स्कूल की बंद पड़ी लाइब्रेरी

Team Maunam
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पहले तो मुझे लगा ये बस एक बंद, धूल खाती लाइब्रेरी है।

लेकिन उस दिन — जब दरवाज़ा खुद-ब-खुद खुला — मुझे समझ आया कि ये जगह बंद नहीं है। ये बस… इंतज़ार कर रही है।

— ✦ —

हमारे स्कूल के पीछे एक पुरानी लाइब्रेरी थी। कितनी पुरानी — किसी को नहीं पता था। टीचर्स से पूछो तो बस इतना मिलता — “उधर मत जाना, वो हिस्सा इस्तेमाल में नहीं है।”

कोई वजह नहीं। कोई तफ़सील नहीं। बस — मत जाना।

और जब किसी को बिना वजह मना किया जाए, तो इंसान वहीं जाता है। कम से कम मैं तो ज़रूर जाता हूँ।

एक दिन आखिरी पीरियड के बाद, मैं और राहुल — जो मेरा वो दोस्त था जो हर पागलपन में साथ होता था — चुपके से उस तरफ निकल गए।

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दरवाज़ा

दरवाज़े पर जंग इतनी मोटी थी कि लकड़ी का रंग याद नहीं रहा होगा। लेकिन एक चीज़ अजीब थी।

ताला नहीं था।

“लगता है किसी ने पहले से खोल रखा है,” राहुल ने फुसफुसाया।

मैंने कंधे से धक्का दिया।

कर्र्र…

दरवाज़ा धीरे-धीरे अंदर की तरफ झुका — और उसके साथ निकली एक ठंडी हवा। उस हवा में कुछ था। पुरानी किताबों की गंध, बंद कमरे की नमी, और कुछ और — जो बयान नहीं होता, बस महसूस होता है।

अंदर अँधेरा था। टूटी कुर्सियाँ। जाले। अलमारियों पर धूल की ऐसी परत कि उँगली फेरो तो निशान बन जाए।

सब कुछ वैसे जैसे यहाँ वक्त रुक गया हो।

और फिर — मैंने वो देखा।

एक टेबल पर, धूल के बीच — एक किताब। बिल्कुल नई। जैसे अभी-अभी रखी गई हो।

“राहुल, ये देख।”

हम दोनों धीरे-धीरे उस टेबल के पास गए। जैसे तेज़ चलने से कुछ टूट जाएगा।

आखिरी छात्र
पहला पन्ना
“अगर तुम ये पढ़ रहे हो…
तो अब तुम बाहर नहीं जा पाओगे।”

राहुल हँसा। “यार, किसी ने मज़ाक किया होगा। सीनियर्स ने छोड़ी होगी।”

मैं भी हँसने लगा था — लेकिन हँसी पूरी नहीं हुई।

धड़ाम।

दरवाज़ा बंद।

इतनी ज़ोर से कि पूरी लाइब्रेरी काँप गई। अलमारियों से धूल उड़ी। हम दोनों एक-दूसरे का हाथ थाम चुके थे — बिना जाने।

मैं भागकर दरवाज़े तक पहुँचा। खींचा। धक्का दिया।

नहीं हिला।

अंदर से बंद।

“ये किसने किया?!” राहुल की आवाज़ में वो हँसी नहीं रही थी।

— ✦ —
नाम

तभी — टेबल पर रखी किताब के पन्ने खुद पलटने लगे।

कोई हवा नहीं थी। कोई खिड़की खुली नहीं थी।

फड़फड़… फड़फड़…

हम दोनों वहीं जमे रहे। हिलने की हिम्मत नहीं।

किताब रुकी — आखिरी पन्ने पर।

मैंने धीरे-धीरे क़दम बढ़ाए। टॉर्च का उजाला उस पन्ने पर डाला।

नाम। सैकड़ों नाम। छोटे-छोटे अक्षरों में, ऊपर से नीचे, पूरा पन्ना भरा हुआ।

और नीचे — दो नाम, जो अभी-अभी उभर रहे थे। जैसे कोई अदृश्य हाथ लिख रहा हो।

धीरे-धीरे, एक-एक अक्षर…
राहुल…
आदित्य…

मेरे हाथ से टॉर्च गिरते-गिरते बची।

“ये… ये कैसे—”

