मुख्यालय के रिकॉर्ड रूम में धूल से सनी वो लाल रंग की फाइल सबसे नीचे दबी थी। उस पर कोई केस नंबर नहीं था, सिर्फ एक शब्द लिखा था—’वर्जित’ (Forbidden)। नए आए युवा आईपीएस (IPS) अफसर कबीर ने जब उस फाइल को खोला, तो पन्नों से आती सड़न की बू सिर्फ कागजों की नहीं, बल्कि इंसाफ के कत्ल की थी।
“सर, इस फाइल को छुएंगे तो महकमे के कई बड़े अफसरों के कॉलर पर दाग लगेगा,” बूढ़े रिकॉर्ड कीपर ने कांपते हाथों से कबीर को रोकने की कोशिश की। लेकिन कबीर की आंखों में एक अलग ही जिद थी।
यह ‘वो केस जिसे पुलिस ने 25 साल तक छुपाया’ था। एक ऐसा राज, जिसे 1999 की एक सर्द रात को कानून के रखवालों ने ही जमीन के छह फीट नीचे दफन कर दिया था ताकि सिस्टम की साख बची रहे।
साल 1999: एक पत्रकार का गायब होना और खामोशियां
कहानी शुरू होती है ठीक पच्चीस साल पहले। शहर के एक निडर खोजी पत्रकार, विवेक शर्मा, अचानक एक रात लापता हो गए। विवेक उस समय के सबसे बड़े राजनीतिक-पुलिस गठजोड़ का पर्दाफाश करने वाले थे, जिसमें अवैध हथियारों और सरकारी जमीनों के घोटाले का कच्चा चिट्ठा था।
विवेक की पत्नी ने थाने के चक्कर काटे, रोई-गिड़गिड़ाई, लेकिन पुलिस ने सिर्फ एक ‘मिसिंग डायरी’ लिखकर पल्ला झाड़ लिया। कुछ दिनों बाद विवेक की कार नदी किनारे लावारिस हालत में मिली, और पुलिस ने केस को ‘आत्महत्या’ का रूप देकर हमेशा के लिए बंद कर दिया।
वक्त गुजरता गया। उस समय के जांच अधिकारी रिटायर होकर बड़े पदों पर पहुंच गए, और विवेक का नाम वक्त की धूल में खो गया। लेकिन सच कभी मरता नहीं, वह सिर्फ सही वक्त का इंतजार करता है।
तहखाने की खुदाई और मिला पहला सुराग
कबीर ने जब फाइल के पन्ने पलटे, तो उन्हें विवेक शर्मा की गुमशुदगी की टाइमलाइन में कई झोल नजर आए। सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि जिस रात विवेक गायब हुए, उसी रात शहर के पुराने पुलिस लाइंस के एक हिस्से को अचानक रातों-रात कंक्रीट से पक्का कर दिया गया था।
कबीर ने बिना किसी को बताए, अपनी एक भरोसेमंद टीम ली और उस पुराने पुलिस लाइंस के खंडहर हो चुके हिस्से में पहुंचे। आधी रात को जब जेसीबी (JCB) ने उस कंक्रीट के फर्श को तोड़ना शुरू किया, तो वहां मौजूद हर शख्स का दिल तेजी से धड़क रहा था।
सस्पेंस का मोड़: फर्श के पांच फीट नीचे एक संदूक मिला। जब उस संदूक को खोला गया, तो अंदर एक नरकंकाल था, जिसके सिर पर गोली का निशान साफ दिख रहा था। 25 साल बाद, विवेक शर्मा की लाश पुलिस के अपने ही महकमे के आंगन से बरामद हुई थी।
अपनों का ही बुना हुआ चक्रव्यूह
कंकाल मिलने की खबर आग की तरह फैल गई। महकमे के गलियारों में हड़कंप मच गया। कबीर पर ऊपर से दबाव आने लगा कि इस केस को ‘लावारिस लाश’ बताकर रफा-दफा कर दिया जाए। लेकिन कबीर पीछे हटने वाले नहीं थे।
फॉरेंसिक जांच से साबित हो गया कि वह कंकाल विवेक शर्मा का ही था। कबीर ने पुराने पुलिस रिकॉर्ड्स और उस रात ड्यूटी पर तैनात कांस्टेबलों की लिस्ट निकाली। ज्यादातर लोग या तो मर चुके थे या बूढ़े हो चुके थे।
तभी कबीर को एक पूर्व कांस्टेबल रघुनाथ का पता चला, जो लकवे का शिकार होकर गांव में अपनी आखिरी सांसें गिन रहा था। कबीर जब उसके पास पहुंचे, तो रघुनाथ की आंखों में मौत का डर और 25 साल पुराना पछतावा साफ दिख रहा था।
वह खौफनाक रात और कांपते हाथों का कबूलनामा
“साहब, मैं 25 साल से इस बोझ के तले मर रहा हूं,” रघुनाथ ने रोते हुए कहा। उसने जो सच उगला, उसने पूरे सिस्टम की नींव हिला दी।
1999 की उस रात, विवेक शर्मा को सीधे पुलिस लाइंस लाया गया था। वहां शहर के बड़े रसूखदार और उस समय के डीआईजी (DIG) मौजूद थे। विवेक से वह पेन ड्राइव मांगी जा रही थी जिसमें सारे सबूत थे। जब विवेक ने मना किया, तो डीआईजी ने अपनी ही सर्विस रिवॉल्वर से विवेक के सिर में गोली मार दी।
“गुनाह किसी अपराधी ने नहीं, वर्दी वालों ने किया था साहब। कत्ल के बाद लाश को बाहर ले जाना खतरनाक था, इसलिए साहब के हुक्म पर हमने ही उसे वहीं दफन किया और अगले दिन उस पर सरकारी कंक्रीट की सड़क बनवा दी,” रघुनाथ ने हांफते हुए पूरा सच उगल दिया।
क्लाइमेक्स: 25 साल बाद हुआ इंसाफ
रघुनाथ का यह बयान वीडियो पर रिकॉर्ड कर लिया गया था। कबीर ने बिना वक्त गंवाए उस पूर्व डीआईजी के घर पर छापा मारा, जो अब एक रसूखदार राजनेता बन चुका था। जब पुलिस की गाड़ियां उसके बंगले के बाहर रुकीं, तो उसे लगा कि वह अपनी पुरानी धौंस से बच जाएगा।
लेकिन कबीर ने जब 25 साल पुराना वो संदूक और रघुनाथ का बयान उसके सामने रखा, तो उस बूढ़े मुजरिम के चेहरे की हवाइयां उड़ गईं। कानून का पहिया घूमा था, और बहुत बेरहमी से घूमा था।
अगले दिन अखबारों की सुर्खियां चीख-चीख कर कह रही थीं कि खाकी के पीछे छिपा भेड़िया आखिरकार अपने अंजाम तक पहुंच चुका है।
फाइलें कितनी भी पुरानी हो जाएं और कंक्रीट कितना भी मजबूत हो, जब इंसाफ अपनी गवाही देने पर आता है, तो वो जमीन का सीना चीरकर बाहर निकल आता है।
