लिफ्ट जो हर बार गलत मंजिल पर रुकती है

Team Maunam
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पहली बार लगा — बस एक छोटी सी खराबी है।

दूसरी बार — शायद पुरानी बिल्डिंग है, होता है।

तीसरी बार — मुझे समझ आ गया। यह लिफ्ट खराब नहीं थी।

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मैं उस बिल्डिंग में नया था। 12 मंज़िला, सालों पुरानी इमारत — जिसकी दीवारों पर सीलन की लकीरें थीं जैसे किसी ने पानी से कुछ लिखने की कोशिश की हो। गलियारों में एक हल्की बदबू हमेशा रहती थी — न इतनी तेज़ कि शिकायत करो, न इतनी कम कि भूल जाओ।

8वीं मंज़िल पर मेरा फ्लैट था।

पहली ही रात, थका हुआ, सामान से भरे हाथों के साथ लिफ्ट में घुसा। “8” दबाया।

लिफ्ट ऊपर चली — पहली… दूसरी… तीसरी… चौथी मंज़िल।

और फिर अचानक —

टिंग!दरवाज़ा खुला।

बाहर अँधेरा था। न कोई लाइट, न कोई फ्लोर नंबर — बस एक लंबा खाली गलियारा, जिसमें हवा तक नहीं चल रही थी। जैसे उस जगह से हवा का भी कोई वास्ता नहीं।

मैंने सोचा — बिजली गई होगी, या कोई अधूरा फ्लोर होगा।

जल्दी से “Door Close” दबाया। लिफ्ट बंद हुई।

उस रात मैंने खुद को यकीन दिलाया कि सब ठीक है। नई जगह है, दिमाग़ थका हुआ है।

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दूसरी बारअगले दिन शाम को — फिर वही।

“8” दबाया। लिफ्ट चली। लेकिन इस बार सातवीं और आठवीं मंज़िल के बीच कहीं रुकी — जहाँ कोई मंज़िल होनी नहीं चाहिए थी।

टिंग!दरवाज़ा खुला।

और इस बार मैंने ठीक से देखा।

वो कोई फ्लोर नहीं था — एक कमरा था। दीवारों पर पुराने भूरे धब्बे। और बीच में एक टूटी हुई कुर्सी।

कुर्सी पर — कोई था।

परछाई में। सिर झुका हुआ। लेकिन कुछ था जो बता रहा था — वो मुझे देख रहा है।

मेरे हाथ बटन पर पहले पहुँचे, दिमाग़ बाद में।

“Door Close।”

लिफ्ट बंद हुई।

मेरा दिल उस रात देर तक धड़कता रहा।

— ✦ —

चौकीदारअगली सुबह मैं नीचे गया। चौकीदार — एक उम्रदराज़ आदमी, जो हमेशा अपनी छोटी-सी केबिन में बैठा चाय पीता रहता था — उससे पूछा।

“भैया, ये लिफ्ट बीच में क्यों रुकती है?”

वो रुका। चाय का कप नीचे रखा। मेरी तरफ देखा।

“आपने… नौवीं का बटन तो नहीं दबाया था?”

“नहीं। मैं आठवीं पर रहता हूँ।”

उसका चेहरा कुछ बदला। आँखों में वो भाव आया जो तब आता है जब कोई कुछ जानता हो लेकिन बताना न चाहे।

“नौवीं मंज़िल… इस बिल्डिंग में है ही नहीं। मतलब — कभी थी। लेकिन दस साल पहले वहाँ एक हादसा हुआ। एक आदमी लिफ्ट में फँस गया। तीन दिन तक कोई नहीं पहुँच पाया। जब दरवाज़ा खुला… वो ज़िंदा नहीं था। लेकिन उसकी आँखें खुली हुई थीं। जैसे अभी भी किसी का इंतज़ार कर रहा हो।”

उस रात मैंने सीढ़ियाँ लीं।

लेकिन आप कब तक सीढ़ियाँ चढ़ते हो।

— ✦ —

तीसरी बारएक हफ्ते बाद। देर रात। लिफ्ट में।

“8” दबाया। कोने में खड़ा हो गया — जैसे कोने में रहने से कुछ फ़र्क पड़ता है।

लिफ्ट ऊपर चली — पाँचवीं… छठी… सातवीं…

टिंग!दरवाज़ा खुला।

और वो वहाँ था।

सामने। सीधे। मेरे सामने।

पीला चेहरा — उस पीलेपन की तरह जो किसी बीमारी से नहीं, किसी और चीज़ से आता है। आँखें सूखी — जैसे सालों से नमी गई हो। और होंठों पर एक मुस्कान — जो किसी ख़ुशी से नहीं आई थी।

उसने कहा —

“तुम… गलत मंज़िल पर आ गए हो।”मैं हिल नहीं पाया। पैर ज़मीन से चिपके हुए।

उसने हाथ बढ़ाया — और लिफ्ट के अंदर कदम रखा।

दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

हम दोनों — अंदर।

मैंने काँपते हाथों से “8” दबाया।

और तभी — पैनल पर एक और बटन जल उठा।

“9”

वो बटन पैनल पर था ही नहीं। मैंने सौ बार देखा था। लेकिन अभी — जल रहा था। धीमी लाल रोशनी में।

उस आदमी ने धीरे से कहा —

“अब… तुम सही मंज़िल पर जा रहे हो।”लिफ्ट ऊपर चली। आठवीं… और फिर — नौवीं।

टिंग!दरवाज़ा खुला।

मैं बाहर था।

लेकिन ये मेरा फ्लोर नहीं था।

वही अँधेरा गलियारा। दूर वो टूटी कुर्सी। वही हवा जो नहीं थी।

मैंने घबराकर पीछे मुड़ा।

लिफ्ट के अंदर — वो आदमी नहीं था।

वहाँ मैं था।

मेरा चेहरा। मेरे कपड़े। लेकिन आँखें — वही सूखी, पीली, इंतज़ार करती आँखें।

वो मुझे देख रहा था।

और मुस्कुरा रहा था।

दरवाज़ा धीरे-धीरे बंद हुआ।

और तब — उस अँधेरे गलियारे में खड़े-खड़े — मुझे समझ आया।

लिफ्ट कभी गलत मंज़िल पर नहीं रुकती थी।

वो हर बार किसी को उसकी “सही जगह” पर छोड़ती थी।

दस साल पहले उस आदमी को। आज मुझे।

और अब — लिफ्ट नीचे जा चुकी थी। अगले के लिए।

अगली बार जब तुम किसी पुरानी बिल्डिंग में लिफ्ट लो —

और लिफ्ट किसी ऐसी मंज़िल पर रुके जहाँ तुमने बटन नहीं दबाया —

दरवाज़ा खुलने से पहले —

एक काम करना।

पैनल पर नज़र डालना।

अगर “9” जल रहा हो —

बाहर मत निकलना।

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