फोन पर आई मृत लड़की की कॉल

Team Maunam
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रात के 2:17 बजे फोन बजा।

उस वक्त जब नींद सबसे गहरी होती है — जब दिमाग़ और जिस्म दोनों थके हुए होते हैं और दुनिया जैसे थम जाती है।

मैंने करवट बदली। सोचा स्पैम होगा, बाद में काट देंगे। लेकिन जब आँख खुली और स्क्रीन पर नाम दिखा —

नींद एक पल में गायब हो गई।

रिया कॉलिंग…
incoming call

मेरा गला सूख गया।

रिया। वही रिया। जिसे मैंने तीन दिन पहले सफेद कपड़ों में देखा था — उसकी माँ का रोना, फूलों की खुशबू और धुएँ की गंध। सब कुछ अभी भी इतना ताज़ा था कि आँखें बंद करने पर दिखने लगे।

फोन बजता रहा।

एक बार। दो बार। तीन बार।

और उसके साथ — एक अजीब-सा खिंचाव। जैसे कोई मेरी उँगलियाँ उस हरे बटन की तरफ खींच रहा हो। जैसे न उठाना मुमकिन ही न हो।

मैंने काँपते हाथों से Accept दबा दिया।

“हेलो…?”

सन्नाटा।

इतना गहरा कि कान में दर्द हो। कोई आवाज़ नहीं, कोई साँस नहीं, कोई हलचल नहीं।

और फिर — बहुत धीरे, जैसे बहुत दूर से, जैसे पानी के नीचे से कोई बोल रहा हो —

“तुमने… मुझे क्यों छोड़ा…?”

मेरे पूरे शरीर में एक सिहरन दौड़ गई — पैर से लेकर गर्दन तक।

“रिया…? ये… ये कौन है?”

जवाब में — हल्की-हल्की साँसें। टूटी हुई। जैसे कोई बहुत मेहनत से बोल रहा हो।

“मैं… अभी भी वहीं हूँ…”

“कहाँ?” मेरी आवाज़ में खुद मुझे डर सुनाई दे रहा था।

एक लंबी चुप्पी। फिर —

“जहाँ तुमने मुझे… आखिरी बार छोड़ा था।”

और उसी पल दिमाग़ में एक तस्वीर चमकी।

वो पुल।

— ✦ —
तीन दिन पहले

तीन दिन पहले — आखिरी बार मैं और रिया उसी पुल पर मिले थे।

लड़ाई हुई थी। बड़ी। वो किस्म की लड़ाई जो बाद में याद नहीं रहती किस बात पर शुरू हुई, लेकिन जिसके बाद सब कुछ टूट जाता है।

मैं गुस्से में था। उसे वहीं छोड़कर चला आया।

पीछे मुड़कर नहीं देखा।

अगले दिन खबर आई — रिया की लाश उसी पुल के नीचे मिली है।

उस खबर के बाद से मैं ठीक से सोया नहीं था। ठीक से जिया नहीं था।

और अब — वो फोन पर थी।

— ✦ —

फोन अचानक कट गया।

मोबाइल हाथ से लगभग गिर गया। मैं बिस्तर पर बैठा रहा — हाथ काँप रहे थे, साँस तेज़ थी, कमरा वही था लेकिन जैसे उसकी हवा बदल गई हो।

“कोई मज़ाक कर रहा है। किसी ने उसका नंबर क्लोन किया होगा। ऐसा होता है।”

मैं खुद को समझाता रहा।

और तभी — फोन फिर बजा।

इस बार नंबर अनजान था। कोई नाम नहीं। बस एक अजीब-सा नंबर जो किसी शहर का नहीं लग रहा था।

मैंने उठाया।

“हेलो…?”

इस बार आवाज़ साफ़ थी। बहुत साफ़। लेकिन उसमें कुछ था — कुछ ऐसा जो इंसानी आवाज़ में नहीं होता। जैसे शब्द सही हों, लेकिन उनके पीछे कुछ और हो।

“तुम… आ क्यों नहीं रहे?”

