“आर्यन… बेटा, बाहर आओ… बहुत ठंड लग रही है यहाँ।”
रात के ठीक 2:14 बजे थे। सन्नाटा इतना गहरा था कि मेरी अपनी घड़ी की टिक-टिक भी सीने पर हथौड़े जैसी लग रही थी। आवाज़ साफ़ थी, बिल्कुल साफ़। वह आवाज़ मेरी माँ की थी। समस्या सिर्फ एक थी—मेरी माँ की मौत 10 साल पहले हो चुकी थी।
और यह आवाज़ उस ‘नीले दरवाज़े’ के पीछे से आ रही थी, जिसे मकान मालिक ने कभी न खोलने की सख्त हिदायत दी थी। मैंने चादर को गर्दन तक खींच लिया, पसीने से मेरी टी-शर्ट भीग चुकी थी। तभी दरवाज़े पर खुरचने की आवाज़ आई… खुरच… खुरच… जैसे कोई अंदर से बाहर आने के लिए अपने नाखून लकड़ी पर घिस रहा हो।
वो आखिरी चेतावनी
तीन दिन पहले ही मैं मुंबई के इस पुराने लेकिन आलीशान अपार्टमेंट में शिफ्ट हुआ था। रेंट इतना कम था कि मुझे यकीन नहीं हुआ। मकान मालिक खन्ना साहब ने चाबी देते वक्त सिर्फ एक बात कही थी, “बेटा, इस गलियारे के आखिरी कमरे को कभी मत खोलना। वो स्टोर रूम है, मेरा कुछ पुराना सामान रखा है। बस उसे बंद ही रहने देना।”
उस वक्त मैंने हंसकर टाल दिया था। मुझे लगा शायद कोई कबाड़ होगा। लेकिन पहली ही रात को मुझे महसूस हुआ कि उस कमरे के पास से गुजरते वक्त तापमान अचानक गिर जाता है। एक अजीब सी गंध, जैसे पुरानी चमेली और सड़ती हुई लकड़ी का मिश्रण, वहां हमेशा रहती थी।
दूसरी रात को मुझे हल्की फुसफुसाहट सुनाई दी। मुझे लगा शायद पड़ोस के किसी घर से आवाज़ आ रही होगी। लेकिन आज, तीसरी रात को, जो हुआ उसने मेरे लॉजिक के सारे दरवाजे बंद कर दिए थे। वह मेरी माँ की आवाज़ थी। वही पुकार, वही ममता भरी लचक, लेकिन उसमें एक अजीब सी ठंडक थी।
आधी रात का सन्नाटा
मैं हिम्मत जुटाकर बिस्तर से उठा। मेरा हाथ कांप रहा था। मैंने मोबाइल की टॉर्च जलाई और धीरे-धीरे गलियारे की तरफ बढ़ा। हर कदम के साथ फर्श की लकड़ी चरमराहट कर रही थी, जो इस खामोश रात में किसी चीख जैसी लग रही थी।
मैं नीले दरवाज़े के सामने खड़ा था। आवाज़ बंद हो चुकी थी।
मैंने अपना कान दरवाज़े पर लगाया। अंदर से भारी सांस लेने की आवाज़ आ रही थी। जैसे कोई बहुत थक गया हो। फिर अचानक, एक ज़ोरदार धक्का लगा, जैसे किसी ने अंदर से दरवाज़े पर अपना सिर दे मारा हो।
“धम!”
मैं पीछे गिर पड़ा। मेरा दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि मुझे लगा वो फट जाएगा।
“आर्यन… दरवाजा खोलो ना… देखो मैं तुम्हारे लिए तुम्हारी पसंद के परांठे लाई हूँ।”
यह सुनकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए। माँ हमेशा यही कहती थीं जब मैं देर रात तक काम करता था। लेकिन माँ तो… माँ तो उस कार एक्सीडेंट में…
पागलपन या हकीकत?
