कमरे की सफाई करते वक्त…
अलमारी के पीछे कुछ गिरा—धप्प!
रवि ने झुककर देखा।
धूल से भरी… पुरानी सी डायरी।
“ये यहाँ कैसे आई?” उसने खुद से पूछा।
घर तो उसने अभी 6 महीने पहले ही लिया था।
पहले यहाँ कौन रहता था… उसे कभी जानने की जरूरत ही नहीं पड़ी।
लेकिन… आज कुछ अलग था।
रवि ने डायरी उठाई।
कवर पर हल्की सी लिखावट थी—
“अगर ये तुम्हें मिले… तो समझना मैं अब नहीं हूँ…”
उसका दिल एकदम से रुक सा गया।
“किसने लिखा होगा ये?”
उसने धीरे से पहला पन्ना खोला।
📅 12 जून 2018
“आज इस घर में शिफ्ट हुआ हूँ। सब ठीक है… लेकिन रात को अजीब सी आवाज़ें आती हैं। जैसे कोई धीरे-धीरे चल रहा हो…”
रवि हँसा—
“पुरानी बिल्डिंग है… आवाज़ें तो आएंगी ही।”
लेकिन अंदर कहीं हल्की सी बेचैनी भी हुई।
📅 15 जून 2018
“कल रात फिर वही हुआ… इस बार कदमों की आवाज़ मेरे कमरे तक आई। दरवाज़े के बाहर कोई खड़ा था… लेकिन जब खोला—कोई नहीं था।”
रवि ने अनजाने में अपने कमरे के दरवाज़े की तरफ देखा।
सब कुछ शांत था।
📅 20 जून 2018
“मैं अब यकीन करने लगा हूँ… इस घर में मैं अकेला नहीं हूँ। आईने में कभी-कभी कोई और दिखता है… मेरे पीछे खड़ा हुआ…”
रवि के हाथ हल्के से कांप गए।
उसने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।
कोई नहीं।
“ये सब बकवास है…”
उसने खुद को समझाया।
लेकिन फिर भी… उसने डायरी बंद नहीं की।
📅 25 जून 2018
“आज मैंने उसकी शक्ल देखी… वो मैं ही था… लेकिन आंखें पूरी काली… और मुस्कान अजीब…”
रवि का गला सूख गया।
“ये आदमी पागल हो गया था…”
उसने खुद से कहा।
📅 30 जून 2018
“अगर कोई ये पढ़ रहा है… तो सुनो—रात 2:17 पर आईने के सामने मत खड़े होना। वो उसी वक्त आता है…”
रवि ने घड़ी की तरफ देखा।
2:15 AM
उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
“बस 2 मिनट…”
उसने खुद से कहा।
“कुछ नहीं होगा…”
लेकिन तभी…
टक… टक… टक…
दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई।
रवि जम गया।
“इस वक्त… कौन हो सकता है?”
उसने धीरे से दरवाज़ा खोला।
बाहर…
कोई नहीं था।
उसने डरते हुए वापस कमरे में कदम रखा।
और तभी उसकी नज़र आईने पर पड़ी।
उसकी सांस रुक गई।
आईने में…
वो अकेला नहीं था।
उसके पीछे…
कोई खड़ा था।
धीरे-धीरे…
वो आकृति मुस्कुराई।
और वही आवाज़ आई—
“तुमने डायरी पढ़ ली…”
अगली सुबह…
पड़ोसियों ने रवि के कमरे का दरवाज़ा तोड़ा।
अंदर सब कुछ वैसा ही था।
बस…
आईने के सामने एक नई डायरी पड़ी थी।
जिस पर लिखा था—
“अगर ये तुम्हें मिले…”
