यह कहानी जगन्नाथ मंदिर से जुड़ी लोककथाओं, मान्यताओं और ऐतिहासिक संदर्भों से प्रेरित एक रचनात्मक कथा है। इसमें कुछ घटनाएँ और पात्र काल्पनिक हो सकते हैं। इसका उद्देश्य केवल मनोरंजन और साहित्यिक प्रस्तुति है।
रात के ठीक तीन बज रहे थे। पुरी के समुद्र की लहरें आज सामान्य से ज्यादा शोर कर रही थीं, जैसे वो चिल्ला-चिल्लाकर किसी आने वाले खतरे की गवाही दे रही हों। आर्यन के हाथ में वो पीतल की पुरानी चाबी पसीने से गीली हो चुकी थी। उसके पिता, जो मंदिर के मुख्य पुजारियों में से एक थे, ने मरते वक्त सिर्फ एक ही बात कही थी— ‘आर्यन, जगन्नाथ मंदिर की उन अधूरी मूर्तियों के पीछे एक ऐसा सच दबा है, जिसे दुनिया ने कभी नहीं देखा। उस सच को पूरा मत होने देना, वरना…’
‘वरना क्या पिता जी?’ आर्यन का वो सवाल आज भी हवा में तैर रहा था। पिता की बात अधूरी रह गई थी, ठीक उन मूर्तियों की तरह। आर्यन एक आर्किटेक्ट था, लॉजिक पर चलने वाला इंसान। लेकिन पिछले सात दिनों से उसे जो सपने आ रहे थे, उन्होंने उसे पागलपन की हद तक पहुँचा दिया था। सपने में उसे एक बूढ़ा मूर्तिकार दिखता, जो बंद कमरे में छैनी-हथौड़ी चला रहा था, और फिर अचानक चारों तरफ खून ही खून फ़ैल जाता।
आज ‘नव कलेवर’ की रात थी। वो रहस्यमयी रात जब भगवान की मूर्तियाँ बदली जाती हैं। पूरे शहर की बिजली काट दी गई थी। सन्नाटा इतना गहरा था कि आर्यन को अपनी खुद की धड़कनें किसी नगाड़े की तरह सुनाई दे रही थीं। उसे उस वर्जित गलियारे की तरफ बढ़ना था, जहाँ जाना मौत को दावत देने जैसा था।
बंद दरवाज़े की पुकार
आर्यन मंदिर के अंदरूनी हिस्से में था। यहाँ की हवा में चन्दन और सदियों पुरानी नमी की एक अजीब सी महक थी। हाथ में पकड़ी टॉर्च की रोशनी कांप रही थी। तभी उसे वो आवाज सुनाई दी। ‘ठक… ठक… ठक…’
पत्थर पर चोट करने की आवाज? इस वक्त? जब पूरा मंदिर खाली है और मुख्य पुजारी की आँखों पर पट्टी बंधी हुई है? आर्यन के रोंगटे खड़े हो गए। वो आवाज उस कोठरी से आ रही थी जिसे पिछले 500 सालों से नहीं खोला गया था। लोककथाओं में कहा जाता है कि राजा इंद्रद्युम्न की रानी गुंडिचा ने उत्सुकता में आकर उस कमरे का दरवाज़ा खोल दिया था जहाँ विश्वकर्मा मूर्तियाँ बना रहे थे, और इसी वजह से मूर्तियाँ अधूरी रह गईं।
लेकिन आर्यन को आज कुछ और ही महसूस हो रहा था। जैसे वो दरवाज़ा गलती से नहीं खुला था, बल्कि उसे किसी ‘चीज’ ने अंदर से धक्का दिया था। आर्यन ने अपनी जेब से वो चाबी निकाली। चाबी का छेद देखते ही उसे झटका लगा। वो चाबी नहीं थी, वो एक पुराने यंत्र का हिस्सा था। जैसे ही उसने उसे दरवाज़े के खांचे में डाला, एक भारी गड़गड़ाहट के साथ पत्थर सरकने लगे।
अंदर अंधेरा इतना घना था कि टॉर्च की रोशनी भी उसमें डूब रही थी। जैसे ही आर्यन ने कदम अंदर रखा, पीछे से दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
अधूरापन या कोई साजिश?
‘कौन है यहाँ?’ आर्यन की आवाज कांप रही थी। सामने तीन विशाल आकृतियाँ खड़ी थीं। जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा। लेकिन ये वो मूर्तियाँ नहीं थीं जो बाहर भक्त देखते थे। ये मूर्तियाँ कच्ची थीं, आधी बनी हुई, और उनकी आँखों वाली जगह पर सिर्फ गहरे काले गड्ढे थे।
अचानक, कोठरी के कोने से एक परछाईं उभरी। एक बेहद दुबला-पतला इंसान, जिसकी खाल हड्डियों से चिपकी हुई थी। उसकी आँखें नहीं थीं, फिर भी वो आर्यन को ही देख रहा था।
‘तुम आ गए, आर्यन,’ उस बूढ़े की आवाज किसी सूखी हुई पत्ती के रगड़ने जैसी थी। ‘तुम्हारे पिता ने तुम्हें नहीं रोका?’