और तभी — पीछे से आवाज़।

ठक… ठक… ठक…

क़दमों की। धीमी। लेकिन साफ़।

हमने पलटकर देखा।

एक लड़का। स्कूल की यूनिफॉर्म — वही सफ़ेद शर्ट, नीली पैंट जो हम पहनते थे। लेकिन उसका चेहरा — जैसे किसी ने धुंध में लपेट दिया हो। आँखें थीं, नाक थी, होंठ थे — लेकिन कुछ भी पक्का नहीं था।

वो हमारी तरफ बढ़ रहा था। एक कदम। फिर एक। इत्मीनान से। जैसे उसे कोई जल्दी नहीं थी।

क्योंकि थी भी नहीं।

“तुम यहाँ क्यों आए?” उसकी आवाज़ गूँज रही थी — जैसे एक साथ कई जगह से आ रही हो।

“ये लाइब्रेरी बंद नहीं है…
ये बस इंतज़ार कर रही थी… अगले नामों का।”

राहुल चिल्लाया — “भागो!”

और हम भागे। अलग-अलग दिशाओं में, जैसे एक साथ भागने से एक ही जाल में फँसेंगे।

— ✦ —
रैक के पीछे

मैं एक पुरानी अलमारी के पीछे दुबक गया। घुटने छाती से लगाए। साँस रोके।

बाहर — वो क़दमों की आवाज़ धीरे-धीरे घूम रही थी। जैसे ढूँढ रही हो।

और तभी — मेरे ठीक सामने वाली अलमारी से एक किताब गिरी। खुद। कोई हाथ नहीं था।

मैंने उठाई — क्योंकि उस पल दिमाग़ बंद हो जाता है और हाथ खुद चलते हैं।

किताब के बीच में एक फ़ोटो था।

काला-सफ़ेद। पुराना। इसी लाइब्रेरी का — वही अलमारियाँ, वही टेबल, वही टूटी कुर्सियाँ।

और उसमें खड़ा था — वही लड़का।

वही यूनिफॉर्म। वही धुंधला चेहरा।

फ़ोटो के नीचे — पुरानी स्याही से लिखा था:

MISSING SINCE
2003
कभी नहीं मिला

बीस साल।

वो लड़का बीस साल से यहाँ था।

और अब वो हमें ढूँढ रहा था।

मेरे कान के एकदम पास — उसी गूँजती आवाज़ में:

“अब… तुम भी यहीं रहोगे।”

मैंने पलटकर देखा।

कोई नहीं था।

लेकिन मेरे हाथ में जो किताब थी — उसका आखिरी पन्ना — जो अभी कुछ देर पहले खाली था —

उस पर लिखा था:

आखिरी छात्र
आदित्य
— ✦ —

और उसी पल — जैसे किसी ने नियम बदल दिया।

लाइट जली।

पूरी लाइब्रेरी — एक पल में — रोशन।

दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला। बिना आवाज़ के। जैसे हमेशा से खुला था।

मैं बाहर निकला। राहुल कहीं से निकलकर मेरे पास आया — चेहरा सफ़ेद, साँस उखड़ी हुई।

हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा। कुछ नहीं बोले।

बाहर — स्कूल का मैदान खाली था। एक भी बच्चा नहीं। एक भी टीचर नहीं। जैसे पूरा स्कूल कभी था ही नहीं।

हम भागे। गेट तक। बाहर तक। रुके नहीं।

अगले दिन स्कूल में अफ़वाह फैली।

किसी ने रात में लाइब्रेरी से आवाज़ें सुनी थीं।

“जैसे कोई मदद माँग रहा हो…”

मैंने और राहुल ने एक-दूसरे को देखा।

हमने कुछ नहीं कहा।

लेकिन हम जानते थे —

वो आवाज़ें अभी भी वहाँ हैं।

और अगर तुम कभी उस लाइब्रेरी के पास जाओ…

तो ध्यान से सुनना।

“हमें बाहर निकालो…”

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