रामपुर की वह सुबह कुछ अलग ही थी। धूप खिली थी, लेकिन शर्मा जी के आंगन में जो कोहराम मचा था, वह किसी सुनामी से कम नहीं था। बात ही कुछ ऐसी थी, आज शर्मा जी के इकलौते सुपुत्र राहुल की शादी थी। घर में मेहमानों का रेला था, हलवाइयों की कड़ाही से निकलती खुशबू हवा में तैर रही थी, और फूफा जी हमेशा की तरह किसी बात पर मुंह फुलाए बैठे थे। लेकिन इस पूरी शादी का जो असली ‘डायरेक्टर’ था, वह था राहुल का चचेरा भाई—बिट्टू। बिट्टू खुद को मैनेजमेंट का गुरु मानता था, हालांकि उसका मैनेजमेंट सिर्फ रिमोट ढूंढने और मोबाइल चार्ज करने तक ही सीमित था।
शादी में उसे ‘रसद और सामान’ विभाग सौंपा गया था। उसे सिर्फ इतना करना था कि दूल्हे की शेरवानी और गहनों का सूटकेस सुरक्षित रूप से वेन्यू तक पहुँचा दे। पर बिट्टू की आँखों में नींद और दिमाग में इंस्टाग्राम रील्स का नशा था। रात भर वह ‘डांस प्रैक्टिस’ के नाम पर जागता रहा था। सुबह जब वह टैक्सी में सूटकेस रख रहा था, तो बगल में एक और टैक्सी खड़ी थी जिसमें एक स्थानीय नाटक मंडली का सामान लदा था।
बिट्टू ने अपनी चिर-परिचित फुर्ती दिखाई और अपनी टैक्सी में एक चमचमाता लाल रंग का सूटकेस डाल दिया। उसे लगा कि शेरवानी इसी में है। अब असल कहानी शुरू होती है। उधर वेन्यू पर, राहुल बेचारा नर्वस था। उसे डर था कि कहीं उसकी होने वाली पत्नी सिमरन उसे देखकर हंस न दे। बिट्टू कमरे में सूटकेस लेकर पहुँचा और बड़े गर्व से बोला, ‘भाई, तेरी शेरवानी आ गई।
ऐसी शेरवानी है कि लोग देखते रह जाएंगे।’ राहुल ने बिना देखे सूटकेस खोला और उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। अंदर शेरवानी नहीं, बल्कि ‘राजा हरिश्चंद्र’ के नाटक का चमकीला लाल चोगा, एक बड़ा सा मुकुट, और प्लास्टिक की लंबी मूंछें थीं। राहुल चिल्लाया, ‘बिट्टू! ये क्या है? क्या मैं अपनी शादी में सत्यवादी हरिश्चंद्र बनने जा रहा हूँ?’ बिट्टू का चेहरा सफेद पड़ गया।
उसने जल्दी से बैग चेक किया तो पाया कि वह तो गलती से ‘रामपुर थियेटर ग्रुप’ का बैग उठा लाया था। अब समस्या ये थी कि शादी का मुहूर्त अगले एक घंटे में था और असली शेरवानी वाली टैक्सी शहर से दूर किसी दूसरे गाँव में निकल चुकी थी। बिट्टू ने अपना दिमाग चलाया और बोला, ‘भाई, टेंशन मत ले। आजकल ‘थीम वेडिंग’ का जमाना है। हम कह देंगे कि ये ‘शाही विंटेज’ थीम है।’ राहुल रोने वाला हो गया था, ‘अबे पागल, सिमरन के पापा मुझे थीम के चक्कर में सीधे जेल भेज देंगे!’ इसी बीच पंडित जी का बुलावा आ गया। पंडित घासीराम थोड़े बहरे थे और बहुत ज्यादा जिद्दी।
उन्होंने चिल्लाकर कहा, ‘अरे दूल्हे को लाओ, मुहूर्त निकला जा रहा है!’ मजबूरी में राहुल को वही चमकीला चोगा पहनना पड़ा।
मुकुट तो खैर नहीं पहना, लेकिन चोगे की चमक ऐसी थी कि लग रहा था राहुल दूल्हा नहीं, बल्कि किसी सर्कस का मुख्य कलाकार है।
जब राहुल स्टेज की ओर बढ़ा, तो मेहमानों में कानाफूसी शुरू हो गई। ताऊ जी बोले, ‘शर्मा जी, लड़का कुछ ज्यादा ही चमक रहा है, कहीं इसकी बैटरी तो चार्ज नहीं कर दी?’ उधर सिमरन के घरवाले भी हैरान थे।