‘मेरे पिता की हत्या हुई है! मुझे पता है कि इसका ताल्लुक इस मंदिर के उस राज से है जिसे आप लोग छुपा रहे हैं,’ आर्यन ने चिल्लाकर कहा।
बूढ़ा हँसा। वो हँसी डरावनी थी। ‘राज? बेटा, ये मूर्तियाँ अधूरी नहीं छोड़ी गईं। इन्हें अधूरा रखा गया है। क्या तुम्हें पता है कि अगर जगन्नाथ के हाथ पूरे बन गए, तो क्या होगा?’
आर्यन खामोश रहा। उसका लॉजिकल दिमाग अब जवाब दे रहा था। बूढ़े ने एक पुरानी ताड़पत्र की पांडुलिपि उठाई और उसे आर्यन की ओर बढ़ाया। उसमें लिखा था— ‘जगन्नाथ (जगत के नाथ) तभी तक इस संसार को संभाल रहे हैं जब तक वो स्वयं अधूरे हैं। जिस दिन उनका स्वरूप पूर्ण हो गया, उस दिन सृजन और विनाश का चक्र रुक जाएगा। समय ठहर जाएगा।’
ब्रह्म पदार्थ का खौफनाक सच
‘नव कलेवर’ के समय मूर्तियों के अंदर से एक चीज़ निकाली जाती है जिसे ‘ब्रह्म पदार्थ’ कहते हैं। पुजारी की आँखों पर पट्टी बांधी जाती है और हाथों पर कपड़ा लपेटा जाता है ताकि वो उसे देख या महसूस न कर सके।
‘मेरे पिता ने उस रात पट्टी हटा दी थी, है ना?’ आर्यन ने धीरे से पूछा।
बूढ़े की आँखें (जो थीं ही नहीं) गीली हो गईं। ‘उसने सच देख लिया था। उसने देख लिया था कि ब्रह्म पदार्थ कोई पत्थर या धातु नहीं है। वो एक धड़कता हुआ ‘दिल’ है। और वो दिल किसी देवता का नहीं, बल्कि इस धरती के सबसे पहले इंसान का है, जो आज भी जीवित है।’
आर्यन का दिमाग चकराने लगा। ‘क्या बकवास है ये?’
‘यही सच है आर्यन। ये मूर्तियाँ भगवान नहीं, बल्कि एक कैदखाना हैं। उस ऊर्जा को कैद करने के लिए जो अगर बाहर आ गई, तो पूरी मानवता को निगल जाएगी। तुम्हारे पिता ने उस रात उस ऊर्जा को मुक्त करने की कोशिश की थी क्योंकि उन्हें लगा कि वो ‘मोक्ष’ दे रहे हैं। लेकिन वो ये भूल गए कि कुछ चीज़ें अधूरी ही भली होती हैं।’
तभी आर्यन को अपनी गर्दन के पीछे एक ठंडी छुअन महसूस हुई। उसने पीछे मुड़कर देखा तो वहां कोई नहीं था, लेकिन मूर्तियों की स्थिति बदल चुकी थी। जगन्नाथ की मूर्ति अब दरवाज़े की तरफ मुड़ चुकी थी। उनकी वो गोल, बिना पुतली वाली आँखें अब आर्यन को घूर रही थीं।
आखिरी फैसला
अचानक, मंदिर के बाहर जोर से बिजली कड़की। आर्यन को लगा जैसे जमीन हिल रही है। बूढ़े ने आर्यन का हाथ पकड़ा। उसके हाथ बर्फ जैसे ठंडे थे।
‘आज रात, तुम्हें चुनाव करना होगा आर्यन। तुम्हारे पिता ने जो काम अधूरा छोड़ा था, उसे पूरा करोगे या इस रहस्य को अपने साथ दफ़न कर दोगे? देखो!’
