बाजीराव पेशवा — जिसने कभी युद्ध नहीं हारा
— वह तूफान जो चालीस साल में बुझ गया —
“उत्तर में हिमालय है, दक्षिण में समुद्र। पूरब में बंगाल है, पश्चिम में सिंध। इन सब के बीच जो था — वह मराठा साम्राज्य था। और उस साम्राज्य की आत्मा थी — बाजीराव।”*
प्रस्तावना: एक योद्धा जिसे इतिहास ने भुला दिया
दुनिया के महान सेनापतियों की सूची बनाओ।
सिकंदर। नेपोलियन। हनिबल। जूलियस सीजर।
इन सब में एक बात समान है — इन सब ने कभी न कभी हार का मुँह देखा।
लेकिन एक नाम है — जिसने कभी नहीं हारा।
एक भी युद्ध नहीं।
बाजीराव पेशवा।
इकतालीस युद्ध। इकतालीस जीत।
एक भी हार नहीं।
यह रिकॉर्ड — आज भी अटूट है।
लेकिन इस नाम को — जितना जाना जाना चाहिए — उतना नहीं जाना जाता।
शायद इसलिए कि भारतीय इतिहास की किताबें अक्सर अधूरी हैं।
शायद इसलिए कि जो सबसे चमकता है — उसे अक्सर सबसे ज्यादा अंधेरे में रखा जाता है।
लेकिन आज — उस चमक को उसका हक दिलाने का वक्त है।
यह कहानी है — श्रीमंत बाजीराव बल्लाल भट्ट।
जिसे दुनिया जानती है — बाजीराव पेशवा के नाम से।
भाग एक: वह मिट्टी जिसने एक तूफान बनाया
अध्याय १: मराठा साम्राज्य — वह पृष्ठभूमि
बाजीराव को समझने के लिए पहले यह समझना होगा — वे किस दुनिया में जन्मे।
छत्रपति शिवाजी महाराज ने जो स्वराज्य का सपना देखा था — वह उनके बाद भी जीवित रहा।
लेकिन जीवित रहना और फलना-फूलना — दो अलग बातें हैं।
शिवाजी के बाद —
संभाजी महाराज को मुगलों ने पकड़कर बर्बरतापूर्वक मारा।
राजाराम महाराज संघर्ष करते रहे।
ताराबाई ने संघर्ष की लौ जलाए रखी।
और अंत में — शाहू महाराज को मुगलों की कैद से रिहाई मिली।
शाहू महाराज साहिब ने पेशवा की परंपरा को नई ऊँचाई दी।
पेशवा — यानी प्रधानमंत्री। जो राज्य का असली संचालक था।
और जब बालाजी विश्वनाथ पेशवा बने — उन्होंने मराठा साम्राज्य को फिर से खड़ा किया।
उन्हीं बालाजी विश्वनाथ के घर — एक बालक का जन्म हुआ।
१८ अगस्त, १७०० ई.
नाम — बाजीराव।
अध्याय २: बचपन — एक असाधारण बच्चे की कहानी
बाजीराव का बचपन — साधारण नहीं था।
उनके पिता बालाजी विश्वनाथ — पेशवा थे। राज्य के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति।
घर में राजनीति की बातें होती थीं। सैन्य रणनीति पर चर्चा होती थी। मराठा साम्राज्य के सपने थे।
और छोटा बाजीराव — यह सब सुनता था।
लेकिन सिर्फ सुनता नहीं था।
समझता था।
एक किस्सा है —
बाजीराव बारह वर्ष के थे।
उनके पिता एक युद्ध की रणनीति पर बात कर रहे थे।
छोटे बाजीराव ने सुना।
और फिर बोले — “पिताजी, मैं एक रास्ता सुझा सकता हूँ।”
पिता ने हँसकर कहा — “बताओ।”
बाजीराव ने जो रास्ता सुझाया — उसे सुनकर सब बड़े अनुभवी सरदार चुप रह गए।
वह रास्ता — बिल्कुल सही था।
उस दिन सबको पता चल गया —
यह बच्चा साधारण नहीं है।
अध्याय ३: पिता की मृत्यु और बीस साल का पेशवा
२ अप्रैल, १७२०।
बालाजी विश्वनाथ का निधन हो गया।
और अब — शाहू महाराज के सामने सवाल था।
अगला पेशवा कौन?
