ज़हर का प्याला प्रह्लाद के होंठों से बस कुछ ही इंच दूर था। महल के गलियारों में सन्नाटा ऐसा था कि राजा हिरण्यकश्यप की भारी सांसें भी साफ सुनाई दे रही थीं। उसकी आँखों में खून उतरा था, चेहरे पर पागलपन की लकीरें थीं। उसने गर्जना की, “पी ले इसे प्रह्लाद! और दिखा मुझे, कहाँ छुपा है तेरा वो नारायण? अगर आज तू बच गया, तो मैं मान लूँगा कि ब्रह्मांड में मुझसे भी बड़ी कोई ताकत है।”
पांच साल का वो छोटा सा बच्चा, जिसकी आँखों में डर का नामोनिशान नहीं था, उसने शांति से अपने पिता की ओर देखा। उसकी मुस्कुराहट ने हिरण्यकश्यप के भीतर की आग को और भड़का दिया। प्रह्लाद ने धीरे से कहा, “पिताजी, वह कहीं छुपा नहीं है। वह तो हर जगह है। इस ज़हर में भी वही है।”
जैसे ही प्रह्लाद ने प्याला होंठों से लगाया, रानी कयाधू की चीख महल की दीवारों से टकराकर दम तोड़ गई। सबको लगा कि आज अंत निश्चित है। प्रह्लाद ने एक घूँट में सारा हलाहल पी लिया। लेकिन अगले ही पल जो हुआ, उसने पहरेदारों के हाथों से तलवारें गिरा दीं। प्रह्लाद के चेहरे पर मौत की नीलिमा नहीं, बल्कि एक दैवीय चमक थी। वह ज़हर, जो एक हाथी को क्षण भर में राख कर सकता था, प्रह्लाद के लिए अमृत बन चुका था।
मौत का पागलपन
हिरण्यकश्यप का सिंहासन डोलने लगा था। यह सिर्फ एक पिता और पुत्र की लड़ाई नहीं थी, यह अहंकार और अस्तित्व की जंग थी। उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया, “इसे पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी से नीचे फेंक दो! पत्थरों से इसका शरीर कुचल जाना चाहिए!”
सैनिकों ने प्रह्लाद को बेड़ियों में जकड़ा और ऊँचे पर्वत की ओर ले चले। कयाधू नंगे पैर पीछे भागी, रोती रही, गिड़गिड़ाती रही, पर राजा का दिल पत्थर हो चुका था। पहाड़ की चोटी से जब प्रह्लाद को नीचे धकेला गया, तो बादलों ने अपनी दिशा बदल ली। हवाएं थम गईं। गिरने वाला शरीर पत्थर से टकराने ही वाला था कि अचानक हवा में जैसे किसी के अदृश्य हाथों ने उसे थाम लिया। प्रह्लाद फूलों की सेज पर गिरने की तरह धरती पर उतरे।
महल में जब यह खबर पहुंची, तो हिरण्यकश्यप ने अपनी तलवार से खुद के सिंहासन पर वार किया। वह चिल्लाया, “जादूगरी! यह सब माया है! उसे पागल हाथियों के सामने डाल दो! उसे साँपों की कोठरी में बंद कर दो!”
प्रह्लाद को एक ऐसे तहखाने में ले जाया गया जहाँ सैंकड़ों जहरीले नाग छोड़ दिए गए थे। अँधेरा इतना गहरा था कि अपनी हाथ की उँगलियाँ भी दिखाई न दें। जैसे ही फुफकारते हुए नाग प्रह्लाद की ओर बढ़े, कमरे में एक धीमी सी सुनहरी रोशनी फैलने लगी। नागों ने अपना फन फैलाया, लेकिन डसने के लिए नहीं, बल्कि उस नन्हे बालक के ऊपर छाँव करने के लिए। प्रह्लाद वहीं बैठकर ‘ॐ नमो नारायणाय’ का जाप करने लगा।
होलिका का प्रवेश और वो रहस्यमयी चादर
जब हर हथकंडा नाकाम हो गया, तब हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को बुलाया। होलिका, जिसे वरदान प्राप्त था कि अग्नि उसे छू भी नहीं सकती। उसके पास एक ऐसी जादुई चादर थी, जिसे ओढ़ने के बाद वह धधकती लपटों के बीच भी सुरक्षित रह सकती थी।
हिरण्यकश्यप ने एक विशाल चिता तैयार करवाई। पूरे नगर को बुलाया गया ताकि सब अपनी आँखों से प्रह्लाद का अंत देख सकें। माहौल में भारीपन था। लोग दबी जुबान में कह रहे थे कि आज धर्म की हार हो जाएगी।
होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर चिता पर बैठ गई। प्रह्लाद की आँखों में अब भी वही शांति थी। उसने अपनी बुआ की आँखों में देखा और धीरे से कहा, “बुआ, आग का स्वभाव जलाना है, बचाना नहीं। जिसे आप अपनी सुरक्षा समझ रही हैं, वह अहंकार का बोझ है।”
आग सुलगाई गई। देखते ही देखते लपटें आसमान छूने लगीं। लपटों का शोर इतना तेज़ था कि प्रह्लाद की आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी। अचानक, मौसम बदला। एक ज़ोरदार आँधी चली। वह जादुई चादर, जो होलिका के बदन पर लिपटी थी, हवा के एक झोंके से उड़ी और प्रह्लाद के शरीर पर जा लिपटी।
चीखें गूँजीं। पर वो प्रह्लाद की नहीं थीं। होलिका आग की लपटों में घिर चुकी थी। वरदान का अहंकार जलकर राख हो रहा था। जब आग शांत हुई, तो राख के ढेर के बीच प्रह्लाद सही-सलामत बैठा था। यह दृश्य देखकर हिरण्यकश्यप के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसे पहली बार डर का अहसास हुआ।
अंतिम प्रहार और सिंहासन की थरथराहट
अगले दिन का सूरज एक अलग ही खौफ लेकर आया। हिरण्यकश्यप अब केवल एक राजा नहीं, एक घायल भेड़िया बन चुका था। उसने प्रह्लाद को अपने दरबार के बीचों-बीच घसीटा। उसने चिल्लाकर पूछा, “कहाँ है तेरा भगवान? अगर वह यहाँ नहीं आया, तो मैं खुद यमराज बनकर तेरा अंत करूँगा!”
