कमरे की दीवारें खून के छीटों से लाल थीं। फर्श पर गहरा लाल धब्बा इस बात की गवाही दे रहा था कि यहाँ किसी की बेरहमी से जान ली गई है। सस्पेंस और सन्नाटे के बीच, एसी (AC) की हल्की सी आवाज कमरे के खौफ को और बढ़ा रही थी।
इंस्पेक्टर विक्रम ने दस्ताने पहनकर कमरे का मुआयना शुरू किया। सब कुछ वहीं था—कत्ल में इस्तेमाल किया गया चाकू, कातिल के जूतों के निशान, और फर्श पर फैला हुआ ढेर सारा खून। लेकिन एक चीज गायब थी, जिसने पुलिस महकमे की नींद उड़ा दी थी।
“सर, पूरा घर छान मारा, बेसमेंट से लेकर छत की टंकियां तक देख लीं, लेकिन लाश कहीं नहीं है,” सब-इंस्पेक्टर अमित ने हांफते हुए कहा। विक्रम ने माथे का पसीना पोंछा। एक ऐसा मर्डर केस जिसमें लाश ही गायब हो गई हो, अदालत में साबित करना नामुमकिन के बराबर था।
वह मनहूस सुबह और खाली पड़ा कमरा
यह मामला शहर के मशहूर प्रोफेसर अविनाश मल्होत्रा का था। प्रोफेसर अपने आलीशान बंगले में अकेले रहते थे। सुबह जब उनका नौकर रामू काम पर आया, तो उसने घर का मुख्य दरवाजा खुला पाया। अंदर का नजारा देखकर उसकी चीख निकल गई।
प्रोफेसर के बेडरूम का नजारा किसी डरावनी फिल्म जैसा था। हर तरफ खून ही खून था, जैसे किसी ने तड़पा-तड़पाकर उन्हें मारा हो। रामू ने तुरंत पुलिस को फोन किया। पुलिस दस मिनट में मौके पर पहुंच गई, लेकिन तब तक प्रोफेसर अविनाश और उनकी लाश, दोनों हवा में विलीन हो चुके थे।
विक्रम ने सीसीटीवी (CCTV) फुटेज खंगालने के आदेश दिए। लेकिन बंगले के बाहर लगे कैमरों की फुटेज ने कहानी को सुलझाने के बजाय और उलझा दिया। रात को 12 बजे के बाद न तो कोई गाड़ी बंगले के अंदर आई थी और न ही कोई बाहर गया था।
तीन संदिग्ध और नफरत का तिकोना मुकाबला
लाश के बिना भी विक्रम ने अपनी तफ्तीश रुकने नहीं दी। प्रोफेसर अविनाश के जीवन में तीन लोग सबसे करीब थे—उनकी सौतेली बेटी रिया, उनका बिजनेस पार्टनर धनराज, और वफादार नौकर रामू। इन तीनों के पास प्रोफेसर को रास्ते से हटाने की अपनी-अपनी वजह थी।
रिया को प्रोफेसर की जायदाद से बेदखल कर दिया गया था। धनराज पर प्रोफेसर ने करोड़ों के घोटाले का आरोप लगाया था। और रामू? रामू को दो दिन पहले ही प्रोफेसर ने चोरी के इल्जाम में नौकरी से निकालने की धमकी दी थी।
सस्पेंस का मोड़: फॉरेंसिक रिपोर्ट ने साफ कर दिया कि फर्श पर गिरा खून प्रोफेसर अविनाश का ही था। खून की मात्रा इतनी ज्यादा थी कि कोई भी इंसान उतना खून बहने के बाद जिंदा नहीं बच सकता था। कत्ल पक्का हुआ था, लेकिन लाश बिना किसी गाड़ी या इंसानी हलचल के बाहर कैसे गई?
