गलत नंबर से हुई दोस्ती

Team Maunam
Disclosure: This website may contain affiliate links, which means I may earn a commission if you click on the link and make a purchase. I only recommend products or services that I personally use and believe will add value to my readers. Your support is appreciated!

बनारस की तंग गलियों में जहाँ हवा कम और अफवाहें ज्यादा बहती हैं, वहाँ रहता था हमारा कहानी का मुख्य पात्र—बब्बन। बब्बन स्वभाव से नेक था, पर उसकी किस्मत किसी पुराने लोहे के जंग लगे ताले जैसी थी, जो कभी समय पर नहीं खुलता था। बब्बन एक सरकारी दफ्तर में क्लर्क था, जहाँ उसका काम फाइलें इधर से उधर करना था, और उसका जीवन भी उसी फाइलों की तरह नीरस था। उसकी सबसे बड़ी समस्या थी उसका ‘अकेलापन’। बब्बन की उम्र तीस के पार जा रही थी, पर उसकी ‘जीवन-संगिनी’ का दूर-दूर तक कोई पता नहीं था।

एक उमस भरी शाम को, जब बिजली गुल थी और मच्छर बब्बन के कान में संगीत सुना रहे थे, उसने अपने पुराने दोस्त लल्लन को फोन लगाने का फैसला किया। लल्लन से उसे उधार के पाँच सौ रुपये वापस माँगने थे ताकि वह रात का खाना ढंग से खा सके।

अंधेरे में बब्बन ने कीपैड वाले फोन पर नंबर डायल किया—9835… और आखिरी अंक शायद गलत दब गया। दूसरी तरफ घंटी जाने लगी। तीन-चार घंटियों के बाद एक आवाज आई, ‘हेलो?’ आवाज थोड़ी भारी थी, पर बब्बन को लगा कि शायद नेटवर्क की गड़बड़ है।

बब्बन ने आव देखा न ताव, शुरू हो गया, ‘ओए लल्लन के बच्चे! कब देगा मेरे पैसे? उधार लेकर भूल जाता है क्या? तुझे क्या लगा, मैं भूल जाऊँगा?’ दूसरी तरफ से कुछ देर सन्नाटा रहा। फिर एक बेहद कोमल और सुरीली आवाज आई (या शायद बब्बन के कानों ने उसे सुरीला बना दिया था), ‘जी… आप कौन? और यह लल्लन कौन है? आपने शायद गलत नंबर मिलाया है।’ बब्बन के कान खड़े हो गए।

यह आवाज किसी लल्लन की नहीं थी। यह तो किसी अप्सरा जैसी ध्वनि थी। बब्बन हड़बड़ा गया। उसके पसीने छूटने लगे। उसने हकलाते हुए कहा, ‘ओह… आई एम सो सॉरी। मुझे लगा कि यह मेरे दोस्त का नंबर है। माफ कीजिएगा देवी जी, मेरा मतलब है, मैडम।’ दूसरी तरफ से एक हल्की सी हंसी सुनाई दी। वह हंसी बब्बन के दिल पर सितार की तरह बजी। ‘कोई बात नहीं। अक्सर गलतियाँ हो जाती हैं। पर आपने जिस तरह लल्लन को डांटा, बेचारे पर तरस आ रहा है,’ उस आवाज ने कहा। बब्बन ने जोश में आकर कहा, ‘अरे नहीं-नहीं, वह तो मेरा जिगरी यार है।

उसके साथ तो मेरा हक बनता है। वैसे मेरा नाम बब्बन है, और आपका?’ उस आवाज ने रुकते हुए कहा, ‘मेरा नाम… सिमरन।’ बस! बब्बन की दुनिया वहीं रुक गई। ‘सिमरन!’ उसने मन ही मन सोचा, ‘राज की सिमरन मिल गई!’ अगले आधे घंटे तक बब्बन ने सिमरन से ऐसी बातें कीं जैसे वह उसे बरसों से जानता हो। सिमरन ने बताया कि वह पास के ही एक शहर में रहती है और संगीत सीख रही है।