दरबार में कई दावेदार थे।
अनुभवी सरदार।
बुजुर्ग नेता।
लेकिन शाहू महाराज ने —
बाजीराव को चुना।
बीस साल का लड़का।
पेशवा।
दरबार में विरोध हुआ।
“इतना छोटा लड़का? इतनी बड़ी जिम्मेदारी?”
लेकिन शाहू महाराज ने कहा —
“मैं बाजीराव को पहचानता हूँ। यह वह आग है जो मराठा साम्राज्य को रोशन करेगी।”
और शाहू महाराज की यह पहचान — इतिहास ने सही साबित की।
उस दिन बाजीराव ने शाहू महाराज के सामने एक संकल्प लिया —
“महाराज, मैं मराठा ध्वज को हिमालय तक ले जाऊँगा।”
यह संकल्प — उन्होंने पूरा किया।
भाग दो: बाजीराव की युद्धनीति — एक नई परिभाषा
अध्याय ४: वह रणनीति जिसने दुश्मनों को हैरान किया
बाजीराव की सबसे बड़ी ताकत क्या थी?
गति।
अप्रत्याशितता।
निर्णय की क्षमता।
उनकी रणनीति को समझना हो तो एक शब्द काफी है — “तूफान।”
वे जब निकलते थे —
दुश्मन को पता नहीं चलता था कि वे कहाँ से आएँगे।
उनकी घुड़सवार सेना — मराठा घुड़सवार — दुनिया की सबसे तेज सेनाओं में से एक थी।
एक दिन में ७०-८० किलोमीटर तक।
जब मुगल सेना पड़ाव डालती — तब तक बाजीराव सौ मील आगे होते।
जब मुगल तैयार होते — तब तक बाजीराव उनके पीछे होते।
बाजीराव ने एक बात कही थी जो आज भी सैन्य अकादमियों में पढ़ाई जाती है:
“दुश्मन की राजधानी पर मारो — उसकी सेना खुद-ब-खुद बिखर जाएगी।”
यह “Strike at the capital” सिद्धांत — आधुनिक युद्धनीति का आधार है।
अध्याय ५: पहली परीक्षा — निजाम से टक्कर
बाजीराव पेशवा बने — और उनकी पहली बड़ी चुनौती थी।
निजाम-उल-मुल्क। हैदराबाद का निजाम।
मुगल साम्राज्य का सबसे शक्तिशाली सूबेदार।
एक अनुभवी, चालाक, और ताकतवर दुश्मन।
और उसने — मराठों को कमजोर समझकर — उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
बाजीराव ने क्या किया?
उन्होंने निजाम की राजधानी की तरफ मार्च किया।
निजाम समझ नहीं पाया — यह बीस साल का लड़का इतनी तेजी से कैसे आ गया?
