आधी रात का खाली ऑटो

Team Maunam
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समीर के माथे पर पसीना था, जबकि बाहर दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड थी। रात के दो बज रहे थे और गुड़गांव की उस सुनसान सड़क पर दूर-दूर तक कोई साया भी नज़र नहीं आ रहा था। ऑफिस की आखिरी कैब उसे बीच रास्ते में छोड़कर खराब हो चुकी थी। तभी, घने कोहरे को चीरते हुए एक ऑटो की पीली और मद्धम हेडलाइट्स उसके पास आकर रुकीं।

बिना कुछ कहे, ड्राइवर ने बस पीछे का पर्दा हटाया। समीर को लगा कि उसकी जान बच गई। उसने जल्दी से अपना बैग संभाला और अंदर बैठ गया।

“भैया, सेक्टर 56 चलना है,” समीर ने हाँफते हुए कहा।

ड्राइवर ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस गियर डाला और ऑटो आगे बढ़ा दिया। समीर ने राहत की सांस ली और अपने फोन की बैटरी चेक की—सिर्फ 2%। उसने सोचा कि घर पहुँचते ही चार्जर ढूँढूंगा। लेकिन तभी उसकी नज़र ऑटो के मीटर पर पड़ी।

मीटर बंद था। सिर्फ बंद ही नहीं, बल्कि उस पर धूल की एक मोटी परत जमी थी, जैसे बरसों से उसे छुआ न गया हो।

अंधेरी सड़क और वो पीली रोशनी

ऑटो की रफ्तार धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी। समीर ने खिड़की से बाहर देखा, लेकिन उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। बाहर का नज़ारा अजीब था। कोहरा इतना घना था कि उसे सड़क के किनारे लगे लैम्प पोस्ट भी धुंधले दिखाई दे रहे थे।

“भैया, मीटर चालू नहीं किया आपने?” समीर ने थोड़ी हिचकिचाहट के साथ पूछा।

ड्राइवर फिर भी चुप रहा। समीर को अब थोड़ा अजीब लगने लगा। उसने गौर किया कि ऑटो के अंदर एक अजीब सी गंध फैली हुई थी—पुरानी सड़ी हुई चमेली के फूलों और गीली मिट्टी की महक। समीर ने अपना रुमाल नाक पर रख लिया।

अचानक, ऑटो ने एक ज़ोरदार झटका खाया। समीर ने सामने वाले आईने (Rear-view mirror) में ड्राइवर का चेहरा देखने की कोशिश की, लेकिन आईना टूटा हुआ था। ड्राइवर ने एक पुराना मफलर लपेटा हुआ था जिससे उसका आधा चेहरा ढका था।

“अरे भाई साहब, धीरे चलाइये!” समीर चिल्लाया।

तभी ड्राइवर की भारी और फटी हुई आवाज़ गूँजी, “साहब, इस रास्ते पर जो एक बार बैठ जाता है, उसे जल्दी पहुँचने की बहुत हड़बड़ी होती है। आप भी तो 10 साल से यही इंतज़ार कर रहे थे न?”

समीर के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उसने ड्राइवर की तरफ देखा। उसे समझ नहीं आया कि ड्राइवर ने ’10 साल’ वाली बात क्यों कही।

पहचाना हुआ अजनबी

समीर का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। “आप… आप मुझे जानते हैं?”

ड्राइवर ने ऑटो की रफ्तार कम नहीं की। वह बस मद्धम स्वर में हंसने लगा। उसकी हंसी किसी सूखी लकड़ी के टूटने जैसी थी।

“नाम तो सबका लिखा है साहब। इस काली डायरी में,” ड्राइवर ने अपने बगल में रखी एक फटी-पुरानी डायरी की तरफ इशारा किया।

समीर को अब डर महसूस होने लगा था। उसने फोन निकाला, लेकिन तभी वह स्विच ऑफ हो गया। सन्नाटा इतना गहरा था कि समीर को अपनी ही धड़कनें कान के पास सुनाई दे रही थीं। उसने बाहर देखा, रास्ता बदल चुका था। ये सेक्टर 56 का रास्ता नहीं था। ये तो वो पुराना हाईवे था जो शहर के बाहर एक वीरान कब्रिस्तान की तरफ जाता था।

“भैया, आप गलत रास्ते पर जा रहे हैं! रोकिये इसे! मुझे यहाँ उतरना है!” समीर चिल्लाते हुए खड़ा हो गया।

ड्राइवर ने अचानक पीछे मुड़कर देखा। मफलर के नीचे से जो चेहरा दिखा, उसे देखकर समीर की चीख गले में ही फंस गई। उस आदमी की दाईं आँख गायब थी और गाल का मांस इस तरह लटका हुआ था जैसे किसी भारी चीज़ से कुचला गया हो।

“समीर बाबू, इतनी जल्दी भूल गए? 10 साल पहले इसी तारीख को, इसी जगह, आपकी सफेद कार ने एक ऑटो को टक्कर मारी थी। उस ऑटो में एक बाप और उसकी 5 साल की बेटी थी। याद आया?”

