अस्पताल की बंद मंज़िल

Team Maunam
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रात के ठीक 3 बजकर 14 मिनट हो रहे थे। लाइफलाइन हॉस्पिटल के कॉरिडोर में पीली लाइटें रह-रहकर झपका रही थीं। डॉक्टर समीर अपनी शिफ्ट खत्म कर थक कर बैठ ही रहे थे कि उनके हाथ में रखे पुराने पेजर ने अचानक शोर मचाना शुरू कर दिया।

‘बीप… बीप… बीप…’

समीर के माथे पर पसीना आ गया। इस पेजर का इस्तेमाल अस्पताल में सालों पहले बंद हो चुका था, फिर इसमें सिग्नल कहाँ से आ रहे थे? उन्होंने कांपते हाथों से स्क्रीन देखी। मैसेज छोटा था, लेकिन रोंगटे खड़े कर देने वाला: ‘मरीज़ की हालत नाज़ुक है। वार्ड 402। तुरंत आएं।’

समीर का गला सूख गया। अस्पताल की चौथी मंज़िल—वही मंज़िल जिसे बीस साल पहले एक रहस्यमयी हादसे के बाद ईंटों से चुनवा कर बंद कर दिया गया था। वहाँ न कोई वार्ड था, न कोई मरीज़। फिर ये कॉल किसने किया?

बंद मंज़िल का बुलावा

समीर ने सोचा शायद यह किसी सीनियर डॉक्टर का मज़ाक है, लेकिन उनका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। अस्पताल के स्टाफ में एक पुरानी अफवाह थी कि चौथी मंज़िल पर आज भी उन मरीज़ों की रूहें भटकती हैं जिन्हें गलत इलाज की वजह से ‘गायब’ कर दिया गया था।

जिज्ञासा और डर के बीच जंग छिड़ी, और अंत में जिज्ञासा जीत गई। समीर ने अपनी टॉर्च उठाई और सीढ़ियों की तरफ बढ़ गए। लिफ्ट चौथी मंज़िल का बटन दबाने पर काम नहीं करती थी। जैसे-जैसे वो सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे, हवा भारी और बर्फीली ठंडी होती जा रही थी।

चौथी मंज़िल के दरवाज़े पर भारी लोहे की जंजीरें और ताला लटका था, लेकिन एक कोना थोड़ा खुला हुआ था—जैसे किसी ने हाल ही में उसे अंदर से धक्का देकर खोला हो। समीर ने अंदर कदम रखा। वहाँ की हवा में फॉर्मेल्डिहाइड और सड़ी हुई पट्टियों की तीखी गंध थी जो सीधे दिमाग पर वार कर रही थी।

गलियारे में वो साया

टॉर्च की रोशनी जहाँ भी पड़ती, वहाँ धूल की मोटी परत जमी दिखती। स्ट्रैचर टूटे हुए थे, दीवारें सीलन से काली पड़ चुकी थीं। चलते-चलते समीर वार्ड 402 के सामने रुके। दरवाज़ा आधा खुला था।

अंदर से किसी के कराहने की आवाज़ आ रही थी।

“कौन है वहाँ?” समीर की आवाज़ कांप रही थी।

अंदर एक बेड लगा था, जिसके चारों तरफ पुराने ज़माने के मॉनिटर रखे थे। हैरानी की बात ये थी कि वो मॉनिटर चल रहे थे। ‘बीप… बीप… बीप…’ धड़कन की लाइन स्क्रीन पर धीरे-धीरे चल रही थी। बेड पर एक छोटी सी लड़की लेटी थी, उसकी आँखें खुली थीं और वो छत को एकटक निहार रही थी।

उसने समीर को देखकर धीमी आवाज़ में कहा, “डॉक्टर अंकल, क्या मेरी फाइल मिल गई? पापा कह रहे थे कि बिना फाइल के डिस्चार्ज नहीं मिलेगा।”

समीर की ज़बान तालू से चिपक गई। उस लड़की ने जो अस्पताल का गाउन पहना था, उस पर 1998 की मुहर लगी थी।

पुरानी फाइलों का काला सच

“बेटा… तुम यहाँ क्या कर रही हो?” समीर ने हिम्मत जुटाकर पूछा।

लड़की ने कोने में रखे एक पुराने लोहे के कैबिनेट की तरफ इशारा किया। समीर जब उस कैबिनेट के पास पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि वहाँ हज़ारों फाइलें धूल फांक रही थीं। उन्होंने एक फाइल निकाली। उस पर लिखा था—’केस नंबर 704: अंजलि। मृत्यु का समय: 12 मार्च 1998। कारण: अज्ञात ड्रग ट्रायल।’