पालखेड का युद्ध — १७२८।
बाजीराव ने निजाम को घेर लिया।
ऐसे घेरा कि निजाम की सेना न आगे जा सकती थी, न पीछे।
निजाम के पास रसद नहीं बची।
पानी नहीं।
खाना नहीं।
और निजाम को — वह अनुभवी, बुजुर्ग, ताकतवर निजाम को —
संधि करनी पड़ी।
बीस साल के पेशवा के सामने।
यह मराठा इतिहास की पहली बड़ी राजनीतिक जीत थी।
और यह पहली — लेकिन आखिरी नहीं थी।
भाग तीन: दिल्ली की तरफ — वह सपना जो सच हुआ
अध्याय ६: वह महत्वाकांक्षा — हिंदू साम्राज्य का सपना
बाजीराव की सोच — उनके समकालीनों से बहुत आगे थी।
वे छोटे-छोटे युद्ध नहीं लड़ते थे।
उनके मन में एक बड़ा सपना था।
“हिंदू साम्राज्य।”
एक बार उन्होंने शाहू महाराज से कहा:
“महाराज, पुराना पेड़ खोखला हो चुका है। उसे एक धक्का काफी है। मुगल साम्राज्य की जड़ें खोखली हैं। मैं उन्हें धक्का दूँगा। हमारा ध्वज अटक पर लहराएगा।”
अटक — वह जगह जो आज के पाकिस्तान में है।
जहाँ से हिंदुकुश पर्वत शुरू होते हैं।
यह सपना था — अखंड भारत का।
और इस सपने को पूरा करने के लिए —
बाजीराव ने उत्तर की तरफ रुख किया।
अध्याय ७: मालवा और बुंदेलखंड — जीत पर जीत
बाजीराव ने पहले मालवा जीता।
तब गुजरात।
तब मालवा को पक्का किया।
तब बुंदेलखंड।
छत्रसाल — बुंदेलखंड के राजा — उन पर मुगलों ने आक्रमण किया।
छत्रसाल ने बाजीराव को पुकारा।
बाजीराव इतनी तेजी से आए — कि दुश्मन को विश्वास नहीं हुआ।
वे आए।
लड़े।
जीते।
छत्रसाल ने बाजीराव को अपने राज्य का एक बड़ा हिस्सा दिया।
और अपनी पोती मस्तानी को भी।
यह वह नाम है जिसके बारे में बाद में बात होगी।
लेकिन पहले — युद्ध।
अध्याय ८: दिल्ली पर धावा — वह दिन जो इतिहास में दर्ज है
सन् १७३७।
यह वह साल था जब बाजीराव ने इतिहास का सबसे साहसी कदम उठाया।
वे सीधे दिल्ली की तरफ बढ़े।
उस समय दिल्ली में — मुहम्मद शाह “रंगीला” का राज था।
मुगल बादशाह।
और उनके दरबार में था — निजाम-उल-मुल्क। वही निजाम जिसे बाजीराव पालखेड में हरा चुके थे।
जब खबर आई कि बाजीराव दिल्ली की तरफ आ रहे हैं —
दिल्ली में दहशत फैल गई।
बादशाह घबराया।
निजाम ने कहा — “रोको इसे!”
लेकिन कोई नहीं रोक सका।
बाजीराव इतनी तेजी से आए कि दिल्ली की सेना तैयार भी नहीं हो सकी।
और मार्च १७३७ में —
बाजीराव दिल्ली के बाहर खड़े थे।
दिल्ली — मुगल साम्राज्य की राजधानी — एक मराठा पेशवा के सामने काँप रही थी।
बाजीराव ने शहर नहीं जीता — लेकिन यह दिखा दिया:
मुगल साम्राज्य का कोई भी कोना सुरक्षित नहीं है।
यह मनोवैज्ञानिक जीत — किसी भी क्षेत्र की जीत से बड़ी थी।
पूरे हिंदुस्तान में संदेश गया —
मराठे दिल्ली तक पहुँच सकते हैं।
अध्याय ९: भोपाल का युद्ध — वह जीत जो असंभव थी
दिल्ली के बाद — निजाम ने बदला लेने की ठानी।
उसने एक बड़ी सेना इकट्ठी की।
मुगल सेना।
अफगान सेना।
और खुद उसकी फौज।
भोपाल के पास — दोनों सेनाएँ आमने-सामने आईं।
