाट पर करवट बदलना। जब सूरज की पहली किरण उसके चेहरे पर पड़ती, तो वह उसे हटाने के लिए अपना हाथ नहीं उठाता था, बल्कि इंतज़ार करता था कि कब कोई बादल आए और सूरज को ढँक ले। रामू का तर्क था, “जब कुदरत खुद साया दे सकती है, तो मैं हाथ हिलाकर अपनी ऊर्जा क्यों व्यर्थ करूँ?”
एक दिन की बात है, रामू एक विशाल आम के पेड़ के नीचे लेटा हुआ था। उसकी आँखें बंद थीं और वह गहरी नींद के सपने देख रहा था। तभी एक रसीला, पीला आम पेड़ से टूटा और सीधा रामू की छाती पर आकर गिरा। रामू की आँखें खुलीं। उसने देखा कि आम उसकी छाती पर रखा है। भूख तो उसे लगी थी, लेकिन हाथ उठाकर आम को मुँह तक ले जाना उसे दुनिया का सबसे कठिन कार्य लग रहा था। वह लेटा रहा और इंतज़ार करने लगा कि शायद कोई वहाँ से गुज़रे और आम उठाकर उसके मुँह में डाल दे।
तभी वहाँ से एक कुत्ता गुज़रा। रामू ने धीमी आवाज़ में कहा, “ए कुत्ते भाई, ज़रा यह आम उठाकर मेरे मुँह में डाल दे।” कुत्ते ने रामू की तरफ ऐसे देखा जैसे वह किसी दूसरे ग्रह का प्राणी हो और अपनी पूँछ हिलाकर आगे बढ़ गया। रामू निराश नहीं हुआ। थोड़ी देर बाद वहाँ से गाँव का एक छोटा बच्चा गुज़रा। रामू ने उससे भी यही विनती की। बच्चे ने आम उठाया, लेकिन उसने खुद ही उसे खाना शुरू कर दिया। रामू ने आह भरी और सोचा, “आजकल के बच्चों में संस्कारों की कितनी कमी है!”
रामू की इस आलस की चर्चा धीरे-धीरे गाँव की सीमाओं को पार कर राजा के दरबार तक पहुँच गई। राजा मनोरंजन के शौकीन थे। उन्होंने सुना कि उनके राज्य में एक ऐसा व्यक्ति है जो इतना आलसी है कि वह खाना तक नहीं खाता अगर उसे परोसा न जाए। राजा ने अपने वज़ीर से कहा, “हमें इस व्यक्ति की परीक्षा लेनी चाहिए। अगर वह वाकई में इतना आलसी है, तो हम उसे ‘राजकीय आलसी’ घोषित करेंगे और उसे जीवन भर का मुफ्त राशन देंगे। लेकिन अगर वह झूठ बोल रहा है, तो उसे कोड़े मारे जाएंगे।”
राजा ने घोषणा करवाई कि राज्य के सभी आलसी व्यक्तियों के लिए एक विशेष दावत का आयोजन किया गया है। शर्त यह थी कि केवल वही लोग आएँ जो वास्तव में काम करने से नफरत करते हैं। गाँव-गाँव में ढोल पिटवाया गया। सुस्तपुर में जब यह खबर पहुँची, तो रामू के चेहरे पर एक दुर्लभ चमक आई। उसने सोचा, “मुफ्त का खाना और वह भी बिना मेहनत के? यह तो मेरे लिए ही बना है।”
रामू को पालकी में बिठाकर महल ले जाया गया क्योंकि उसने चलने से साफ इनकार कर दिया था। उसने कहा, “महाराज, अगर मैं पैदल चलकर आया, तो मेरी आलस की प्रतिष्ठा धूमिल हो जाएगी।” राजा उसकी बातों से प्रभावित हुए और उसे शाही पालकी भिजवाई। महल के बड़े बरामदे में दर्जनों लोग इकट्ठा हुए थे, जो खुद को आलसी होने का दावा कर रहे थे। राजा ने सबके लिए शानदार भोजन परोसा। जैसे ही भोजन की खुशबू फैली, कई लोग जो आलस का नाटक कर रहे थे, वे जल्दी-जल्दी खाने पर टूट पड़े। राजा देख रहे थे कि कौन वास्तव में आलसी है।
भोजन के बाद, राजा ने अपनी असली योजना शुरू की। उन्होंने वज़ीर को इशारा किया। अचानक, महल के उस हिस्से में आग लगा दी गई जहाँ सभी आलसी लोग बैठे थे। धुआं उठने लगा और लपटें तेज़ होने लगीं। यह देखते ही, आधे से ज़्यादा ‘आलसी’ लोग अपनी जान बचाकर ऐसे भागे जैसे वे धावक हों। कुछ ही क्षणों में वहाँ केवल तीन लोग बचे थे। आग की लपटें उनके करीब आ रही थीं।
पहला आदमी बोला, “अरे भाई, लगता है यहाँ आग लग गई है।”
दूसरा आदमी, जो रामू के बगल में लेटा था, बोला, “हाँ, गर्मी बहुत बढ़ गई है। कोई जाकर कहो कि पंखा चला दे।”
रामू, जो सबसे शांत था, उसने अपनी आँखें भी नहीं खोलीं। उसने कहा, “अरे भाई, तुम दोनों कितनी बातें करते हो? चुपचाप लेटे रहो, कोई न कोई आएगा और हमें बुझा देगा या उठा ले जाएगा। फालतू में गला फाड़कर अपनी ऊर्जा क्यों नष्ट कर रहे हो?”
