आँखें खुलीं तो सबसे पहले रोशनी दिखी।
सफ़ेद। चुभती हुई। उस किस्म की रोशनी जो अस्पतालों में होती है — जो दिन और रात का फ़र्क मिटा देती है।
मैं अपने कमरे में नहीं था।
दीवारों पर नमी के पुराने दाग। हवा में कुछ — दवाई और कुछ और — जो नाक में चुभता था। और एक भारीपन जो सिर्फ जिस्म में नहीं, जैसे हवा में भी था।
मैंने उठने की कोशिश की। शरीर ने मना कर दिया।
तभी कोई पास आया।
“शांत रहो। तुम अभी सुरक्षित हो।”
दो लोग खड़े थे — सफ़ेद कोट, क्लिपबोर्ड, चेहरे पर वो भाव जो डॉक्टर तब रखते हैं जब मरीज़ से कुछ छिपाना हो।
“मैं यहाँ कैसे आया?” मेरी आवाज़ मुझे खुद पहचान नहीं आई — खुरदरी, टूटी हुई।
एक डॉक्टर ने दूसरे की तरफ देखा। एक छोटा-सा इशारा। फिर मेरी तरफ मुड़ा।
“तुम्हें पुल के नीचे बेहोश पाया गया था।”
और उसी पल — पिछली रात की सब कुछ एक साथ लौट आया। फोन की घंटी। रिया की आवाज़। पुल पर वो दो आकृतियाँ। दोनों ने एक साथ कहा था —
“तुमने गलत वाली को चुना।”
“रिया… कहाँ है?” मैंने घबराकर पूछा।
दोनों डॉक्टर चुप हो गए।
उस चुप्पी में जवाब था।
फिर एक ने धीरे से कहा — “रिया तीन दिन पहले मर चुकी है।”
“नहीं — मैंने उसे देखा। वो वहाँ थी। उसने मुझसे बात की। उसके कपड़ों से पानी टपक रहा था—”
दूसरे डॉक्टर ने बीच में काटा — “देखो, तुम ट्रॉमा में हो। दिमाग़ कभी-कभी ऐसी चीज़ें दिखाता है जो होती नहीं हैं।”
मैं कुछ कहने वाला था।
तभी — बिस्तर के पास रखा फोन वाइब्रेट हुआ।
एक बार। दो बार।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
मैं जम गया। तीनों जम गए।
मैंने धीरे से स्क्रीन की तरफ देखा —
Unknown Number
incoming call
डॉक्टर ने हाथ बढ़ाया — “मैं देखता हूँ—”
“नहीं!” मैं चिल्लाया।
लेकिन वो उठा चुका था।
— ✦ —
डॉक्टर का चेहरा
उसने फोन कान से लगाया।
पहले एक सेकंड। फिर दो। फिर पाँच।
और उसके बाद — उसका चेहरा बदला।
वो बदलाव जो इंसान के चेहरे पर तब आता है जब वो कुछ ऐसा सुने जो उसकी समझ से बाहर हो — जब दुनिया का जो नक्शा उसने दिमाग़ में बना रखा हो, वो एक झटके में टूट जाए।
आँखें फैलीं। रंग उड़ा। हाथ काँपा।
“हेलो… कौन…?” उसने पूछा — और आवाज़ में वो पेशेवर शांति नहीं रही जो डॉक्टरों में होती है।
फोन के उस तरफ से — वही आवाज़। वही जो मैंने पुल पर सुनी थी।
“तुमने… उसे बचा क्यों लिया?”