निजाम की सेना — बड़ी।
बाजीराव की सेना — छोटी।
लेकिन बाजीराव ने एक ऐसी रणनीति अपनाई जो पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाई जाती है।
उन्होंने निजाम की सेना को — घेर लिया।
इस तरह कि रसद का रास्ता बंद।
पानी का रास्ता बंद।
आगे जाने का रास्ता बंद।
और जब निजाम फँसा —
तब बाजीराव ने हमला नहीं किया।
उन्होंने इंतजार किया।
तीन दिन।
चार दिन।
पाँचवें दिन — निजाम की सेना में बगावत।
सैनिक भूखे थे। प्यासे थे।
निजाम के पास कोई रास्ता नहीं बचा।
दूसरी बार — निजाम ने बाजीराव के सामने घुटने टेके।
“दोराहा की संधि” — जनवरी १७३८।
यह बाजीराव की सबसे बड़ी रणनीतिक जीत थी।
भाग चार: मस्तानी — वह प्रेम जिसने आग लगाई
अध्याय १०: मस्तानी — एक राजकुमारी जो अलग थी
अब वह अध्याय जो बाजीराव की कहानी को एक और आयाम देता है।
मस्तानी।
छत्रसाल की पोती।
राजपूत पिता और मुस्लिम माँ की संतान।
मस्तानी — दो दुनियाओं के बीच की एक ऐसी स्त्री थी जो किसी एक दुनिया में नहीं समाती थी।
वे सुंदर थीं।
नृत्य में पारंगत।
तलवारबाजी जानती थीं।
घुड़सवारी करती थीं।
और वे — बाजीराव से प्रेम करती थीं।
यह प्रेम — पहली नजर का था या धीरे-धीरे हुआ — इतिहास पूरी तरह नहीं बताता।
लेकिन जो निश्चित है — वह यह कि जब बाजीराव ने मस्तानी को पहली बार देखा —
वे थम गए।
एक ऐसा योद्धा — जो कभी नहीं रुका — वह एक स्त्री की आँखों के सामने रुक गया।
अध्याय ११: पेशवाई का विरोध — वह तूफान जो भीतर था
बाजीराव ने मस्तानी को अपनाया।
उन्हें अपने महल में जगह दी।
उनसे विवाह किया — या कम से कम उन्हें अपनी धर्मपत्नी का दर्जा दिया।
और यहाँ से शुरू हुई — एक अलग तरह की लड़ाई।
पुणे में विरोध।
ब्राह्मण समाज।
परिवार।
भाई चिमाजी अप्पा।
माँ राधाबाई।
पहली पत्नी काशीबाई।
सब विरुद्ध।
“मस्तानी मुसलमान है। उसे यहाँ नहीं रखा जा सकता।”
“यह हमारी परंपरा के विरुद्ध है।”
“पेशवाई की प्रतिष्ठा खत्म होगी।”
लेकिन बाजीराव अडिग रहे।
जो मैदान में नहीं झुका — वह घर में भी नहीं झुका।
अध्याय १२: काशीबाई — वह पत्नी जो समझती थी
यहाँ एक दिलचस्प बात है।
बाजीराव की पहली पत्नी — काशीबाई — के बारे में।
काशीबाई एक असाधारण स्त्री थीं।
उन्होंने मस्तानी का विरोध किया — यह सच है।
लेकिन उन्होंने बाजीराव को कभी नहीं छोड़ा।
एक किस्सा है।
एक बार जब बाजीराव बहुत बीमार थे —
काशीबाई खुद आईं।
और बाजीराव की सेवा की।
उनके बारे में लोग कहते हैं — वे समझती थीं बाजीराव को।
उनकी महत्वाकांक्षा को।
उनके दर्द को।
और शायद — उनके प्रेम को भी।
यह त्रिकोण — बाजीराव, काशीबाई, मस्तानी — इतिहास के सबसे जटिल रिश्तों में से एक है।
अध्याय १३: मस्तानी की कैद — वह पाप जो पेशवाई ने किया
जब बाजीराव युद्ध पर गए —
पुणे में जो हुआ — वह इतिहास का सबसे दुखद अध्याय है।
