वो फुसफुसाहट अभी भी मेरे कानों में थी —
“अब… तुम वापस नहीं जाओगे…”
मैंने घबराकर पीछे मुड़कर देखा।
कोई नहीं था।
सिर्फ भीड़। सामान्य चेहरे। सुबह की भागदौड़। सब ठीक-ठाक।
लेकिन कुछ था जो ठीक नहीं था — किसी की भी आवाज़ मुझ तक नहीं पहुँच रही थी। होंठ हिल रहे थे, बच्चे भाग रहे थे, ट्रेनें आ-जा रही थीं — पर जैसे किसी ने मेरी दुनिया का वॉल्यूम बंद कर दिया हो।
मैंने गहरी साँस ली। “ये सब सपना था। बस सपना।”
लेकिन जेब में उँगली लगाई — और वो जंग लगा, अधजला टिकट अभी भी वहाँ था।
सपने इतने असली नहीं होते।
— ✦ —
मैं धीरे-धीरे स्टेशन से बाहर निकलने लगा।
हर कदम के साथ लगता था जैसे ज़मीन मुझे छोड़ नहीं रही। जैसे पैरों में कोई अदृश्य ज़ंजीर बंधी हो जो हर कदम पर और कसती जाए।
गेट के करीब पहुँचा ही था —
टिक… टिक… टिक…
वही आवाज़। फिर से। इस बार और साफ़। जैसे सिर के अंदर से आ रही हो।
मैंने घड़ी देखी।
अभी भी 3:00 AM।
बाहर धूप थी। लोग थे। सुबह थी। लेकिन मेरी घड़ी उसी रात में अटकी थी।
और तभी —
मेरे सामने एक आदमी आकर रुका।
काला कोट। सीधी पीठ। और आँखें —
उन्हें देखकर मेरे पेट में कुछ पलट गया। वही खालीपन। वही गहराई। जैसी उस लड़की की आँखों में थी।
वो धीरे से मुस्कुराया।
“टिकट दिखाओ।”
मैं बोल नहीं पाया। बस उसे देखता रहा।
“क… कौन हो तुम?”
वो एक कदम और पास आया। इत्मीनान से।
“कंडक्टर।”
— ✦ —
“लेकिन… ट्रेन तो—”
“चल रही है।”
उसने मेरी बात बीच में ही काट दी। बिना झिझके।
मैंने चारों तरफ देखा।
भीड़ गायब हो रही थी। एक-एक करके। जैसे धुंध में घुल रहे हों — न कोई गया, न कोई भागा, बस… मिटते गए।
पल भर में — सिर्फ मैं था। और वो।
“लेट हो रहे हो,” उसने कहा, उसी ठंडे लहजे में। “ट्रेन इंतज़ार नहीं करती।”
मेरे पैर खुद-ब-खुद पीछे हटने लगे।
“नहीं। मैं कहीं नहीं जा रहा।”
वो हँसा। वो किस्म की हँसी जो डराती नहीं, बल्कि तोड़ती है।
“तुम पहले ही जा चुके हो।”
— ✦ —
और उसी पल — दिमाग में कुछ कड़का।
एक झटका।
ब्रेक की चीख।
धातु टूटने की आवाज़।
और फिर — अंधेरा।
वो याद नहीं थी पहले। अभी आई। और अब जा नहीं रही थी।
मैं ज़मीन पर खड़ा था — लेकिन अंदर से बिल्कुल खोखला।
“नहीं… ये सच नहीं है…” आवाज़ खुद मेरी थी, लेकिन जैसे दूर से आ रही हो।
लेकिन कहीं गहरे में — एक आवाज़ और थी।
यही सच है।
कंडक्टर ने हाथ बढ़ाया।
“आओ। तुम्हारी सीट खाली है।”
सीट नंबर 27।
— ✦ —
स्टेशन बदल रहा था।
दीवारें पुरानी पड़ गईं। रंग उखड़ा। लाइटें टिमटिमाने लगीं। और हवा में वही गंध लौट आई — गीली मिट्टी, जंग, और कुछ और जो बयान नहीं होती।
दूर पटरी पर — वो खड़ी थी।
ट्रेन नंबर 666।
मैंने रुकने की कोशिश की। सच में की। लेकिन पैर मेरे नहीं रहे थे। वो बढ़ते रहे — एक के बाद एक — जैसे किसी ने मेरी इच्छाशक्ति को चुरा लिया हो।
कोच S5।
सीट 27।
और सामने — वही बुजुर्ग। वही शांत चेहरा। वही आँखें जो सब जानती थीं।
उसने देखा और हल्के से मुस्कुराया।
“वापस आ गए?”
