मध्यप्रदेश के पहाड़ों के बीच दबा हुआ था एक गाँव — कालीधार।
नक्शे पर था, लेकिन जैसे था नहीं। बस के रूट में नहीं। मोबाइल नेटवर्क कभी-कभी। और आने वाले कम, जाने वाले और भी कम।
यहाँ एक डर था — हवा में, मिट्टी में, लोगों की आँखों में। किसी इंसान का नहीं। किसी जानवर का नहीं।
अमावस्या की रात का।
गाँव में एक नियम था — लिखा नहीं था कहीं, पर सबको पता था — सूरज ढलते ही कोई दरवाज़ा नहीं खुलेगा। कोई खिड़की नहीं। कोई आवाज़ बाहर नहीं जाएगी।
और फिर भी — हर महीने — कोई एक गायब हो जाता था।
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अर्जुन
अर्जुन शहर का लड़का था। MBA किया था। हर चीज़ का तर्क निकालता था।
दादा की ज़मीन का मामला था — इसीलिए आया था। दो-तीन दिन में निपटाकर वापस जाना था।
जब गाँव वालों ने अमावस्या की बात की, तो वो हँसा।
“ये सब अंधविश्वास है। कोई इंसान ही यह सब कर रहा होगा — शायद ज़मीन हड़पने के लिए, शायद डराने के लिए। मैं पता करूँगा।”
गाँव में सन्नाटा छा गया।
किसी ने कुछ नहीं कहा। बस एक बूढ़ा आगे आया — झुकी कमर, गहरी आँखें — और धीरे से बोला:
“बेटा… आज अमावस्या है। रात होने से पहले घर पहुँच जाना।”
अर्जुन ने सिर हिलाया — हाँ, हाँ, ठीक है — और मन में सोचा: रात को ही निकलूँगा।
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वो रात
रात के 11 बजे।
पूरा गाँव मरा हुआ था। एक भी बल्ब नहीं। एक भी कुत्ता नहीं भौंक रहा था — और ये सबसे अजीब बात थी, क्योंकि गाँवों में कुत्ते हमेशा भौंकते हैं।
हवा तक नहीं चल रही थी। पत्ते स्थिर। पेड़ जमे हुए। जैसे पूरी प्रकृति ने साँस रोक ली हो।
अर्जुन टॉर्च लेकर निकला।
और तभी — जंगल की तरफ से — एक आवाज़ आई।
टुन… टुन… टुन…
घंटी। मंदिर की। बहुत धीमी। लेकिन इस सन्नाटे में जैसे सीधे कान में पड़ रही हो।
अर्जुन रुका। एक पल सोचा — वापस जाऊँ।
लेकिन पैर आगे बढ़ गए।
शायद यही तो वो इंसान है जो लोगों को डरा रहा है।
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जंगल का रहस्य
जंगल घना था। टॉर्च की रोशनी दस कदम से ज़्यादा नहीं जा रही थी। पेड़ों के बीच से गुज़रते हुए अर्जुन को एक अजीब बात महसूस हुई — रास्ता सीधा नहीं था, लेकिन वो भटक भी नहीं रहा था। जैसे जंगल खुद उसे किसी तरफ ले जा रहा हो।
और फिर — पेड़ों के बीच से — एक मंदिर।
पुराना। बहुत पुराना। दीवारों पर काई। पत्थर टूटे हुए। लेकिन अंदर से रोशनी — न दीये की, न बल्ब की — बस एक धुंधली, काँपती हुई रोशनी।
गाँव में इस मंदिर का नाम कोई नहीं लेता था। अर्जुन को अब पता चला क्यों।
वो अंदर झाँका।
काली मूर्ति के सामने — एक आकृति खड़ी थी।
इंसान जैसी। लेकिन चेहरा जैसे धुएँ से बना हो — न नाक साफ, न आँखें — बस दो काले गड्ढे जहाँ आँखें होनी चाहिए थीं।
उसने सिर घुमाया। अर्जुन की तरफ।
और बोला — बिना होंठ हिलाए —
“एक और आ गया…”
अर्जुन का पैर पीछे हटा।
और उसी पल — पैर के नीचे सूखी टहनी टूटी।
टक!
जैसे किसी ने सिग्नल दिया हो।
मंदिर की दीवारों पर जो परछाइयाँ थीं — वो एक साथ, एक झटके में, उसकी तरफ मुड़ गईं।
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अर्जुन भागा।
जितनी तेज़ हो सके। टॉर्च हाथ में थी, साँस फूल रही थी, पाँव काँट-पत्थर से छिल रहे थे — लेकिन रुकना नहीं था।
पाँच मिनट। दस मिनट। भागता रहा।
और फिर — रुका।
सामने वही मंदिर था।
वही टूटी दीवारें। वही काँपती रोशनी।
वो घूमकर वापस उसी जगह आ गया था — बिना जाने, बिना मुड़े।
और तब वो आवाज़ आई। चारों तरफ से। जैसे जंगल खुद बोल रहा हो:
“इस गाँव का हर इंसान एक वादा करके यहाँ रहता है।”
“हर अमावस्या — एक आत्मा इस मंदिर को दी जाती है।”
“और आज… तुम्हारी बारी है।”
अर्जुन चिल्लाना चाहता था। लेकिन उसकी आवाज़ — जैसे हवा में घुल गई।
टॉर्च बुझ गई।
और अंधेरे में — वो आकृति फिर सामने थी।
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अगली सुबह
सूरज निकला। चिड़ियाँ बोलीं। गाँव में चूल्हे जले।
सब सामान्य था।
बस अर्जुन कहीं नहीं था।
उसका बैग कमरे में था। फोन बेड पर। चप्पलें दरवाज़े के बाहर।
गाँव वालों ने पुलिस को फोन नहीं किया। किसी ने कोई खोज नहीं की। बस चुपचाप अपना काम करते रहे — जैसे यह पहले भी हो चुका हो। जैसे यह होना ही था।
सरपंच ने मंदिर की तरफ देखा। और धीरे से, इत्मीनान से, बोला —
“अगली अमावस्या तक… गाँव सुरक्षित है।”
उसी रात।
गाँव के एक छोटे बच्चे की नींद खुली।
उसने खिड़की से बाहर झाँका।
मंदिर के बाहर — कोई खड़ा था।
वही कद। वही कपड़े।
अर्जुन।
बच्चे ने हाथ हिलाया।
वो आकृति नहीं हिली।
बस धीरे-धीरे — अपना चेहरा ऊपर उठाया।
आँखें… पूरी काली थीं।