समीर के हाथ कांपने लगे। उन्होंने दूसरी फाइल खोली, फिर तीसरी। हर फाइल पर एक ही बात लिखी थी—’अज्ञात ड्रग ट्रायल’। ये कोई अस्पताल नहीं था, ये एक बूचड़खाना था जहाँ मासूमों पर गैरकानूनी प्रयोग किए गए थे। और सबसे डरावनी बात? उन फाइलों के नीचे वर्तमान के कुछ डॉक्टरों के हस्ताक्षर थे, जिनमें अस्पताल के मौजूदा डायरेक्टर, डॉक्टर खुराना का नाम भी शामिल था।

अचानक, पीछे से दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई। समीर पलटे, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। सिर्फ वो लड़की गायब हो चुकी थी।

मौत की आहट

तभी गलियारे में भारी जूतों की आवाज़ सुनाई दी। कोई बहुत धीरे-धीरे वार्ड 402 की तरफ आ रहा था।

“समीर… तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”

समीर ने मुड़कर देखा, टॉर्च की रोशनी में डॉक्टर खुराना खड़े थे। उनकी आँखों में वो ममता नहीं थी जो वो अक्सर मरीज़ों के सामने दिखाते थे। वहाँ सिर्फ एक ठंडा सन्नाटा था।

“सर, ये सब क्या है? ये फाइलें… ये ड्रग ट्रायल्स?” समीर ने चिल्लाकर पूछा।

खुराना मुस्कुराए, लेकिन वो मुस्कान डरावनी थी। “समीर, चिकित्सा विज्ञान में कुछ बड़े अविष्कारों के लिए छोटी कुर्बानियाँ देनी पड़ती हैं। ये बच्चे मरे नहीं हैं, ये अमर हो गए हैं। हमारी रिसर्च की बुनियाद हैं ये। और अब, तुम भी इसी रिसर्च का हिस्सा बनोगे।”

समीर भागने की कोशिश करने लगे, लेकिन अचानक उन्हें महसूस हुआ कि उनका शरीर सुन्न हो रहा है। उन्होंने अपनी गर्दन पर हाथ लगाया, वहाँ एक छोटा सा इंजेक्शन लगा था। खुराना ने अंधेरे से निकलकर उन्हें सुई चुभाई थी।

आखिरी रात और असली सच

समीर की आँखों के सामने धुंधलापन छाने लगा। वो ज़मीन पर गिर पड़े। गिरते-गिरते उन्होंने देखा कि वार्ड 402 के खाली बेड अब भरने लगे थे। दर्जनों साये, जिनकी आँखें धंसी हुई थीं और शरीर सफेद पड़ चुके थे, धीरे-धीरे खुराना की तरफ बढ़ रहे थे।

खुराना के चेहरे से मुस्कान गायब हो गई। “पीछे हटो! तुम सब मर चुके हो!” वो चिल्लाए।

लेकिन वो ‘मरीज़’ नहीं रुके। उन्होंने खुराना को घेर लिया। समीर ने आखिरी बार देखा कि खुराना की चीखें अस्पताल के उस सन्नाटे में दब गई थीं जिसे उन्होंने खुद सालों से पाल रखा था।

अगली सुबह, अस्पताल में हड़कंप मच गया। डॉक्टर खुराना का शव चौथी मंज़िल के वार्ड 402 में मिला। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण ‘डर से हार्ट फेल होना’ बताया गया। लेकिन अजीब बात ये थी कि उनके गले पर छोटे बच्चों के हाथों के निशान थे।

डॉक्टर समीर उस दिन के बाद कभी नहीं मिले। कुछ लोग कहते हैं वो शहर छोड़ कर भाग गए। लेकिन रात की शिफ्ट करने वाले नर्सों का कहना है कि आज भी रात के 3 बजकर 14 मिनट पर, चौथी मंज़िल से एक पेजर की आवाज़ आती है और कभी-कभी एक जवान डॉक्टर की परछाईं उन पुरानी फाइलों को ढूँढते हुए देखी जा सकती है।

अस्पताल की वो चौथी मंज़िल आज भी बंद है, लेकिन वहां का सन्नाटा अब पहले से कहीं ज़्यादा शोर करता है। क्या आप अगली बार किसी पुराने अस्पताल में रुकेंगे, तो क्या आप ऊपर वाली मंज़िल की आवाज़ों को नज़रअंदाज़ कर पाएंगे?

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