प्रह्लाद शांत भाव से खड़ा था। दरबार के बड़े-बड़े योद्धा और मंत्री कांप रहे थे।
हिरण्यकश्यप ने एक लोहे के खंभे की ओर इशारा किया, जो लाल तप रहा था। उसने गर्जना की, “क्या तेरा नारायण इस खंभे में है?”
प्रह्लाद ने आत्मविश्वास से कहा, “हाँ पिताजी, वह इस खंभे में भी है, मुझमें भी है और आपमें भी।”
यह सुनते ही हिरण्यकश्यप का सब्र टूट गया। उसने अपनी भारी गदा उठाई और उस जलते हुए खंभे पर पूरी ताकत से प्रहार किया।
“तो निकलने दे उसे बाहर!” उसने अट्टहास किया।
लेकिन जैसे ही गदा खंभे से टकराई, एक ऐसी आवाज़ हुई जैसे पूरा ब्रह्मांड फट गया हो। वह आवाज़ बिजली के कड़कने से भी हज़ार गुना तेज़ थी। महल की दीवारें दरकने लगीं। धरती कांप उठी। खंभा बीच से फट गया और उसमें से जो निकला, उसे देखकर काल की भी सांसें रुक गईं।
नृसिंह अवतार: न मानव, न पशु
खंभे के भीतर से एक ऐसी आकृति निकली जिसे न कभी किसी ने देखा था, न सुना था। आधा शरीर शेर का और आधा मानव का। लाल चमकती आँखें, शरीर से निकलता हुआ दिव्य प्रकाश, और वह दहाड़… जिसने हिरण्यकश्यप के अहंकार को मिट्टी में मिला दिया।
यह भगवान नृसिंह थे।
हिरण्यकश्यप ने पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन नृसिंह की गति बिजली से भी तेज़ थी। उन्होंने उसे पकड़ लिया। हिरण्यकश्यप को अपना वरदान याद आने लगा।
“मुझे कोई मानव नहीं मार सकता!” वह चिल्लाया।
नृसिंह दहाड़े, “मैं न मानव हूँ, न पशु।”
“मुझे दिन में या रात में नहीं मारा जा सकता!”
नृसिंह उसे महल की दहलीज पर ले गए। “यह न दिन है, न रात। यह गोधूलि बेला है।”
“मैं न घर के भीतर मर सकता हूँ, न बाहर!”
“यह दहलीज न भीतर है, न बाहर।”
“मुझे किसी अस्त्र या शस्त्र से नहीं मारा जा सकता!”
नृसिंह ने अपनी गोद में उसे लिटाया और अपने नुकीले नाखूनों को दिखाया। “ये न अस्त्र हैं, न शस्त्र। ये मेरे नाखून हैं।”
हिरण्यकश्यप की आँखों में पहली बार अपनी मौत का प्रतिबिंब दिखा। उसे समझ आ गया कि उसने जिसे चुनौती दी थी, वह स्वयं सृष्टि का रचयिता है। नृसिंह ने अपने नाखूनों से हिरण्यकश्यप का सीना चीर दिया। वह पापी, जिसने खुद को भगवान घोषित कर दिया था, एक साधारण जीव की तरह तड़प-तड़प कर दम तोड़ गया।
ब्रह्मांड का सन्नाटा और भक्ति की जीत
हिरण्यकश्यप के वध के बाद भी नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हो रहा था। उनकी दहाड़ से दसों दिशाएं कांप रही थीं। देवता डर के मारे छुप गए। कोई उनके पास जाने की हिम्मत नहीं कर रहा था। तब ब्रह्मा जी ने प्रह्लाद को आगे किया।
वह छोटा सा बालक, जिसकी रक्षा के लिए स्वयं ईश्वर धरती पर आए थे, धीरे-धीरे उस भयानक रूप की ओर बढ़ा। उसने नृसिंह के चरणों में अपना सिर रख दिया। जैसे ही भक्त का स्पर्श हुआ, भगवान का क्रोध आंसुओं में बदल गया। उन्होंने प्रह्लाद को उठाकर अपनी गोद में बिठा लिया और उसे चाटने लगे, जैसे एक शेरनी अपने शावक को प्यार करती है।
उस रात महल में सन्नाटा तो था, पर वह खौफ का नहीं, शांति का था। प्रह्लाद ने न केवल अपने प्राण बचाए थे, बल्कि अपने पिता के पापों का अंत करके उसे भी मोक्ष की राह दिखा दी थी।
आज भी जब कभी अन्याय और अहंकार अपनी सीमा पार करता है, तो लोग प्रह्लाद की उस अटूट भक्ति को याद करते हैं। यह कहानी हमें सिखाती है कि चाहे आग कितनी भी भयंकर क्यों न हो, अगर मन में विश्वास की चादर हो, तो एक तिनका भी नहीं जलता।
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