रात के 9 बजे का प्लेटफॉर्म अपनी पूरी रंगत में था।
चाय वाले की आवाज़, कुलियों की भागदौड़, ट्रेनों का आना-जाना — सब कुछ हमेशा जैसा। वो शोर जो कानों को चुभता नहीं, बल्कि एक अजीब सी लोरी की तरह लगता है।
रिया लगभग दौड़ते हुए अपनी बोगी तक पहुँची। साँस फूली हुई, बैग कंधे पर अधलटका। सीट पर बैठी तो जैसे पूरा जिस्म एक साथ ढीला पड़ गया।
12 घंटे का सफर था। खिड़की से बाहर अँधेरा था। और सामने —
एक लड़का।
खिड़की के पास बैठा। बाहर देखता हुआ। चेहरे पर वो सुकून जो तब आता है जब इंसान किसी चीज़ की चाह में नहीं होता — बस होता है।
रिया ने नज़रें हटाने की कोशिश की।
नज़रें नहीं हटीं।
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आरव
ट्रेन चली। स्टेशन पीछे छूटा।
और तब उस लड़के ने पूछा — बिना किसी भूमिका के, बिना किसी झिझक के — “क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ?”
रिया थोड़ा चौंकी। फिर मुस्कुराई। “हाँ, बिल्कुल।”
“मैं आरव हूँ।” हाथ बढ़ाया।
“रिया।” उसने हाथ मिलाया।
और बस — जैसे किसी किताब का पहला पन्ना पलट गया हो।
बातें शुरू हुईं। पहले बहुत साधारण — कहाँ जा रहे हो, क्या करते हो, घर कहाँ है। वो बातें जो अजनबियों से शुरू होती हैं और आमतौर पर वहीं खत्म हो जाती हैं।
लेकिन इस बार नहीं।
आरव फोटोग्राफर था। दुनिया को फ्रेम में देखता था — हर चेहरे में एक कहानी, हर रोशनी में एक मूड।
रिया लिखती थी। शब्दों में दुनिया को जीती थी — वो दुनिया जो दिखती नहीं, बस महसूस होती है।
“तुम लिखती हो?” आरव ने पूछा — उत्सुकता असली थी, शिष्टाचार नहीं।
“हाँ। कहानियाँ — जो शायद कभी पूरी नहीं होतीं।”
आरव ने एक पल सोचा। फिर कहा — “तो आज एक कहानी पूरी कर दो।”
“कैसे?”
“इस सफर को लिखकर।”
रिया चुप रही। लेकिन दिल में — कुछ हिला।
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रात
रात गहरी होती गई।
बोगी में एक-एक करके लोग सो गए। ऊपर की बर्थ से खर्राटे आ रहे थे। बाहर सिर्फ अँधेरा था और उसमें कभी-कभी किसी छोटे स्टेशन की रोशनी — जो आती थी और तुरंत पीछे छूट जाती थी।
लेकिन उनकी बातें खत्म नहीं हुईं।
आरव ने बताया — एक बार वो कश्मीर में था, बर्फ में। कैमरा जम गया था। उसने हाथों से गरम किया और उसी कड़कड़ाती ठंड में एक तस्वीर खींची — एक बुज़ुर्ग औरत, जो अकेली धूप में बैठी थी। वो तस्वीर उसने कभी किसी को नहीं दिखाई।
रिया ने बताया — उसकी एक कहानी है, जो वो तीन साल से लिख रही है। शुरुआत है, बीच है — लेकिन अंत नहीं पता। जैसे किरदार खुद उसे नहीं बताता कि वो कहाँ जाना चाहता है।
“शायद कुछ कहानियों का अंत होता ही नहीं,” आरव ने कहा।
“या शायद अंत होता है — बस हम देखना नहीं चाहते।”
एक पल की खामोशी।
वो किस्म की खामोशी जो असहज नहीं करती — बल्कि बताती है कि तुम किसी के साथ इतने सहज हो कि चुप रह सको।
रिया को याद नहीं कब आँखें लगीं।
— ✦ —
सुबह
खिड़की से रोशनी आई। पहले हल्की, फिर सुनहरी।
रिया की नींद खुली।
उसने सामने देखा।
सीट खाली थी।
कोई बैग नहीं। कोई निशान नहीं। जैसे कोई था ही नहीं।
“आरव…?” उसने इधर-उधर देखा। बोगी में। गलियारे में।
नहीं था।
लेकिन सीट पर — एक छोटा-सा काग़ज़। मुड़ा हुआ। उसके नाम पर रखा हुआ जैसे।
उसने खोला।
“कुछ सफर अधूरे ही अच्छे लगते हैं…
लेकिन अगर किस्मत ने चाहा, तो हम फिर मिलेंगे।
— आरव”
रिया ने काग़ज़ को हाथ में थामे रखा।
आँखों में नमी थी — लेकिन रोना नहीं आया। उस किस्म की भावना थी जो आँसुओं से बड़ी होती है।
उसने खिड़की के बाहर देखा।
खेत थे। सुबह की रोशनी में भीगे हुए। दूर कहीं एक नदी चमक रही थी।
उसने अपना डायरी निकाली। पेन उठाया।
और लिखा — पहला जुमला। वो जुमला जो तीन साल से नहीं आ रहा था।
“कुछ लोग मिलते हैं ताकि तुम खुद से मिल सको।”
ट्रेन स्टेशन पर रुकी।
रिया उतरी। भीड़ में खो गई।
लेकिन डायरी खुली थी। पेन चल रहा था।
वो कहानी जो तीन साल से अधूरी थी —
उसे आज अपना अंत मिल गया था।
या शायद — एक नई शुरुआत।
कुछ मुलाकातें मंज़िल नहीं देतीं —
बस रास्ता बदल देती हैं।
