रात के ठीक 2:14 बजे थे। पूरे घर में ऐसा सन्नाटा था जिसे चीरा जा सके, सिवाय उस एक आवाज़ के जो पिछले तीन हफ्तों से मेरी नींद और चैन दोनों छीन चुकी थी। बगल के कमरे से खिलखिलाकर हँसने की आवाज़ आ रही थी—जैसे कोई बच्चा किसी बात पर बहुत खुश हो।
मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने धीरे से अपनी पत्नी अनन्या की ओर देखा, वो गहरी नींद में थी। मैंने हिम्मत जुटाई और बिस्तर से उतरा। पैर ज़मीन पर पड़ते ही ठंडक का अहसास हुआ, जैसे कमरे का तापमान अचानक गिर गया हो।
मैं धीरे-धीरे पीहू के कमरे की ओर बढ़ा। डर इस बात का नहीं था कि कोई अंदर है, डर इस बात का था कि अंदर जो है, वो मुमकिन ही नहीं है। मेरी 6 साल की बेटी पीहू, एक कार एक्सीडेंट के बाद से सदमे में थी। डॉक्टरों ने कहा था कि वो शायद अब कभी बोल नहीं पाएगी। पिछले दो साल से उसने एक शब्द नहीं बोला था, हँसना तो बहुत दूर की बात थी।
जैसे ही मेरा हाथ पीहू के कमरे के दरवाजे पर पहुँचा, हँसी अचानक रुक गई। सन्नाटा इतना गहरा था कि मुझे अपनी ही धड़कनें सुनाई दे रही थीं। मैंने दरवाजा खोला। पीहू अपने बिस्तर पर लेटी थी, उसकी आँखें खुली थीं और वो छत की ओर एकटक देख रही थी। उसके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी—एक ठंडी, बेजान मुस्कान।
सन्नाटे में गूँजती हँसी
“पीहू?” मैंने धीमी आवाज़ में पुकारा।
उसने कोई जवाब नहीं दिया। कमरे की खिड़की खुली थी और बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। लेकिन अजीब बात ये थी कि खिड़की से आने वाली हवा ठंडी नहीं, बल्कि जलती हुई राख जैसी महक रही थी। मैंने खिड़की बंद की और पीहू के पास बैठा। उसका शरीर बर्फ जैसा ठंडा था।
अगले दिन मैंने अनन्या को सब बताया। उसने मेरी बात पर यकीन नहीं किया। “आर्यन, तुम काम के तनाव की वजह से वहम कर रहे हो। पीहू बेचारी तो आवाज़ तक नहीं निकाल पाती, वो हँसेगी कैसे?”
लेकिन मुझे पता था कि मैंने क्या सुना है। हमने ये पुराना बंगला शहर के शोर से दूर इसलिए लिया था ताकि पीहू शांत माहौल में ठीक हो सके। पहाड़ियों के बीच बना ये ‘विक्टोरियन’ स्टाइल का घर दिखने में तो खूबसूरत था, लेकिन इसकी दीवारों में कुछ तो था जो सड़ रहा था।
उस रात, मैंने तय किया कि मैं सोऊंगा नहीं। मैंने पीहू के कमरे में एक बेबी मॉनिटर लगा दिया और अपने कमरे में बैठकर इंतज़ार करने लगा।
रात के 2 बजते ही मॉनिटर से सरसराहट की आवाज़ आने लगी। पहले लगा जैसे कोई कागज़ फाड़ रहा हो, फिर अचानक… वही आवाज़।
“ही-ही-ही… देखो पापा, वो फिर आ गई!”
मेरे हाथ से चाय का कप गिरकर टूट गया। वो पीहू की आवाज़ थी! वो बोल रही थी! लेकिन उसकी आवाज़ में एक अजीब सा भारीपन था, जैसे कोई बूढ़ा व्यक्ति बच्चे के गले से बोल रहा हो।
बंद कमरे का खौफनाक सच
मैं पागलों की तरह दौड़कर पीहू के कमरे में घुसा। कमरे का नज़ारा देखकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। पीहू बिस्तर पर नहीं थी। वो कमरे के कोने में रखे एक पुराने लकड़ी के संदूक के सामने बैठी थी, जो हमें इस घर के साथ ही मिला था।
वो संदूक की तरफ देखकर बातें कर रही थी। “नहीं, उसे अभी मत मारो। उसे अभी डरने दो।”
“पीहू!” मैं चिल्लाया और उसे गोद में उठा लिया।
जैसे ही मैंने उसे छुआ, उसने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखें… वो पूरी तरह काली हो चुकी थीं। उनमें सफेद हिस्सा गायब था। उसने मेरा हाथ जोर से पकड़ा, उसकी पकड़ इतनी मज़बूत थी कि मुझे अपनी हड्डियाँ चटकने का अहसास हुआ।
उसने फिर वही डरावनी हँसी हँसी और कहा, “वो कह रही है कि आपने उसे कमरे में बंद क्यों किया था? उसे भूख लगी है, पापा।”