बाजीराव की अनुपस्थिति में —
मस्तानी को कैद कर लिया गया।
उनके परिवार ने।
उनके भाई ने।
पर्वती (पुणे) के मंदिर में बंद कर दिया।
जब बाजीराव को खबर मिली —
वे अभियान बीच में छोड़कर वापस आने वाले थे।
लेकिन राज्य की जिम्मेदारी ने रोका।
और मस्तानी — कैद में रहीं।
इतिहास में मस्तानी की मृत्यु के बारे में कई कहानियाँ हैं।
कुछ कहते हैं — वे कैद में ही मर गईं।
कुछ कहते हैं — उन्होंने प्राण त्याग दिए।
लेकिन जो निश्चित है — वे बाजीराव से बिछड़ गईं।
और बाजीराव —
जो कभी नहीं टूटे — वे इस बार टूट गए।
भीतर से।
भाग पाँच: वे युद्ध जो इतिहास में दर्ज हैं
अध्याय १४: चिमाजी अप्पा और वसई का युद्ध — भाई का गौरव
बाजीराव की कहानी में उनके भाई चिमाजी अप्पा का नाम भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
चिमाजी — बाजीराव के छोटे भाई।
और एक महान योद्धा।
वसई का युद्ध — १७३९।
वसई — आज का महाराष्ट्र।
वहाँ पुर्तगालियों का किला था।
जिसे अजेय माना जाता था।
समुद्र के किनारे।
मजबूत दीवारें।
तोपखाना।
और पुर्तगाल से आने वाली रसद।
चिमाजी अप्पा — बाजीराव की अनुमति से — उस किले पर टूट पड़े।
मई १७३९।
एक भयंकर लड़ाई।
और वह किला — जिसे अजेय कहा जाता था — जीत लिया गया।
यह जीत — इतिहास में “वसई की विजय” के नाम से जानी जाती है।
यह मराठों की पहली बड़ी नौसैनिक और तटीय जीत थी।
और यह संभव हुआ — बाजीराव के नेतृत्व में।
अध्याय १५: वे चालीस युद्ध — एक संक्षिप्त यात्रा
बाजीराव के कुछ प्रमुख युद्ध:
पालखेड (१७२८) — निजाम को घेरकर बिना ज्यादा खून बहाए संधि करवाई।
दभोई (१७३१) — मराठा आंतरिक विद्रोह को दबाया।
बुंदेलखंड (१७२८-३२) — छत्रसाल की मदद और बुंदेलखंड में मराठा प्रभाव।
मालवा अभियान (१७२३-३५) — मालवा पर मराठा अधिकार।
गुजरात (१७३०) — गुजरात में मराठा प्रभाव।
दिल्ली अभियान (१७३७) — मुगल राजधानी तक पहुँचना।
भोपाल (१७३७-३८) — निजाम की दूसरी हार।
वसई (१७३९) — पुर्तगाल किले की विजय।
हर युद्ध में — एक नई रणनीति।
हर जीत में — एक नया अध्याय।
और हर अभियान में — वही तूफानी गति जो दुश्मन को समझ नहीं आती थी।
अध्याय १६: बाजीराव की सेना — वह अनोखी फौज
बाजीराव की सेना — परंपरागत सेना नहीं थी।
वे बड़ी, भारी, धीमी सेनाओं में विश्वास नहीं करते थे।
उनकी सेना की विशेषताएँ:
पहली — गति: उनके घुड़सवार एक दिन में ७०-८० किमी तय करते थे। यह उस युग में अभूतपूर्व था।
दूसरी — हल्का सामान: बाजीराव की सेना बहुत कम सामान लेकर चलती थी। खाना — रास्ते में मिल जाता। पानी — नदियाँ थीं। यह “light and fast” रणनीति आधुनिक युद्ध का आधार है।
तीसरी — अचानक हमला: दुश्मन को कभी पता नहीं चलता था कि बाजीराव कहाँ से आएँगे। यह Shock and Awe रणनीति थी — सदियों पहले।
चौथी — मनोबल: बाजीराव की सेना का मनोबल — असाधारण था। वे जानते थे — उनका पेशवा कभी नहीं हारता। और यह विश्वास — उन्हें अजेय बनाता था।