“कहाँ?” मेरी आवाज़ कानों में भी काँपती सुनाई दी।

“पुल पर… मैं इंतज़ार कर रही हूँ।”
— ✦ —
पुल

मुझे नहीं पता मैंने जैकेट कब पहनी। मुझे नहीं पता घर का दरवाज़ा कैसे खुला। मुझे नहीं पता मैंने चप्पल पहनी या नहीं।

बस अचानक — मैं बाहर था। रात की खाली सड़कों पर। ठंडी हवा चेहरे पर। और पैर थे जो उस पुल की तरफ बढ़ रहे थे — जैसे उन्हें कोई और चला रहा हो।

हर कदम के साथ दिल में डर और गहरा होता गया। लेकिन रुकना मुमकिन नहीं था।

पुल पर पहुँचा।

अँधेरा था। स्ट्रीट लाइट टिमटिमा रही थी — वो किस्म की रोशनी जो अँधेरे को कम नहीं करती, बस और डरावना बना देती है। नीचे नदी की आवाज़ आ रही थी — काली, ठंडी, गहरी।

और पुल के किनारे —

एक लड़की।

सफेद कपड़े। बाल चेहरे पर बिखरे हुए। पीठ मेरी तरफ।

वो धीरे-धीरे मुड़ी।

रिया।

लेकिन वैसी नहीं जैसी मैंने उसे जाना था। वो चेहरा — जिस पर हँसी रहती थी, जिसमें ज़िंदगी रहती थी — वो अब खाली था। आँखें काली। और होंठों पर एक मुस्कान जो किसी ख़ुशी से नहीं आई थी।

“तुम आ गए…” उसने कहा।

मेरे पैर जम गए।

“रिया… तुम तो…”

वो चलने लगी। मेरी तरफ। धीरे-धीरे।

और हर कदम के साथ — उसके कपड़ों से, उसके बालों से, पानी टपक रहा था। जैसे वो अभी-अभी नदी से निकली हो। जैसे नदी ने उसे वापस भेजा हो।

“तुमने मुझे छोड़ा था…”

आवाज़ में गुस्सा था। वो किस्म का गुस्सा जो सालों से जमा हो।

“अब… मैं तुम्हें नहीं छोड़ूँगी।”

और तभी —

मेरा फोन बजा।

जेब में। इस वक्त। यहाँ।

मैंने स्क्रीन देखी —

रिया कॉलिंग…
incoming call

लेकिन रिया मेरे सामने खड़ी थी।

मैंने ऊपर देखा।

वो मुस्कुरा रही थी। उसी ठंडी मुस्कान से।

और फोन से — उसकी आवाज़ आई।

“पीछे देखो।”

मैंने बहुत धीरे — बहुत डरते हुए — पीछे मुड़कर देखा।

पुल के दूसरे किनारे पर —

एक और रिया।

वही सफेद कपड़े। वही काली आँखें। वही गीले बाल।

अब दोनों तरफ वो थी। एक सामने। एक पीछे।

और दोनों ने एक साथ — एक ही आवाज़ में — कहा:

“तुमने… गलत वाली को चुना।”

उसके बाद क्या हुआ — मुझे नहीं पता।

सच में नहीं पता।

यादें वहीं खत्म हो जाती हैं।

लोग कहते हैं उस रात पुल के नीचे एक और लाश मिली थी।

चेहरा पहचानने लायक नहीं था।

पुलिस ने केस बंद कर दिया — “दुर्घटना।”

लेकिन जो लोग उस इलाके में रहते हैं, वो जानते हैं।

आज भी — हर रात —

किसी न किसी के फोन पर ठीक 2:17 पर एक कॉल आती है।

कोई नाम नहीं दिखता। कोई नंबर नहीं।

बस स्क्रीन पर लिखा होता है —

“रिया कॉलिंग…”

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