आधी रात की मिस्ट्री और फॉरेंसिक का नया खुलासा
विक्रम ने दोबारा क्राइम सीन का दौरा किया। वह प्रोफेसर के बिस्तर पर बैठ गए और सोचने लगे। कातिल ने सबूत मिटाने की कोशिश नहीं की थी, उसने सिर्फ लाश को छुपाया था। क्यों? क्योंकि बिना लाश के कानून किसी को भी मर्डर का दोषी नहीं मान सकता। ‘नो बॉडी, नो मर्डर’ (No Body, No Murder)—कातिल इसी कानून का फायदा उठा रहा था।
तभी विक्रम की नजर बेडरूम के कोने में रखे एक बड़े, पुराने वैक्यूम क्लीनर और केमिकल की बोतलों पर पड़ी। उनके दिमाग की बत्ती जली। उन्होंने फॉरेंसिक टीम को बुलाकर बाथरूम के ड्रेनेज (नाली) और पाइपलाइनों की बारीकी से जांच करने को कहा।
“अमित, कातिल बहुत शातिर है। उसने लाश को घर से बाहर नहीं निकाला, बल्कि लाश को इसी घर के अंदर ही ठिकाने लगा दिया,” विक्रम की आवाज में एक अजीब सी गंभीरता थी।
बाथरूम का राज और कातिल की चालाकी
फॉरेंसिक टीम ने जब बाथरूम के पाइपों को काटकर अंदर केमिकल टेस्ट किया, तो वहां इंसानी मांस के बेहद छोटे टुकड़े और हड्डियों के अवशेष मिले। सच सामने आ चुका था, जो बेहद खौफनाक था।
कातिल ने प्रोफेसर की हत्या करने के बाद बाथरूम में उनकी लाश के टुकड़े किए थे और उन्हें बेहद शक्तिशाली एसिड (तेजाब) की मदद से पूरी तरह पिघला दिया था। इसके बाद उसने बची हुई हड्डियों को पीसकर नाली में बहा दिया। यही वजह थी कि सीसीटीवी में कोई भी लाश बाहर ले जाता हुआ नहीं दिखा।
अब सवाल यह था कि इतना भयानक और दिल दहला देने वाला काम किसने किया था? इतनी नफरत और ऐसा शातिर दिमाग किसका हो सकता था?
जाल बिछाया गया और सच उगलवाया गया
विक्रम ने तीनों संदिग्धों को थाने बुलाया। उन्होंने एक चाल चली। विक्रम ने रिया, धनराज और रामू के सामने एक फर्जी रिपोर्ट रखी और कहा, “हमें प्रोफेसर की लाश पास के जंगल से मिल गई है। लाश पर कातिल के बाल मिले हैं, जिसका डीएनए (DNA) टेस्ट हो रहा है। शाम तक कातिल सलाखों के पीछे होगा।”
यह सुनते ही रामू के चेहरे का रंग उड़ गया, लेकिन धनराज और रिया शांत रहे। रामू ने घबराकर पानी का ग्लास उठाया, तो उसके हाथ कांप रहे थे। विक्रम की पारखी नजरों ने यह भांप लिया।
“रामू, प्रोफेसर साहब ने तुम्हें निकालने की बात कही थी न? सिर्फ इसलिए तुमने उन्हें इतनी भयानक मौत दी?” विक्रम ने टेबल पर हाथ मारकर जोर से पूछा।
क्लाइमेक्स: नफरत का अंत और जुर्म का कबूलनामा
रामू घुटनों के बल बैठ गया और रोने लगा। उसने अपना जुर्म कबूल कर लिया। उसने बताया कि प्रोफेसर उसे जेल भिजवाने वाले थे। गुस्से में आकर उसने रात को सोते समय प्रोफेसर पर चाकू से हमला कर दिया।
“साहब, मुझे पता था कि अगर लाश नहीं मिलेगी, तो पुलिस कुछ नहीं कर पाएगी। मैंने इंटरनेट पर देखा था कि एसिड से लाश को कैसे गायब किया जाता है। मैंने रात भर जागकर वह खौफनाक काम किया,” रामू ने कांपते हुए अपनी कहानी सुनाई।
विक्रम ने गहरी सांस ली। इंसानी दिमाग जब अपनी हदें पार करता है, तो वह कितना खौफनाक हो सकता है, इस केस ने साबित कर दिया था। रामू को सलाखों के पीछे भेज दिया गया।
गुनाहगार चाहे कितना भी शातिर क्यों न हो, कानून के लंबे हाथ उसकी परछाई को भी ढूंढ निकालते हैं, फिर लाश तो सिर्फ एक सबूत थी।