बूढ़े ने मूर्ति के सीने की तरफ इशारा किया। वहां एक धीमी सी रोशनी चमक रही थी। एक धक-धक की आवाज आने लगी। धक-धक… धक-धक… ये किसी मशीन की आवाज नहीं थी। ये एक जिंदा इंसान के दिल की धड़कन थी।
आर्यन ने करीब जाकर देखा। मूर्ति की लकड़ी के अंदर कुछ हलचल हो रही थी। जैसे कोई चीज़ बाहर निकलने के लिए छटपटा रही हो। आर्यन के हाथ में जो यंत्र था, वो उस धड़कन के साथ तालमेल बिठाने लगा।
‘अगर तुम इस यंत्र को यहाँ लगा दोगे, तो ये मूर्तियाँ पूर्ण हो जाएंगी। उनके हाथ बन जाएंगे, उनकी आँखें खुल जाएंगी। और तुम्हारे पिता को वो शांति मिलेगी जिसके लिए उन्होंने अपनी जान दी,’ बूढ़े ने फुसफुसाते हुए कहा।
आर्यन के दिमाग में अपने पिता का चेहरा घूम गया। उनकी आखिरी चीख, उनका वो तड़पना। क्या वो वाकई इस बोझ से दुनिया को आज़ाद करना चाहते थे? आर्यन ने यंत्र मूर्ति के करीब ले जाना शुरू किया।
जैसे-जैसे यंत्र पास जा रहा था, धड़कनें तेज होती जा रही थीं। पूरे मंदिर में एक अजीब सी गूँज पैदा होने लगी। समुद्र की लहरें अब मंदिर की दीवारों से टकराने लगी थीं।
वो भयानक अहसास
जैसे ही आर्यन यंत्र लगाने वाला था, उसे अपने पिता की आवाज सुनाई दी। लेकिन ये आवाज उसके कान में नहीं, उसके मन में थी।
‘भागो आर्यन! ये वो नहीं है जो तुम समझ रहे हो! ये कोई भगवान नहीं, ये वो अंत है जिसे हमने सदियों से रोक कर रखा है!’
आर्यन ठिठक गया। उसने बूढ़े की तरफ देखा। बूढ़े के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान थी। उसकी खाल अब पिघल रही थी। वो इंसान नहीं था। वो कुछ और ही था जो सदियों से इस कैदखाने के खुलने का इंतज़ार कर रहा था।
‘तुम कौन हो?’ आर्यन चिल्लाया।
‘मैं वो हूँ जो समय के शुरू होने से पहले था और समय के खत्म होने के बाद भी रहूँगा। लगाओ इसे आर्यन! पूर्ण करो अपने ईश्वर को!’
आर्यन ने अपनी पूरी ताकत लगाई और यंत्र को मूर्ति में लगाने के बजाय ज़मीन पर पटक कर तोड़ दिया।
एक जोरदार धमाका हुआ। वो बूढ़ा आकृति चीखते हुए धुएं में बदल गई। मंदिर की दीवारें कांपीं और फिर सब कुछ शांत हो गया।
अधूरा ही सच है
जब अगली सुबह मंदिर के कपाट खुले, तो हज़ारों भक्तों की भीड़ ‘जय जगन्नाथ’ के नारे लगा रही थी। आर्यन मंदिर की सीढ़ियों पर बैठा था, उसकी आँखें लाल थीं।
मुख्य पुजारी उसके पास आए और उसके कंधे पर हाथ रखा। ‘तुम अंदर गए थे ना?’
आर्यन ने कोई जवाब नहीं दिया।
पुजारी ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘दुनिया को लगता है कि ये मूर्तियाँ अधूरी हैं क्योंकि मूर्तिकार चला गया था। पर सच तो ये है कि हम सब अधूरे हैं। और भगवान का ये स्वरूप हमें ये सिखाता है कि पूर्णता सिर्फ अंत में है। और अंत अभी बहुत दूर है।’
आर्यन उठ खड़ा हुआ। उसने अपनी जेब में हाथ डाला। उस यंत्र का एक छोटा सा टुकड़ा अभी भी उसके पास था। उसने उसे समुद्र की लहरों में फेंक दिया।
जगन्नाथ मंदिर का वो रहस्य आज भी उन अधूरी मूर्तियों के भीतर धड़क रहा है। लोग जाते हैं, माथा टेकते हैं और लौट आते हैं। पर कोई नहीं जानता कि उन लकड़ी के ढांचों के अंदर क्या कैद है। शायद वो अधूरापन ही है, जो इस दुनिया को बचाए हुए है।
आर्यन जब पुरी से वापस मुंबई जा रहा था, तो उसने ट्रेन की खिड़की से पीछे मुड़कर देखा। मंदिर का झंडा हवा की विपरीत दिशा में लहरा रहा था—एक और ऐसा रहस्य जिसका कोई वैज्ञानिक जवाब नहीं था।
उसने अपनी डायरी में आखिरी लाइन लिखी: ‘कुछ सवालों के जवाब न मिलना ही बेहतर है। क्योंकि अगर जवाब मिल गया, तो शायद सवाल करने वाला ही न रहे।’