अगली सुबह मैंने खन्ना साहब को फोन किया। उनकी आवाज़ फोन पर ही कांपने लगी।
“मैंने कहा था ना आर्यन, उस कमरे की तरफ मत जाना। तुम आज ही घर खाली कर दो। मैं तुम्हारे पैसे लौटा दूंगा।”
“लेकिन खन्ना साहब, वहां है क्या? मेरी माँ की आवाज़ कैसे आ सकती है?” मैंने चिल्लाकर पूछा।
खन्ना साहब ने फोन काट दिया।
दिन की रोशनी में सब कुछ सामान्य लग रहा था। मैंने सोचा शायद यह मेरा भ्रम हो। मैं एक साउंड इंजीनियर हूँ, शायद पुराने घर की गूँज या हवा के दबाव की वजह से मुझे ऐसा सुनाई दे रहा हो। लेकिन जब मैंने अपने फोन का वॉयस रिकॉर्डर चेक किया, जो मैंने रात को डर के मारे ऑन कर दिया था, तो मेरे होश उड़ गए।
रिकॉर्डिंग में मेरी माँ की आवाज़ नहीं थी। उसमें सिर्फ एक भारी, घिसटती हुई आवाज़ थी जो कह रही थी— “इसे आने दो… इसे अंदर आने दो…”
दफन राज़
शाम होते ही डर फिर से मेरे घर में पसरने लगा। मैंने तय किया कि आज मैं इस राज़ को खत्म कर दूँगा। मैंने एक कुल्हाड़ी ली और उस नीले दरवाज़े के पास गया।
जैसे-जैसे रात के 2 बजने के करीब आए, घर का माहौल भारी होने लगा। अचानक, पूरे घर की लाइटें चली गईं। इन्वर्टर भी काम नहीं कर रहा था। अंधेरा इतना घना था कि मुझे अपनी हथेली भी नहीं दिख रही थी।
तभी, उस कमरे के अंदर से एक धीमी रोशनी दिखाई दी। दरवाज़े की दरार से आती हुई वो पीली रोशनी। और फिर शुरू हुआ वो रोना। एक बच्चे के रोने की आवाज़, जो धीरे-धीरे एक चीख में बदल गई।
“बचाओ! कोई बाहर निकालो!”
वह आवाज़ अब मेरी माँ की नहीं थी। वह मेरी अपनी आवाज़ थी। वह 10 साल पुराने उस बच्चे की आवाज़ थी जो कार की पिछली सीट पर फंसा हुआ था, जबकि कार में आग लग चुकी थी और उसकी माँ उसे बचाने की कोशिश कर रही थी।
बंद दरवाजे का सच
मुझ पर एक जुनून सवार हो गया। मैंने कुल्हाड़ी उठाई और उस नीले दरवाज़े पर दे मारी।
“कड़क!”
पहली चोट में लकड़ी का एक टुकड़ा टूट गया। अंदर से एक ठंडी हवा का झोंका आया, जिसमें राख की बदबू थी।
“कड़क! कड़क!”
तीन-चार चोटों के बाद दरवाज़ा खुल गया। मैं टॉर्च लेकर अंदर घुसा। लेकिन वहां जो था, उसे देखकर मेरी चीख निकल गई।
कमरा खाली नहीं था। वह कमरा मेरा पुराना बेडरूम था, जैसा 10 साल पहले दिल्ली वाले घर में हुआ करता था। मेरी मेज, मेरी किताबें, और दीवार पर टंगी मेरी और माँ की फोटो। लेकिन सब कुछ जला हुआ था। राख से ढका हुआ।
कमरे के बीचों-बीच एक औरत बैठी थी, जिसकी पीठ मेरी तरफ थी। उसके बाल बिखरे हुए थे और शरीर से धुआं निकल रहा था।
“माँ?” मैंने कांपती आवाज़ में कहा।
वह धीरे से मुड़ी। उसका चेहरा… उसका चेहरा वैसा नहीं था जैसा मुझे याद था। वह आधा जला हुआ था, मांस लटका हुआ था और आंखों की जगह सिर्फ काले गड्ढे थे।
वह मुस्कुराई। “तुम आ गए आर्यन? तुमने कहा था ना कि तुम मुझे छोड़कर कभी नहीं जाओगे? फिर उस रात तुम खिड़की से बाहर क्यों कूद गए? मुझे जलने के लिए क्यों छोड़ दिया?”
आखिरी रात
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह कोई भूत नहीं था, वह मेरा अपना अपराधबोध (guilt) था जिसे मैंने 10 साल से दबा कर रखा था। खन्ना साहब ने इस कमरे को इसलिए बंद रखा था क्योंकि जो भी इस घर में आता था, यह कमरा उसके सबसे गहरे डर और पछतावे को ज़िक्र कर देता था।
“नहीं! यह सच नहीं है!” मैं चिल्लाया और पीछे की तरफ भागा।
लेकिन दरवाज़ा गायब हो चुका था। अब वहां सिर्फ दीवारें थीं। चारों तरफ से आग की लपटें उठने लगीं। मुझे वही गर्मी महसूस होने लगी जो 10 साल पहले उस कार में महसूस हुई थी।
माँ मेरे करीब आई और उसने अपना जलता हुआ हाथ मेरे गाल पर रखा। “अब हम साथ रहेंगे, बेटा। हमेशा के लिए।”
अगले दिन अखबार में एक छोटी सी खबर छपी:
“शहर के एक फ्लैट में लगी रहस्यमयी आग। 28 वर्षीय युवक आर्यन की जलकर मौत। हैरानी की बात यह है कि आग सिर्फ एक कमरे तक सीमित थी, जिसका दरवाज़ा बाहर से बंद था।”
आज भी, अगर आप उस वीरान अपार्टमेंट के पास से गुज़रें, तो आपको उस नीले दरवाज़े के पीछे से दो लोगों के हँसने की आवाज़ें सुनाई देंगी। लेकिन याद रखना, चाहे कुछ भी हो जाए, आवाज़ सुनकर रुकना मत… और उस कमरे को कभी मत खोलना।