राजा यह सब एक सुरक्षित दूरी से देख रहे थे। वह दंग रह गए। आग की लपटें रामू की धोती के पास पहुँच गई थीं, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ। अंत में, राजा ने सैनिकों को आदेश दिया कि वे उन तीनों को बाहर निकालें। राजा ने रामू के पास जाकर कहा, “रामू, तुम वाकई में आलस के सुल्तान हो। तुम्हें अपनी जान की भी परवाह नहीं?”
रामू ने बड़े इत्मीनान से उत्तर दिया, “महाराज, जान तो आती-जाती रहती है, लेकिन एक बार आलस का नियम टूट गया, तो वह वापस नहीं आता। अगर मैं भागता, तो दुनिया कहती कि रामू आलसी नहीं है। मेरी इतनी सालों की तपस्या भंग हो जाती।”
राजा उसकी दलील सुनकर हँस-हँसकर लोटपोट हो गए। उन्होंने रामू को विजेता घोषित किया और उसे इनाम में सोने की मोहरों की एक थैली दी। लेकिन रामू का आलस यहाँ भी खत्म नहीं हुआ। उसने राजा से कहा, “महाराज, आपने यह थैली तो दे दी, लेकिन इसे मेरे घर तक पहुँचाने का कष्ट भी आप ही कर दें। मैं इसे उठाने का जोखिम नहीं ले सकता।”
राजा ने मुस्कुराते हुए रामू को आजीवन पेंशन और मुफ्त भोजन का अधिकार दे दिया। रामू वापस अपने गाँव लौटा। अब वह गाँव का सबसे वीआईपी व्यक्ति बन चुका था। लोग उससे मिलने आते और पूछते कि आलस का असली रहस्य क्या है। रामू एक ही बात कहता, “काम करने से केवल शरीर थकता है, लेकिन आलस करने से आत्मा को शांति मिलती है।”
रामू की पत्नी शांति अब पहले से भी ज़्यादा परेशान थी। उसे लगा था कि इनाम मिलने के बाद रामू सुधर जाएगा, लेकिन वह तो और भी बड़ा ‘महात्मा’ बन गया था। एक दिन शांति ने सोचा कि वह रामू को सबक सिखाएगी। उसने रामू से कहा, “सुनो जी, घर में पानी खत्म हो गया है और मुझे बाहर जाना है। अगर प्यास लगे, तो पास के कुएँ से पानी भर लेना।”
रामू ने सिर हिला दिया, जिसका मतलब था कि उसने सुन लिया है, लेकिन वह करेगा क्या, यह किसी को नहीं पता था। शांति दोपहर तक नहीं लौटी। रामू को प्यास लगने लगी। उसका गला सूख रहा था। कुआँ घर के आँगन में ही था, बस दस कदम की दूरी पर। रामू ने सोचा, “पानी पीना ज़रूरी है, लेकिन चलकर जाना? नहीं, यह मेरे सिद्धांतों के खिलाफ है।” वह लेटा रहा और बादलों की ओर देखने लगा। उसने प्रार्थना की, “हे इंद्र देव, क्या आप केवल मेरे मुँह के ऊपर थोड़ा सा बरस नहीं सकते? पूरी दुनिया को भिगोने की क्या ज़रूरत है?”