बब्बन ने भी अपनी तारीफों के पुल बांधने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उसने खुद को सरकारी दफ्तर का क्लर्क नहीं, बल्कि ‘सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर’ बताया। रात को जब बब्बन सोया, तो उसे सपने में लल्लन के पाँच सौ रुपये नहीं, बल्कि सिमरन की आवाज सुनाई दे रही थी। अगले दिन से सिलसिला शुरू हो गया। बब्बन रोज ऑफिस से आकर सिमरन को फोन करता। कभी-कभी तो वह लंच ब्रेक में भी छुपकर बात करता। सिमरन बहुत ही समझदार बातें करती थी। वह बब्बन को उसके काम के लिए प्रोत्साहित करती, उसे सेहत का ध्यान रखने को कहती।

बब्बन को लगने लगा कि उसकी जिंदगी की गाड़ी अब पटरी पर आ गई है। पर यहाँ एक बड़ा ट्विस्ट था। जिस ‘सिमरन’ से बब्बन बात कर रहा था, वह दरअसल कोई युवती नहीं, बल्कि गजराज सिंह नाम के एक साठ साल के रिटायर्ड हवलदार थे। गजराज सिंह अकेले रहते थे और बहुत मजाकिया स्वभाव के थे। उस दिन जब बब्बन का फोन आया, तो उन्होंने सिर्फ मजे लेने के लिए अपनी आवाज बदलकर बात की थी। उन्हें लगा था कि एक-दो बार में यह लड़का मान जाएगा, पर बब्बन तो उनके पीछे ही पड़ गया। गजराज सिंह को भी बब्बन की भोली बातें सुनकर मजा आने लगा था। उन्हें लगा कि चलो, इसी बहाने कोई तो है जो घंटों उनकी बातें सुनता है, वरना उनके अपने बेटे तो महीने में एक बार फोन करते थे।

बब्बन अब सिमरन के प्यार में पूरी तरह डूब चुका था। उसने सिमरन के लिए ऑनलाइन एक साड़ी ऑर्डर की और उसे उस पते पर भेज दिया जो गजराज सिंह ने (एक पुराने बंद पड़े घर का) दिया था। गजराज सिंह ने चुपके से वह साड़ी ली और उसे पड़ोस की एक गरीब विधवा को दान कर दी। पर बब्बन का उत्साह बढ़ता ही जा रहा था। उसने एक दिन प्रस्ताव रखा, ‘सिमरन, क्या हम मिल सकते हैं? मैं बनारस के मशहूर ‘शास्त्री पार्क’ में तुम्हारा इंतजार करूँगा। रविवार शाम पांच बजे। मैं लाल शर्ट पहनकर आऊँगा और हाथ में चमेली के फूलों का गजरा रखूँगा।’

गजराज सिंह घबरा गए। उन्होंने सोचा कि अब खेल खत्म करने का वक्त आ गया है। उन्होंने मना किया, पर बब्बन नहीं माना। अंत में गजराज सिंह ने सोचा कि चलो, इस लड़के को हकीकत बता ही देते हैं, वरना यह पागल हो जाएगा। रविवार का दिन आया। बब्बन ने अपनी सबसे अच्छी लाल शर्ट पहनी, बालों में ढेर सारा जेल लगाया और चमेली का गजरा लेकर पार्क पहुँच गया। वह हर आती-जाती लड़की को उम्मीद भरी नजरों से देख रहा था। उसे लग रहा था कि कोई परी जैसी लड़की आएगी और कहेगी, ‘बब्बन, मैं ही तुम्हारी सिमरन हूँ।’

ठीक पांच बजे, पार्क की बेंच पर एक भारी-भरकम इंसान आकर बैठा। खाकी पतलून, सफेद कुर्ता और घनी मूंछें। यह गजराज सिंह थे। बब्बन उन्हें देखकर चिढ़ गया। उसे लगा कि यह बुड्ढा उसकी डेट खराब करने आया है। बब्बन बार-बार अपनी घड़ी देख रहा था। साढ़े पांच बज गए, छह बज गए, पर सिमरन नहीं आई। बब्बन का चेहरा उतर गया। वह रोने ही वाला था कि तभी बगल में बैठे उस मूंछों वाले आदमी ने अपनी जेब से एक फोन निकाला और एक नंबर डायल किया। बब्बन के फोन की घंटी बजी।

