अर्जुन गायब हो चुका था।
और गाँव में किसी को हैरानी नहीं हुई — यही सबसे बड़ी डरावनी बात थी। कोई रोया नहीं। किसी ने पुलिस नहीं बुलाई। बस अगले दिन से ज़िंदगी वैसे ही चलती रही, जैसे अर्जुन नाम का कोई आया ही नहीं था।
क्योंकि यहाँ गायब होना ही नियम था।
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अगली रात
गाँव के बाहर बरगद का वो पेड़ था — जिसकी जड़ें इतनी गहरी थीं कि कोई उन्हें पूरा नहीं देख पाया था। उसी के पास सात-आठ साल का रोहन खेल रहा था। माँ ने मना किया था — लेकिन बच्चे माँ की बात कब सुनते हैं।
और तभी उसने देखा।
अर्जुन भैया — गाँव की पगडंडी से चले आ रहे थे।
रोहन खुश हुआ। दौड़ने लगा उनकी तरफ — और फिर रुक गया।
कुछ था जो ठीक नहीं था।
अर्जुन की चाल — वो अजीब थी। जैसे पैर ज़मीन पर नहीं पड़ रहे हों, बस घिसट रहे हों। जैसे कोई और उन्हें भीतर से चला रहा हो और वो बस एक खोल हों।
रोहन ने धीमी आवाज़ में पूछा — “भैया… आप ठीक हो?”
अर्जुन रुका। धीरे-धीरे मुड़ा।
और मुस्कुराया।
वो मुस्कान देखकर रोहन के पैर ज़मीन से चिपक गए। होंठों पर मुस्कान थी — लेकिन आँखों में कुछ नहीं था। बस खालीपन। जैसे कोई अंदर से सब खाली करके चला गया हो।
रोहन वहाँ से भागा। बिना पीछे देखे।
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सुबह खबर पूरे गाँव में फैल गई — अर्जुन लौट आया है।
लेकिन जहाँ किसी और की वापसी पर घर में दीये जलते, यहाँ लोगों ने दरवाज़े और कस लिए।
एक बूढ़ी औरत — जो अपनी उम्र में ना जाने कितनी अमावस्याएँ देख चुकी थी — काँपते हाथों से माला थामे बुदबुदाई:
“जो वापस आता है… वो इंसान नहीं रहता।”
किसी ने उसे गलत नहीं कहा।
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दादा का घर
अर्जुन सीधे दादा के पुराने घर की तरफ गया।
दरवाज़े पर कोई नहीं था — फिर भी दरवाज़ा अपने आप खुल गया। जैसे घर उसका इंतज़ार कर रहा था।
अंदर सालों की धूल थी। मकड़ी के जाले। बंद खिड़कियों से छनती धुंधली रोशनी।
लेकिन एक चीज़ साफ थी।
दीवार पर एक पुरानी तस्वीर — धूल से अछूती, जैसे किसी ने रोज़ पोंछी हो।
अर्जुन उसके सामने जाकर रुका।
तस्वीर में दादा खड़े थे। पीछे — वही काला मंदिर। और दादा के बगल में — एक आदमी।
अर्जुन ने ध्यान से देखा।
वो आदमी — उसी जैसा था। वही चेहरा, वही कद, वही आँखें।
लेकिन तस्वीर पुरानी थी। दशकों पुरानी।
अर्जुन के हाथ — जो अब ज़्यादा काँपते नहीं थे — उसने तस्वीर को दीवार से उतारा। पीछे कुछ लिखा था। धुंधला, लेकिन पढ़ने लायक:
“गाँव बचेगा — लेकिन हर अमावस्या एक आत्मा दी जाएगी।
और हर पीढ़ी में एक इंसान — मंदिर का हिस्सा बनेगा।”
— सौदा, सन् 1961
दादा रक्षक नहीं थे।
वो सौदेबाज़ थे।
और इस सौदे की कीमत — पीढ़ी दर पीढ़ी चुकाई जा रही थी।
अब अर्जुन की पीढ़ी थी।
अब अर्जुन की बारी थी।
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रात के 3 बजे
पूरा गाँव सो रहा था।
या सो रहा था — यही लगता था।
अर्जुन धीरे-धीरे घर से बाहर निकला। पैरों में आवाज़ नहीं। साँस में आवाज़ नहीं। जैसे हवा में तैर रहा हो।
वो गाँव के बीचों-बीच आकर खड़ा हो गया।
आँखें — पूरी काली।
और फिर उसने फुसफुसाया — आवाज़ इतनी धीमी कि सिर्फ रात सुन सके:
“अगला… कौन?”
एक पल की खामोशी।
और फिर — गाँव के पूर्वी छोर पर एक घर का दरवाज़ा खुला।
धीरे। बिना किसी के हाथ लगाए।
एक आदमी बाहर आया — लुंगी, बनियान, जैसे अभी-अभी गहरी नींद से उठा हो। आँखें बंद थीं। चेहरे पर नींद की लकीरें। लेकिन कदम सीधे, तेज़ — अर्जुन की तरफ।
खिड़कियों के पीछे — लोग देख रहे थे।
कोई नहीं निकला। कोई नहीं चिल्लाया। क्योंकि जो इस गाँव में पीढ़ियों से रह रहे थे — वो जानते थे कि इस खेल को रोकने की कोशिश करने वाला खुद अगला बन जाता है।
वो आदमी अर्जुन के पास पहुँचा।
अर्जुन ने उसकी कलाई थाम ली।
और मुस्कुराया — वही मुस्कान जो रोहन ने देखी थी। जिसमें कोई इंसान नहीं बचा था।
लेकिन तभी —
उस आदमी ने आँखें खोलीं।
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काली आँखें।
वो सो नहीं रहा था।
उसने अर्जुन को देखा — और बोला, उसी शांत, खाली आवाज़ में:
“तुम अकेले नहीं हो।”
और उसी पल — एक और दरवाज़ा खुला।
फिर एक और।
फिर एक और।
एक-एक करके — गाँव के हर घर से एक इंसान निकल रहा था। चुप। स्थिर। और सबकी आँखें — वही गहरी, खाली, काली।
सब अर्जुन की तरफ देख रहे थे।
अर्जुन के अंदर — जो बचा-खुचा था — उसने पहली बार कुछ महसूस किया।
डर।
असली डर। इंसानी डर।
वो शिकार ढूँढने निकला था — और अब सामने खड़ी थी एक पूरी फ़ौज, जो उसी जैसी थी। या शायद उससे भी पुरानी।
वो पीछे हटा।
वो नहीं हटे।
कालीधार का सौदा सिर्फ एक परिवार का नहीं था।
पूरा गाँव — हर घर, हर पीढ़ी — उस मंदिर से बँधा हुआ था।
अर्जुन को लगा था वो इस खेल में नया है।
लेकिन बाकी सब — दशकों से खेल रहे थे।
और अब… वो सब उसका इंतज़ार कर रहे थे।