भाग छः: वह इंसान — योद्धा के पीछे
अध्याय १७: बाजीराव का व्यक्तित्व — एक बहुआयामी इंसान
बाजीराव को सिर्फ योद्धा के रूप में देखना — अधूरा होगा।
वे एक बहुआयामी व्यक्तित्व थे।
कवि: उन्होंने कविताएँ लिखीं। मराठी में। और उन कविताओं में — उनकी आत्मा थी।
प्रेमी: मस्तानी के प्रति उनका प्रेम — इतिहास में दर्ज है। वे एक ऐसे प्रेमी थे जिसने समाज से लड़कर प्रेम किया।
भक्त: वे परशुराम के भक्त थे। युद्ध से पहले वे प्रार्थना करते थे। जीत के बाद आभार मानते थे।
प्रशासक: युद्ध जीतना अलग बात है। जीते हुए इलाके को संभालना अलग। बाजीराव ने दोनों किया। उन्होंने मराठा साम्राज्य का विस्तार किया — और उसे व्यवस्थित भी किया।
अध्याय १८: शाहू महाराज और बाजीराव — एक अनोखा रिश्ता
शाहू महाराज और बाजीराव का रिश्ता —
सिर्फ राजा और प्रधानमंत्री का नहीं था।
यह एक पिता-पुत्र जैसा रिश्ता था।
शाहू महाराज — जो बाजीराव की क्षमता पहले पहचानते थे — उन्होंने हमेशा बाजीराव का साथ दिया।
जब दरबार में विरोध हुआ — शाहू महाराज ने बाजीराव को समर्थन दिया।
जब मस्तानी के मामले में विरोध हुआ — शाहू महाराज ने बाजीराव का बचाव किया।
और बाजीराव ने भी —
शाहू महाराज के भरोसे को कभी नहीं तोड़ा।
हर जीत — शाहू महाराज के चरणों में।
हर विजय — “महाराज की कृपा से।”
यह भक्ति — सिर्फ राजनीतिक नहीं थी।
यह सच्ची थी।
अध्याय १९: बाजीराव और हिंदवी स्वराज्य का सपना
शिवाजी महाराज ने “हिंदवी स्वराज्य” का सपना देखा था।
बाजीराव उस सपने को आगे ले जाना चाहते थे।
लेकिन उनका दृष्टिकोण थोड़ा अलग था।
वे केवल मराठा साम्राज्य नहीं चाहते थे।
वे चाहते थे — एक ऐसा हिंदुस्तान जहाँ कोई भी विदेशी ताकत न हो।
मुगल — जो विदेशी थे। पुर्तगाल — जो विदेशी थे। अंग्रेज — जो अभी छोटे थे।
बाजीराव ने कहा था:
“उत्तर में हिमालय, दक्षिण में समुद्र — यह भारत है। और यह भारत — भारतीयों का है।”
यह सपना — उनके जीवन में पूरा नहीं हुआ।
लेकिन उन्होंने उस दिशा में जितना किया — वह असाधारण था।
भाग सात: अंतिम अध्याय — एक तूफान का शांत होना
अध्याय २०: थकान और टूटन — एक योद्धा की मानवीय कहानी
सन् १७४०।
बाजीराव चालीस वर्ष के थे।
बीस साल की उम्र में पेशवा बने।
बीस साल में — इकतालीस युद्ध।
इकतालीस जीत।
पूरे हिंदुस्तान में मराठा साम्राज्य का विस्तार।
लेकिन उस विजयी शरीर में —
एक थकी हुई आत्मा थी।
मस्तानी की याद।
परिवार का विरोध।
लगातार युद्ध।
और वह भीतरी दर्द — जो किसी को नहीं दिखता।
बाजीराव का स्वास्थ्य गिरने लगा।
अध्याय २१: रावेरखेड़ी — वह आखिरी पड़ाव
अप्रैल १७४०।
बाजीराव नर्मदा नदी के किनारे थे।
रावेरखेड़ी।
(आज का मध्यप्रदेश)
वे एक अभियान पर निकले थे।
लेकिन शरीर ने साथ नहीं दिया।
तेज बुखार।
डॉक्टरों ने कहा — आराम करो।