मैं बैठ गया।
और बैठते ही एक अजीब एहसास हुआ — ये पहली बार नहीं था। जैसे ये सीट मुझे पहचानती थी। जैसे इसमें मेरा निशान पहले से छपा हुआ था।
— ✦ —
बगल वाली सीट पर हलचल हुई।
वो लड़की।
वही सफेद कपड़े। वही काली आँखें। लेकिन इस बार उनमें नफरत नहीं थी — बस एक थकी हुई पहचान।
“अब समझे?” उसने पूछा।
मैंने कुछ नहीं कहा। सिर हिला दिया।
“हम सब इसी ट्रेन के हैं,” उसने कहा, जैसे कोई पुरानी बात याद दिला रही हो। “जो एक बार चढ़ गया… वो कभी नहीं उतरा।”
“लेकिन मैं तो स्टेशन पर था… मैं बाहर था…”
वो हल्का सा हँसी। उसमें दर्द था।
“वो सिर्फ दिखाया गया था तुम्हें। ताकि तुम खुद चलकर वापस आओ। जबरदस्ती से नहीं — अपनी मर्ज़ी से।”
मेरे अंदर कुछ टूटा। जोर से नहीं। धीरे से। जैसे कोई पुरानी दीवार बिना शोर के ढह जाती है।
— ✦ —
टिक… टिक… टिक…
घड़ी की आवाज़ पूरी बोगी में फैल गई।
सब चुप हो गए। सबकी आँखें मुझ पर।
कंडक्टर अंदर आया। एक पुरानी, मुड़ी हुई लिस्ट हाथ में। धीरे-धीरे नाम पढ़ता रहा। और फिर — रुका।
उसकी उँगली एक नाम पर ठहर गई।
उसने मेरी तरफ देखा। वही मुस्कान।
“अगला स्टेशन… तुम्हारा है।”
मेरी साँस अटकी।
“लेकिन यहाँ से तो कोई उतरता—”
वो झुका। मेरे एकदम पास आया। और फुसफुसाया —
“उतरते नहीं… बनते हैं।”
— ✦ —
ट्रेन धीमी हुई।
बाहर वही धुंध। वही सन्नाटा जो साँस लेने नहीं देता।
दरवाज़ा खुला।
ठंडी हवा आई — और उसके साथ, प्लेटफॉर्म पर एक आकृति।
मेरे जैसी।
वही कपड़े। वही कद। वही चेहरा।
लेकिन आँखें —
पूरी काली।
उसने मुझे देखा। और धीरे से — जैसे कोई पुरानी ज़िम्मेदारी सौंप रहा हो — कहा:
“तुम्हारी जगह… अब मेरी है।”
मैं चिल्लाना चाहता था। मुँह खुला। लेकिन —
आवाज़ थी ही नहीं।
ट्रेन चल पड़ी।
और मैं — सीट नंबर 27 पर — बस देखता रह गया।
अब हर रात…
3:00 AM पर…
मैं किसी नए यात्री का इंतज़ार करता हूँ।
जो गलती से — या शायद किस्मत से — ट्रेन नंबर 666 में चढ़ जाए।
और जब वो बैठेगा सीट नंबर 27 पर…
तो मैं बस इतना ही कहूँगा —
“मत आना चाहिए था…”