मैं उसे लेकर कमरे से बाहर भागा और अनन्या को जगाया। हमने तय किया कि हम उसी वक्त घर छोड़ देंगे। लेकिन जैसे ही हम मुख्य दरवाजे पर पहुँचे, दरवाजा बाहर से बंद था। खिड़कियाँ जाम हो चुकी थीं। पूरा घर एक पिंजरा बन चुका था।
अचानक, घर की सारी लाइटें गुल हो गई। अंधेरे में हमें सिर्फ पीहू की हँसी सुनाई दे रही थी, जो अब घर के हर कोने से आ रही थी। कभी सीढ़ियों से, कभी रसोई से, कभी हमारे ठीक पीछे से।
अतीत का साया
अनन्या रोने लगी थी। हमने टॉर्च जलाई और तहखाने (Basement) की ओर भागे, जहाँ से एक छोटा रास्ता बाहर निकलता था। वहां पहुँचते ही हमें दीवारों पर कुछ लिखा हुआ दिखा। पुरानी, धुंधली लिखावट में लिखा था— ‘तारा को बाहर मत आने देना।’
तभी मेरी नज़र फर्श पर पड़ी एक पुरानी फोटो पर गई। वो इस घर के पिछले मालिकों की थी। फोटो में एक छोटी बच्ची थी जो बिल्कुल पीहू जैसी लग रही थी, बस उसके गले में एक अजीब सा निशान था।
पीहू, जो अब तक खामोश थी, अचानक मेरे पास आई और फोटो की तरफ इशारा करके बोली, “ये तारा है। इसकी मम्मी ने इसे इस संदूक में बंद कर दिया था क्योंकि ये रात को हँसती थी। वो मर गई, पापा… लेकिन उसकी हँसी यहीं रह गई।”
मेरे रोंगटे खड़े हो गए। अचानक तहखाने का भारी दरवाजा अपने आप बंद हो गया। हवा में एक घुटन सी महसूस होने लगी। अंधेरे में हमें दो जलती हुई आँखें दिखाई दीं। वो पीहू नहीं थी। वो पीहू के पीछे खड़ी एक धुंधली सी परछाई थी—एक छोटी बच्ची की रूह, जिसके चेहरे का मांस गल चुका था, लेकिन उसकी मुस्कान अभी भी वही थी।
आखिरी रात का फैसला
वो साया धीरे-धीरे अनन्या की ओर बढ़ने लगा। अनन्या चीख भी नहीं पा रही थी। मुझे समझ आ गया कि ये रूह पीहू के शरीर का इस्तेमाल कर रही थी ताकि वो हमसे बदला ले सके, या शायद वो बस एक खेल खेल रही थी।
“रुको!” मैं चिल्लाया। “तुम्हें क्या चाहिए?”
वो साया रुक गया। उसकी आवाज़ मेरे दिमाग के अंदर गूँजी, “मुझे मेरी आवाज़ वापस चाहिए। उसने मेरी हँसी छीन ली थी, अब मैं सबकी हँसी छीन लूँगी।”
तभी मुझे याद आया कि वो संदूक! पीहू ने कहा था कि उसे संदूक में बंद किया गया था। मैंने पास पड़ा एक कुल्हाड़ा उठाया और उस पुराने संदूक पर वार करना शुरू किया।
जैसे ही संदूक टूटा, उसके अंदर से एक पुरानी गुड़िया और कुछ हड्डियों के अवशेष बाहर गिरे। उनके गिरते ही पूरे घर में एक भयानक चीख गूँजी। दीवारें कांपने लगीं और अचानक सब शांत हो गया।
लाइटें वापस आ गईं। पीहू फर्श पर बेहोश पड़ी थी। वो साया गायब हो चुका था।
एक अधूरा अंत
हम उसी रात पीहू को लेकर वहां से निकल गए। हमने वो घर कभी मुड़कर नहीं देखा। शहर वापस आकर पीहू धीरे-धीरे ठीक होने लगी। उसकी आवाज़ वापस आ गई थी, लेकिन वो पहले जैसी नहीं थी।
अब वो बोलती है, खेलती है, और हँसती भी है। लेकिन कल रात जब मैं उसके कमरे के पास से गुज़रा, तो मैंने कुछ ऐसा सुना जिसने मेरा खून सुखा दिया।
पीहू सो रही थी। लेकिन उसके बिस्तर के नीचे से खिलखिलाकर हँसने की आवाज़ आ रही थी। और इस बार, पीहू की आवाज़ में किसी ने धीरे से फुसफुसाया…
“पापा, तारा अब मेरे अंदर रहती है।”
मैं वहीं जम गया। पीहू ने नींद में ही अपनी आँखें खोलीं। उसकी आँखें एक पल के लिए फिर से पूरी तरह काली हुईं और उसने मेरी तरफ देखकर वही डरावनी मुस्कान दी।
अब मुझे समझ आया… वो रूह उस संदूक में नहीं थी, वो तो बस एक जरिया चाहती थी। और पीहू की खामोशी ने उसे वो जरिया दे दिया था।
अब हमारे घर में कभी सन्नाटा नहीं होता, क्योंकि पीहू अब हर रात 2:14 बजे हँसती है। और कभी-कभी, जब मैं आईने में देखता हूँ, तो मुझे अपनी परछाई के पीछे एक छोटी बच्ची खड़ी दिखाई देती है, जो अपनी उंगली अपने होठों पर रखकर मुझे चुप रहने का इशारा करती है।
क्या आप सुन सकते हैं? वो अभी भी हँस रही है।