लेकिन बाजीराव ने कहा — “मराठा साम्राज्य को आराम नहीं मिल सकता।”
और फिर — २८ अप्रैल, १७४०।
बाजीराव पेशवा नहीं रहे।
मात्र चालीस वर्ष की आयु में।
नर्मदा के किनारे।
जिस तूफान ने पूरे हिंदुस्तान को हिला दिया था — वह शांत हो गया।
अध्याय २२: शाहू महाराज का दुख — एक राजा का विलाप
जब शाहू महाराज को खबर मिली —
वे रो पड़े।
एक राजा — जो शायद कभी नहीं रोता — वह रोया।
उन्होंने कहा:
“बाजीराव के साथ — मेरी दाहिनी बाँह चली गई।”
यह सिर्फ एक प्रशंसा नहीं थी।
यह एक पिता का दुख था।
एक विश्वस्त मित्र का जाना था।
और एक महान युग का अंत था।
अध्याय २३: काशीबाई का बलिदान — एक पत्नी की आखिरी विदाई
जब बाजीराव नहीं रहे —
काशीबाई — उनकी पहली पत्नी — कई दिनों तक भोजन नहीं कर सकीं।
वे टूट गई थीं।
लेकिन उन्होंने अपने बेटों को संभाला।
नानासाहेब पेशवा — जो अगले पेशवा बने — वे काशीबाई के ही पुत्र थे।
और नानासाहेब ने —
अपने पिता बाजीराव की विरासत को आगे बढ़ाया।
भाग आठ: बाजीराव की विरासत — वह नाम जो मरा नहीं
अध्याय २४: मराठा साम्राज्य का स्वर्णकाल
बाजीराव के बाद —
मराठा साम्राज्य और बढ़ा।
उनके उत्तराधिकारियों ने —
पानीपत तक पहुँचाया।
अटक तक मराठा ध्वज फहराया।
यह बाजीराव का सपना था।
जो उनके जाने के बाद पूरा हुआ।
लेकिन नींव —
बाजीराव ने रखी थी।
अध्याय २५: आधुनिक सैन्य रणनीति में बाजीराव
आज —
वेस्टपॉइंट मिलिटरी अकादमी (अमेरिका) में बाजीराव का अध्ययन होता है।
ब्रिटिश मिलिटरी ने उनकी रणनीति का विश्लेषण किया।
भारतीय सैन्य अकादमी में उन्हें पढ़ाया जाता है।
एक अंग्रेज इतिहासकार Sir Jadunath Sarkar ने लिखा:
“Bajirao was perhaps the greatest cavalry general India has ever produced.”
(बाजीराव शायद भारत के सबसे महान घुड़सवार सेनापति थे।)
अध्याय २६: बाजीराव और भारत का भविष्य
एक सवाल।
अगर बाजीराव १७४० में नहीं मरते —
अगर वे और २०-२५ साल जीते —
तो १७६१ का पानीपत का तीसरा युद्ध — जिसमें मराठे हारे — शायद न होता।
और अगर पानीपत न होता —
तो शायद अंग्रेजों को इतना मौका न मिलता।
और भारत का इतिहास —
कुछ और होता।
यह “क्या होता” का सवाल — इतिहासकार आज भी पूछते हैं।
और जवाब हमेशा एक ही आता है —
“बाजीराव होते — तो कुछ और होता।”
अध्याय २७: वह दोहा जो बाजीराव ने जिया
बाजीराव पेशवा के बारे में एक प्रसिद्ध उक्ति है:
“हम दिल्ली में मराठा ध्वज फहराएँगे। नहीं — हम दिल्ली नहीं जाएँगे। हम दिल्ली को यहाँ — पुणे में — ला देंगे।”
यह अहंकार नहीं था।
यह आत्मविश्वास था।
और उन्होंने दिखाया — यह आत्मविश्वास झूठा नहीं था।
अध्याय २८: इतिहास का वह अन्याय
बाजीराव पेशवा के साथ इतिहास ने एक अन्याय किया।
उन्हें वह सम्मान नहीं मिला — जो मिलना चाहिए था।
सिकंदर को दुनिया जानती है।
नेपोलियन को दुनिया जानती है।
लेकिन बाजीराव को?