सिमरन की माँ ने अपनी सहेली से कहा, ‘शायद आजकल के नए फैशन में दूल्हे को झूमर की तरह सजना पड़ता है।’ असली तमाशा तो तब हुआ जब जयमाला का समय आया। सिमरन जैसे ही स्टेज पर आई, वह राहुल को देखकर अपनी हंसी नहीं रोक पाई। उसने धीरे से कहा, ‘राहुल, क्या तुम शादी के बाद सीधे स्वर्ग जाने की तैयारी में हो? ये क्या पहना है?’ राहुल ने दांत पीसते हुए कहा, ‘सब बिट्टू का कमाल है।’ अभी जयमाला होने ही वाली थी कि तभी वहां एक आदमी भागता हुआ आया। वह ‘रामपुर थियेटर ग्रुप’ का मैनेजर था।
वह चिल्लाया, ‘अरे रुको! ये राजा साहब का चोगा हमारा है! हमें अभी शो पर जाना है!’ पूरी महफ़िल में सन्नाटा छा गया। मैनेजर ने राहुल के पास जाकर उसका चोगा खींचना शुरू किया। बिट्टू बीच में कूद पड़ा, ‘अरे भाई साहब, तमीज से बात कीजिए, ये दूल्हा है।’ मैनेजर बोला, ‘दूल्हा होगा अपने घर का, मेरे नाटक का क्या? मेरा हरिश्चंद्र बिना कपड़ों के बैठा है!’ अब मंच पर छीना-झपटी शुरू हो गई।
फूफा जी, जो सुबह से नाराज थे, उन्हें मौका मिल गया। वो चिल्लाए, ‘यही बाकी रह गया था! अब शादी में कपड़ों के लिए कुश्ती होगी!’ हाथापाई में राहुल के चोगे का एक बाजू फट गया। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि पंडित जी ने अपना पंचांग बंद कर दिया और बोले, ‘जब तक ये वस्त्र-हरण समाप्त नहीं होता, मैं फेरे नहीं करवाऊंगा।’ तभी शर्मा जी को सूझा कि पास ही के बाजार में एक दुकान खुली होगी।
उन्होंने बिट्टू को फटकारा, ‘नालायक! जा और कुछ भी लेकर आ, वरना आज तेरी भी शादी इसी स्टेज पर किसी खंभे से करा दूंगा।’ बिट्टू भागता हुआ गया। लेकिन किस्मत देखिए, उस दिन शहर में ‘येलो डे’ मनाया जा रहा था और बाजार की सारी दुकानें बंद थीं।
उसे बस एक दुकान खुली मिली, जो ‘फैंसी ड्रेस’ की थी। बिट्टू ने वहां से जो सबसे ‘नॉर्मल’ दिखा, वह उठा लिया। जब वह वापस आया और राहुल ने पैकेट खोला, तो उसकी चीख निकल गई। इस बार बिट्टू एक पीली रंग की पुलिस की वर्दी ले आया था। राहुल बोला, ‘बिट्टू, तू चाहता क्या है? मैं सात फेरे लूँ या सिमरन को गिरफ्तार करूँ?’ सिमरन ने अब माथा पकड़ लिया था। पर कहते हैं न कि कॉमेडी के बीच में ही इमोशन छिपा होता है।
सिमरन के दादाजी, जो बहुत पुराने और सुलझे हुए इंसान थे, आगे आए। उन्होंने राहुल के कंधे पर हाथ रखा और कहा, ‘बेटा, कपड़ों से शादी नहीं होती, नीयत से होती है। तुम मेरे कुर्ता-पायजामा पहन लो, वो एकदम सफेद और साफ हैं। सादगी में ही सबसे बड़ा सौंदर्य है।’ राहुल ने दादाजी की बात मान ली। उसने सफेद कुर्ता-पायजामा पहना और ऊपर से एक सादा सा दुपट्टा ले लिया।
जब वह दोबारा स्टेज पर आया, तो वह वाकई में एक सभ्य और प्यारा दूल्हा लग रहा था। लेकिन गड़बड़झाला यहीं खत्म नहीं हुआ। अब बारी थी फेरों की। पंडित घासीराम जी ने मंत्र पढ़ना शुरू किया। ‘ओम मंगलम… अरे बिट्टू, घी लाओ!’ बिट्टू हड़बड़ाहट में घी की जगह पास में रखा चाशनी का कटोरा उठा लाया। जैसे ही पंडित जी ने मंत्र पढ़कर ‘घी’ कुंड में डाला, आग जलने के बजाय धुआं उठने लगा और लड्डू की महक आने लगी। पंडित जी बोले, ‘आज अग्नि देव को बड़ी भूख लगी है, मंत्रों से ज्यादा उन्हें जलेबी की खुशबू आ रही है।’