बीते कल की एक चीख

समीर के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह खौफनाक मंज़र उसकी आँखों के सामने बिजली की तरह कौंध गया।

कॉलेज के दिनों की वो रात। शराब के नशे में धुत समीर और उसके दोस्त। वो तेज़ रफ्तार कार और सामने से आता हुआ एक ऑटो। टक्कर इतनी ज़ोरदार थी कि ऑटो के परखच्चे उड़ गए थे। समीर डर के मारे वहाँ से भाग गया था। उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। पुलिस केस भी रफा-दफा हो गया था क्योंकि समीर के पिता एक रसूखदार आदमी थे।

“नहीं… वो… वो एक एक्सीडेंट था,” समीर हकलाते हुए बोला। उसकी आँखों में आँसू थे और चेहरे पर मौत का खौफ।

“एक्सीडेंट?” ड्राइवर ने चिल्लाकर कहा। “मेरी बच्ची तड़पती रही समीर बाबू। अगर आप रुक जाते, तो शायद वो आज कॉलेज जा रही होती। लेकिन आप भाग गए। आपने मुझे उस लोहे के ढेर के नीचे मरने के लिए छोड़ दिया।”

अचानक, ऑटो के अंदर का तापमान तेज़ी से गिरने लगा। समीर को लगा जैसे उसके हाथ-पाँव जम रहे हैं। तभी उसे महसूस हुआ कि पीछे वाली सीट पर उसके बगल में कोई बैठा है।

उसने धीरे से गर्दन घुमाई। वहाँ एक छोटी बच्ची बैठी थी। उसका फ्रॉक खून से लथपथ था और उसके हाथ में एक टूटा हुआ गुब्बारा था। उसकी आँखें पूरी तरह सफेद थीं।

“अंकल, क्या आप मुझे घर छोड़ देंगे?” बच्ची की आवाज़ समीर के कानों के पर्दे फाड़ने लगी।

आखिरी पड़ाव

समीर ने भागने की कोशिश की, लेकिन ऑटो के पर्दे अपने आप बंद हो गए। ऑटो अब ज़मीन पर नहीं, बल्कि हवा में तैरता हुआ महसूस हो रहा था। बाहर की दुनिया गायब हो चुकी थी। सिर्फ गहरा काला अंधेरा और वह डरावना ऑटो बचा था।

“भैया, मुझे माफ़ कर दो! मैं सब ठीक कर दूँगा! मैं सरेंडर कर दूँगा!” समीर रोते हुए गिड़गिड़ाने लगा।

ड्राइवर ने शांत भाव से कहा, “न्याय कानून नहीं करता साहब, कर्म करता है। 10 साल तक मैं इसी सड़क पर आपका इंतज़ार कर रहा था। हर रात, हर घंटा। आज मेरा इंतज़ार खत्म हुआ।”

अचानक, ऑटो की हेडलाइट्स एक तेज़ रोशनी में बदल गईं। समीर ने देखा कि सामने वही दीवार थी जिससे 10 साल पहले उसकी कार टकराई थी।

ड्राइवर ने पीछे मुड़कर एक आखिरी बार समीर की आँखों में देखा और मुस्कुराया। “आपकी मंज़िल आ गई है, साहब।”

ऑटो की रफ्तार 100… 120… 140 तक पहुँच गई। समीर ने अपनी आँखें बंद कर लीं और ज़ोर से चिल्लाया।

एक जोरदार धमाका हुआ।

सन्नाटे का अंत

अगली सुबह, पुलिस को सेक्टर 56 के बाहर वाले पुराने बंद पड़े हाईवे पर एक एक्सीडेंट की खबर मिली। कोहरे के कारण एक महंगी कार डिवाइडर से टकराकर जल चुकी थी।

जब इंस्पेक्टर ने घटनास्थल की जांच की, तो वह हैरान रह गया। कार के अंदर सिर्फ एक आदमी की जली हुई लाश थी—समीर की।

लेकिन सबसे अजीब बात कुछ और थी। कार के मलबे के ठीक बगल में, एक पुराने ऑटो के टायर के निशान थे। वह निशान वहाँ तक आए थे जहाँ एक्सीडेंट हुआ था, और फिर अचानक गायब हो गए थे।

इंस्पेक्टर को समीर के हाथ में एक फटी हुई पुरानी डायरी का एक पन्ना मिला। उस पर खून से लिखा था:

“किराया वसूल लिया गया है।”

पूरे इलाके में सन्नाटा था। बस दूर कहीं से एक पुराने ऑटो के इंजन के स्टार्ट होने की मद्धम आवाज़ आ रही थी, जो कोहरे में कहीं खो गई।

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