वे दोनों से कम नहीं थे।
बल्कि एक मायने में — बेहतर।
सिकंदर ने हार देखी — ग्रीस में। नेपोलियन ने हार देखी — वाटरलू में।
बाजीराव ने कभी नहीं हारा।
यह रिकॉर्ड — इतिहास में अटूट है।
अध्याय २९: पुणे का शनिवारवाड़ा — जहाँ बाजीराव की आत्मा है
शनिवारवाड़ा।
पुणे का वह महल — जो बाजीराव ने बनवाया।
आज वह खंडहर है।
लेकिन उसकी दीवारों में — बाजीराव की साँसें हैं।
जब आप शनिवारवाड़ा जाते हैं —
और उन पुरानी दीवारों को छूते हैं —
लगता है जैसे कोई है।
वह तूफानी उपस्थिति।
वह अजेय आत्मा।
बाजीराव।
उपसंहार: वह तूफान जो थमा नहीं
अध्याय ३०: बाजीराव — एक अमर संदेश
बाजीराव पेशवा चालीस साल जिए।
लेकिन चालीस साल में उन्होंने जो किया — वह एक सदी के बराबर था।
उनका संदेश आज भी जीवित है:
“गति ही शक्ति है।”
“निर्णय में देर — मृत्यु के समान।”
“दुश्मन की राजधानी पर मारो — उसकी सेना बिखर जाएगी।”
“आत्मविश्वास सबसे बड़ा हथियार है।”
और सबसे महत्वपूर्ण —
“सपने बड़े रखो। इकतालीस युद्ध नहीं — इकतालीस जीत।”
“वह तूफान था जो आया। हर दिशा में बिजली गिराई। दिल्ली काँपी। निजाम झुका। पुर्तगाल हारा। और फिर — नर्मदा के किनारे — वह तूफान शांत हो गया। लेकिन जो बोया था उसने — वह आज भी फल दे रहा है। “बाजीराव — अमर रहे।”*
“श्रीमंत बाजीराव पेशवा को कोटि-कोटि प्रणाम।”
परिशिष्ट: ऐतिहासिक तथ्य
बाजीराव पेशवा — जीवन के महत्वपूर्ण पड़ाव
| घटना | तिथि |
|---|---|
| जन्म | १८ अगस्त, १७०० |
| पेशवा बने | १७२० (२० वर्ष) |
| पालखेड की जीत | १७२८ |
| दिल्ली अभियान | १७३७ |
| भोपाल की जीत | १७३७-३८ |
| वसई की विजय | १७३९ |
| निधन | २८ अप्रैल, १७४० |
प्रमुख युद्ध और परिणाम
| युद्ध | वर्ष | परिणाम |
|---|---|---|
| पालखेड | १७२८ | निजाम ने संधि की |
| दभोई | १७३१ | आंतरिक विद्रोह दबाया |
| दिल्ली | १७३७ | मुगल राजधानी तक पहुँचे |
| भोपाल | १७३८ | निजाम ने दूसरी बार संधि की |
| वसई | १७३९ | पुर्तगाल किला जीता |
बाजीराव पेशवा का परिवार
- पिता: बालाजी विश्वनाथ (प्रथम पेशवा)
- माता: राधाबाई
- भाई: चिमाजी अप्पा (महान योद्धा)
- प्रथम पत्नी: काशीबाई
- मस्तानी: द्वितीय पत्नी / प्रेमिका
- पुत्र: नानासाहेब पेशवा (उत्तराधिकारी)
यह गाथा उन सभी को समर्पित है जो बिना हारे लड़ते हैं — और जो सपने देखते हैं, भले ही पूरे न हों।
“जय बाजीराव! जय मराठा!”
— समाप्त —