स्क्रीन पर ‘सिमरन’ लिखा था। बब्बन ने जल्दी से फोन उठाया, ‘हेलो सिमरन! तुम कहाँ हो? मैं कब से इंतजार कर रहा हूँ।’ तभी उसके बगल में बैठे उस आदमी ने अपनी आवाज बदली और वही सुरीली आवाज में बोला, ‘मैं तुम्हारे पास ही हूँ बब्बन, बस अपनी बाईं तरफ देखो।’

बब्बन ने जैसे ही गर्दन घुमाई, उसके होश उड़ गए। गजराज सिंह मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। बब्बन का फोन हाथ से छूटते-छूटते बचा। ‘अ… आप? आप सिमरन हैं?’ बब्बन की आवाज किसी चूहे की चीख जैसी निकली। गजराज सिंह ठहाका मारकर हंसे। ‘अरे बैठ बेटा, बैठ। सिमरन तो सिर्फ एक नाम था, असल में मैं तेरा सिमरन-जीत सिंह हूँ।’ बब्बन को लगा कि जमीन फट जाएगी और वह उसमें समा जाएगा।

‘आपने मेरे साथ ऐसा क्यों किया? मैंने आपको अपनी दिल की सारी बातें बता दीं। मैंने आपको साड़ी भेजी!’ बब्बन लगभग चिल्लाया। गजराज सिंह ने प्यार से उसके कंधे पर हाथ रखा। ‘देख बेटा, शुरू में मैंने सिर्फ मजाक के लिए किया था। पर फिर मुझे तेरी बातों में एक अकेलापन दिखा।

मुझे लगा कि तुझे किसी की जरूरत है जो तेरी बातें सुन सके। और सच कहूँ तो, मुझे भी किसी की जरूरत थी। मेरे बेटे विदेश में हैं, पत्नी रही नहीं। तेरे फोन कॉल्स मेरे दिन का सबसे अच्छा हिस्सा बन गए थे।’ बब्बन की आँखों में आँसू आ गए। उसे गुस्सा तो बहुत आ रहा था, पर वह गजराज सिंह की आँखों में छिपी तनहाई को भी देख पा रहा था।

पार्क में सन्नाटा छा गया। तभी गजराज सिंह ने अपनी थैली से कुछ निकाला। ‘यह देख, मैं तेरे लिए गरमा-गरम समोसे और जलेबी लाया हूँ।

मुझे पता था कि जब तुझे पता चलेगा कि सिमरन एक बुड्ढा हवलदार है, तो तेरा दिल टूटेगा। और टूटे हुए दिल को जोड़ने के लिए बनारस के समोसों से बेहतर कुछ नहीं होता।’ बब्बन ने उनकी तरफ देखा, फिर समोसों की खुशबू ली। उसकी भूख, जो दुख के पीछे छुप गई थी, अचानक जाग उठी। उसने एक समोसा उठाया और जोर से काटा। ‘वैसे अंकल, आपकी आवाज बहुत अच्छी है। आपने मुझे सच में उल्लू बना दिया,’ बब्बन ने मुस्कुराते हुए कहा। गजराज सिंह हंसे, ‘बेटा, पुलिस में रहकर हमने बड़े-बड़े अपराधियों को उल्लू बनाया है, तू तो फिर भी मासूम है।’

उस शाम, बब्बन को प्रेमिका तो नहीं मिली, पर एक ऐसा दोस्त मिल गया जो उसे पिता की तरह सलाह देता था और दोस्त की तरह हँसाता था। गलत नंबर से शुरू हुई वह बातचीत एक ऐसी दोस्ती में बदल गई जिसकी मिसाल पूरे मोहल्ले में दी जाने लगी। बब्बन अब अकेला नहीं था।

हर रविवार वह गजराज सिंह के घर जाता, जहाँ दोनों मिलकर चाय पीते, समोसे खाते और दुनिया भर की गप्पें लड़ाते। बब्बन ने बाद में गजराज सिंह की मदद से एक अच्छी लड़की से शादी भी कर ली, जिसका नाम संयोग से ‘कोमल’ था, और गजराज सिंह उस शादी में बब्बन के बड़े भाई बनकर शामिल हुए। कहानी का सबक यही है कि कभी-कभी गलत रास्ते भी हमें सही मंजिल तक पहुँचा देते हैं, बशर्ते हमारे पास उन रास्तों पर साथ चलने के लिए समोसे और एक अच्छा दोस्त हो।

Share This Article