फोन उसके हाथ से गिर गया।
फर्श पर गिरा। स्क्रीन ऊपर की तरफ।
और उसी पल — कमरे की हवा बदली।
तापमान गिरा। इतनी तेज़ी से कि साँस से भाप निकलने लगी। लाइटें टिमटिमाईं — एक बार, दो बार — और फिर एक अजीब-सी पीली रोशनी में स्थिर हो गईं।
और तब —
कमरे के कोने से आवाज़ आई।
टप… टप… टप…
पानी।
फर्श पर। कोने में।
हम तीनों ने एक साथ उस तरफ देखा।
फर्श गीला हो रहा था। ऊपर से नहीं — जैसे ज़मीन के अंदर से आ रहा हो। और उस गीलेपन में — बहुत धीरे — एक आकृति बन रही थी।
पहले पैर। फिर कपड़ों का सफेद रंग। फिर हाथ। फिर —
चेहरा।
रिया।
लेकिन इस बार वो चेहरा पहले से और टूटा हुआ था। आँखों से काला पानी बह रहा था — आँसुओं की जगह। होंठ फटे हुए, जैसे पानी में बहुत देर रहने से त्वचा गल जाती है।
उसने डॉक्टर की तरफ देखा।
“तुमने उसे मुझसे दूर क्यों किया?”
डॉक्टर दीवार से सट गया। उसका शरीर काँप रहा था — वो किस्म का काँपना जो डर से नहीं, किसी गहरी समझ से आता है कि दुनिया जितनी तुमने सोची थी, उससे बड़ी है। और उसमें ऐसी चीज़ें हैं जिनका कोई इलाज नहीं।
“ये… ये क्या है?” उसकी आवाज़ एक फुसफुसाहट बनकर रह गई।
“भागो!” मैं चिल्लाया। “ये इंसान नहीं है — भागो!”
रिया ने धीरे-धीरे सिर घुमाया। मेरी तरफ।
और मुस्कुराई।
“अब तुम कहीं नहीं जाओगे।”
कमरे का दरवाज़ा बंद हो गया। किसी ने नहीं बंद किया — बस बंद हो गया।
लाइट गई।
पूरा अंधेरा।
सिर्फ एक रोशनी बची — फर्श पर पड़े फोन की स्क्रीन।
रिया कॉलिंग…
incoming call
मैंने उठाया।
इस बार कुछ नहीं पूछा। बस सुना।
पहले खामोशी। फिर — आवाज़ें। एक नहीं, कई। जैसे बहुत से लोग एक साथ, बहुत धीरे, एक ही चीज़ कह रहे हों।
और फिर उनमें से एक आवाज़ साफ हुई —
“वो अकेली नहीं है।”
मैंने ऊपर देखा।
रिया के पीछे — अब और लोग थे।
भीगे हुए। टूटे हुए। सबके कपड़ों से पानी टपक रहा था। सबकी आँखें — वही खाली, काली, गहरी।
कितने थे — गिनना मुमकिन नहीं था। कमरा उतना बड़ा नहीं था जितने वो थे। लेकिन थे। सब थे।
और तब — सबके फोन एक साथ बजने लगे।
वो आवाज़ें — अलग-अलग रिंगटोन, अलग-अलग फोन — लेकिन सब एक साथ। एक ही लय में।
और सब ने एक साथ — एक ही आवाज़ में — कहा:
“अब… तुम्हारी बारी है।”
कमरे से एक चीख निकली।
शायद मेरी थी। शायद डॉक्टर की। शायद दोनों की।
उसके बाद — कुछ नहीं।
उस अस्पताल के उस कमरे को अगले दिन से बंद कर दिया गया।
कोई वजह नहीं बताई गई।
बस ताला लगा दिया गया।
लेकिन रात की ड्यूटी करने वाले नर्स और वार्डबॉय जानते हैं —
उस बंद कमरे से, आज भी, रात को आवाज़ें आती हैं।
और कभी-कभी —
ठीक 2:17 पर —
अस्पताल के किसी फोन पर एक कॉल आती है।
कोई नाम नहीं। कोई नंबर नहीं।
बस स्क्रीन पर —
“रिया कॉलिंग…”
अगर कभी रात 2:17 पर यह नाम तुम्हारी स्क्रीन पर आए —
फोन मत उठाना।