तभी अचानक पता चला कि पंडित जी अपना चश्मा घर भूल आए हैं। उन्हें मंत्र साफ दिख नहीं रहे थे। उन्होंने बिट्टू से कहा, ‘बेटा, ये किताब पकड़ और जैसे मैं कहूँ, वैसे पढ़।’ बिट्टू ने किताब पकड़ी, लेकिन वह मंत्रों की नहीं, बल्कि सिमरन की छोटी बहन की ‘कुकिंग रेसिपी’ वाली डायरी थी, जो पंडित जी के पंचांग जैसी ही दिख रही थी। पंडित जी बोले, ‘पढ़ो बेटा!’ बिट्टू ने पढ़ना शुरू किया, ‘एक किलो मैदा लें, उसमें स्वादानुसार नमक डालें…’ पंडित जी ने जोर से कहा, ‘स्वाहा!’ मेहमान एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे।
ताऊ जी बोले, ‘शर्मा जी, ये शादी हो रही है या भटूरे बन रहे हैं?’ राहुल और सिमरन एक-दूसरे को देखकर हंसने लगे। उन्हें समझ आ गया था कि यह शादी यादगार होने वाली है।
खैर, मामला तब संभला जब सिमरन की सहेली ने अपने फोन में ‘वेडिंग मंत्रा’ ऐप डाउनलोड किया और पंडित जी को मंत्र सुनाए। फेरे शुरू हुए। जब सिंदूर भरने की बारी आई, तो बिट्टू ने फिर अपनी कलाकारी दिखाई। उसने सिंदूर की डिब्बी को इतनी जोर से खोला कि आधा सिंदूर पंडित जी की नाक पर और आधा राहुल के कुर्ते पर गिर गया। पंडित जी को इतनी जोर से छींक आई कि उनकी नकली बत्तीसी निकलकर सीधे हवन कुंड के किनारे जा गिरी। पूरे मंडप में हंसी का फव्वारा छूट पड़ा। पंडित जी अपनी बत्तीसी ढूंढ रहे थे, राहुल सिंदूर साफ कर रहा था, और बिट्टू कोने में छिपने की कोशिश कर रहा था।
अंत में, सिमरन ने खुद राहुल का हाथ पकड़ा और कहा, ‘छोड़ो ये सब, सिंदूर मैं खुद लगा लेती हूँ, वरना बिट्टू के रहते हम अगले जन्म तक यहीं बैठे रहेंगे।’ शादी संपन्न हुई। विदाई के समय जब कार चलने वाली थी, तो पता चला कि कार की चाभी बिट्टू ने उसी लाल सूटकेस में रख दी थी जो थियेटर वाला मैनेजर वापस ले गया था।
अब दूल्हा-दुल्हन को विदा करने के लिए कोई गाड़ी नहीं थी। राहुल ने सिमरन की तरफ देखा और कहा, ‘क्या तुम मेरे साथ स्कूटर पर चलोगी?’ सिमरन मुस्कुराई और बोली, ‘तुम्हारे और बिट्टू के साथ तो मैं पैदल भी जाने को तैयार हूँ, बस रास्ते में कोई नया बैग मत उठा लेना।’ राहुल और सिमरन एक पुराने स्कूटर पर बैठकर विदा हुए। पीछे बिट्टू दौड़ रहा था और चिल्ला रहा था, ‘भाई! शगुन का लिफाफा तो मेरे पास ही रह गया!’ जब राहुल ने घर पहुँचकर वह लिफाफा खोला, तो उसमें पैसे नहीं, बल्कि बिट्टू के राशन का बिल था। यह शादी रामपुर के इतिहास में ‘सबसे बड़ा गड़बड़झाला’ के नाम से दर्ज हो गई।
आज भी जब राहुल और सिमरन की शादी की एल्बम खुलती है, तो लोग फोटो देखकर नहीं, बल्कि उस दिन की कहानियाँ सुनकर हंसते हैं। और बिट्टू? वह आज भी शादियों में ‘मैनेजमेंट’ का काम संभालता है, बस फर्क इतना है कि अब घरवाले उसे सिर्फ खाली प्लेटें उठाने की जिम्मेदारी देते हैं। इस कहानी ने सबको सिखाया कि खुशियाँ महंगे कपड़ों या परफेक्ट इंतजाम में नहीं, बल्कि उन छोटे-छोटे पागलपनों में होती हैं जिन्हें हम अपनों के साथ साझा करते हैं। गड़बड़झाला तो बस एक बहाना था, असली मकसद तो सबको एक साथ हँसाना था।