तभी वहाँ से एक प्यासा कौआ गुज़रा। कौए ने देखा कि रामू मुँह खोलकर लेटा है। कौए ने अपनी चोंच से एक कंकड़ गिराया जो सीधा रामू के मुँह में गया। रामू को लगा कि शायद बारिश की बूंद गिरी है, लेकिन जब कंकड़ लगा, तो उसे गुस्सा आया। उसने चिल्लाकर कहा, “अरे! भगवान से भी अब काम ठीक से नहीं होता। मैंने पानी माँगा था, पत्थर नहीं!”
शाम को जब शांति वापस आई, तो उसने देखा कि रामू वैसे ही लेटा है और उसका चेहरा लाल हो गया है। उसने पूछा, “क्या हुआ? पानी पिया?” रामू ने दुखभरी आवाज़ में कहा, “इंद्र देव भी आजकल बहुत कंजूस हो गए हैं। पानी की जगह कंकड़ भेज रहे हैं।” शांति ने अपना सिर पीट लिया। उसे समझ आ गया कि रामू को बदलना नामुमकिन है।
गाँव के जमींदार को रामू की इस ‘उपलब्धि’ से बड़ी जलन होती थी। उसने सोचा कि वह रामू को नीचा दिखाएगा। उसने रामू को अपने पास बुलवाया और कहा, “रामू, अगर तुम मेरे खेत के एक छोर से दूसरे छोर तक बिना रुके चल सको, तो मैं तुम्हें अपनी आधी ज़मीन दे दूँगा।”
रामू ने पूछा, “और अगर मैं न चलूँ तो?”
जमींदार ने कहा, “तो तुम्हें गाँव छोड़कर जाना होगा।”
रामू ने कुछ देर सोचा और फिर बोला, “ज़मीन का मैं क्या करूँगा? खेती करने के लिए मुझे हल चलाना पड़ेगा, बीज बोने पड़ेंगे, पानी देना पड़ेगा। इतना काम! नहीं महाराज, मुझे आपकी ज़मीन नहीं चाहिए। मैं अपना गाँव छोड़ने के लिए तैयार हूँ, बशर्ते आप मुझे पालकी में बिठाकर सीमा पार छुड़वा दें।”
जमींदार सन्न रह गया। उसने कभी ऐसा आदमी नहीं देखा था जो ज़मीन और जायदाद को सिर्फ इसलिए ठुकरा दे क्योंकि उसे काम करना पड़ेगा। जमींदार ने अपनी हार मान ली और रामू को सप्रेम विदा किया।
रामू की ख्याति अब पड़ोसी राज्यों तक भी पहुँच गई थी। एक बार एक विद्वान पंडित रामू से मिलने आए। उन्होंने रामू से पूछा, “बेटा, तुम इतने आलसी कैसे हो सकते हो? क्या तुम्हें नहीं पता कि कर्म ही पूजा है?”
रामू ने बड़े शांत भाव से उत्तर दिया, “पंडित जी, कर्म पूजा है, यह मैंने भी सुना है। लेकिन पूजा के बाद विश्राम करना भी तो ज़रूरी है। मैं बस उस विश्राम को थोड़ा जल्दी और थोड़ा ज़्यादा कर रहा हूँ। अगर सब लोग काम ही करते रहेंगे, तो विश्राम करने वालों के लिए जगह कहाँ बचेगी? मैं तो समाज का संतुलन बनाए रख रहा हूँ।”
पंडित जी के पास इस तर्क का कोई जवाब नहीं था। वे अपना झोला उठाकर चुपचाप चले गए।
रामू के जीवन की सबसे बड़ी घटना तब हुई जब राजा ने उसे अपने दरबार में एक सलाहकार के रूप में नियुक्त करने का फैसला किया। राजा का मानना था कि रामू की ‘न्यूनतम ऊर्जा’ की नीति राज्य के खजाने को बचा सकती है। राजा ने रामू से पूछा, “रामू, हमारे राज्य में चोरी बहुत बढ़ गई है। इसे रोकने का कोई उपाय बताओ जिसमें मेहनत कम लगे।”
रामू ने जम्हाई लेते हुए कहा, “महाराज, चोरों को पकड़ने की क्या ज़रूरत है? उन्हें महल में ही रहने के लिए जगह दे दीजिए और उन्हें मुफ्त खाना दीजिए। जब उन्हें चोरी करने की मेहनत नहीं करनी पड़ेगी, तो वे खुद ही आलसी हो जाएंगे और चोरी करना छोड़ देंगे। जब चोर आलसी हो जाएंगे, तो राज्य में शांति अपने आप आ जाएगी।”
राजा को यह सुझाव अजीब लगा, लेकिन उन्होंने इसे प्रयोग के तौर पर लागू किया। नतीजा यह हुआ कि चोरों ने चोरी करना छोड़ दिया क्योंकि उन्हें बिना मेहनत के सब कुछ मिल रहा था। लेकिन कुछ ही समय में वे चोर इतने आलसी हो गए कि उन्होंने भागना भी छोड़ दिया। राजा बहुत खुश हुए। उन्होंने रामू को ‘राज्य का रत्न’ घोषित किया।
रामू अब बूढ़ा हो चला था, लेकिन उसका आलस अभी भी जवान था। उसके अंतिम समय में, गाँव के लोग उसके पास आए और पूछा, “रामू भाई, आपकी कोई आखिरी इच्छा?” रामू ने धीरे से आँखें खोलीं और कहा, “इच्छा तो बहुत है, लेकिन उसे बताने के लिए मुँह खोलना पड़ेगा और लंबी बात करनी पड़ेगी। बस इतना समझ लो कि जो जहाँ है, वहीं रहे। मुझे हिलाने की कोशिश मत करना।”
कहते हैं कि रामू के जाने के बाद, उस गाँव का नाम ‘सुस्तपुर’ से बदलकर ‘आलस धाम’ रख दिया गया। आज भी अगर कोई बहुत ज़्यादा आलस करता है, तो लोग उसे रामू का वंशज कहते हैं। रामू ने दुनिया को सिखाया कि दुनिया भले ही भागती रहे, लेकिन जो आनंद लेटे रहने में है, वह किसी भी दौड़ में नहीं है।
रामू की कहानी हमें सिखाती है कि कभी-कभी जीवन में बहुत ज़्यादा गंभीर होने की ज़रूरत नहीं होती। हालांकि रामू का आलस चरम सीमा पर था और वह केवल एक हास्य का पात्र था, लेकिन उसकी बातों में छिपा व्यंग्य समाज की भाग-दौड़ पर एक करारी चोट था। उसने बिना कुछ किए वह सब हासिल कर लिया, जिसे लोग दिन-रात मेहनत करके भी नहीं पा पाते।
गाँव के बच्चे आज भी बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर रामू की कहानियाँ सुनते हैं और हँसते हैं। वे जानते हैं कि रामू जैसा कोई दूसरा नहीं होगा। वह एक ऐसा इंसान था जिसने आलस को एक कला बना दिया था। उसकी पत्नी शांति, जो पहले उसे कोसती थी, अब उसकी याद में एक छोटा सा स्मारक बनवाया है, जिस पर लिखा है: “यहाँ वह महान व्यक्ति सो रहा है, जिसने सोते हुए भी इतिहास रच दिया।”
रामू की यह कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि हँसी-मज़ाक हमारे जीवन का अनिवार्य हिस्सा है। रामू जैसे पात्र हमें अपनी कमियों पर हँसना सिखाते हैं। चाहे वह आम गिरने का इंतज़ार हो, या आग लगने पर भी न हिलना, रामू का हर किस्सा एक नई मुस्कान लेकर आता है।
गाँव सुस्तपुर अब एक पर्यटन स्थल बन गया है। लोग दूर-दूर से उस पेड़ को देखने आते हैं जिसके नीचे रामू लेटा करता था। कुछ लोग तो वहाँ जाकर थोड़ी देर लेटने की कोशिश भी करते हैं, यह सोचकर कि शायद उन्हें भी रामू जैसी मानसिक शांति मिल जाए। लेकिन रामू जैसा आलस करना हर किसी के बस की बात नहीं है। उसके लिए एक विशेष प्रकार के धैर्य और दुनियादारी से अलगाव की आवश्यकता होती है।
अंत में, रामू की कहानी का सार यही है कि खुश रहने के लिए बहुत कुछ करना ज़रूरी नहीं है। कभी-कभी कुछ न करना भी सबसे बड़ा काम हो सकता है। रामू ने अपने आलस से न केवल राजा का दिल जीता, बल्कि वह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक किंवदंती बन गया। उसके किस्से आज भी गलियों में गूंजते हैं, और जब भी कोई आलसी व्यक्ति दिखता है, तो लोग मुस्कुराकर कह उठते हैं— “लगता है, रामू वापस आ गया है!”
