Prahlada – भक्त प्रह्लाद और हिरण्यकश्यप PART – 1

Team Maunam
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महलों की ऊँची दीवारों के पीछे सन्नाटा नहीं था, एक अनजाना खौफ था। वह लौट आया था। वह, जिसे पूरी सृष्टि ‘मौत का दूसरा नाम’ कहती थी। हिरण्यकश्यप के पैरों की आहट से धरती कांप रही थी। उसके शरीर से तपस्या की वह गंध आ रही थी जो साधारण इंसानों के फेफड़े जला देने के लिए काफी थी। उसने ब्रह्मा से वरदान नहीं, अमरता का एक ऐसा मायाजाल माँगा था जिसे भेदना नामुमकिन था। न दिन में मौत, न रात में। न इंसान से, न जानवर से। न घर के अंदर, न बाहर। वह अब एक सम्राट नहीं, एक विचार बन चुका था—एक ऐसा विचार जो ईश्वर को चुनौती दे रहा था।

लेकिन उस महल के सबसे अंधेरे कोने में, जहाँ रोशनी भी प्रवेश करने से कतराती थी, एक नन्हा सा बालक पालने में लेटा था। प्रह्लाद। उसकी आँखों में वह शांति थी जो हिरण्यकश्यप के करोड़ों सालों के तप में भी नहीं थी। यहीं से शुरू होती है वह जंग, जो हथियारों से नहीं, विश्वास से लड़ी जानी थी।

अमरता का अहंकार

हिरण्यकश्यप ने सिंहासन पर बैठते ही पहला आदेश दिया—’आज से इस साम्राज्य में कोई दूसरा भगवान नहीं होगा। हर मंदिर की मूर्तियाँ तोड़ दी जाएं। हर जुबान पर सिर्फ मेरा नाम होना चाहिए। जो नारायण का नाम लेगा, उसे यमराज के पास जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, मैं खुद उसकी रूह को तड़पाऊंगा।’

पूरे साम्राज्य में हाहाकार मच गया। लोगों की आस्था को तलवार की नोक पर बदला जाने लगा। हिरण्यकश्यप की शक्ति इतनी बढ़ गई थी कि देवता भी बादलों के पीछे छिपने लगे थे। वह अपनी आँखों से आग उगल सकता था। उसकी एक गर्जना से पहाड़ चटक जाते थे। लेकिन इस अजेय सम्राट के मन में एक ही कसक थी—उसका बेटा प्रह्लाद।

प्रह्लाद जब पांच साल का हुआ, तो उसे गुरुओं के पास भेजा गया ताकि वह ‘असुर नीति’ सीख सके। हिरण्यकश्यप चाहता था कि उसका बेटा दुनिया का सबसे बड़ा क्रूर शासक बने। उसे क्या पता था कि प्रह्लाद ने अपनी माँ कयाधु के गर्भ में ही वो सबक सीख लिए थे, जो बड़े-बड़े ऋषि-मुनि उम्र भर नहीं सीख पाते।

नारद मुनि ने गर्भ में ही उस बालक के कानों में ‘नारायण’ नाम का वह बीज बो दिया था, जो अब एक विशाल वटवृक्ष बनने को तैयार था।

गुरु का भय और बालक की जिद

गुरु शंड और अमर्क ने प्रह्लाद को राजनीति और युद्ध कौशल सिखाना शुरू किया। ‘प्रह्लाद, बोलो—हिरण्यकश्यपाय नम:!’ गुरुओं ने कठोर स्वर में कहा।

प्रह्लाद की मासूम आँखों में एक चमक उभरी। उसने धीरे से अपने होंठ खोले। गुरुओं को लगा कि बालक अब अपने पिता का जयघोष करेगा। लेकिन प्रह्लाद के गले से जो स्वर निकला, उसने पाठशाला की दीवारों को हिला कर रख दिया।

‘ॐ नमो नारायणाय।’

गुरुओं के चेहरे से खून गायब हो गया। यह सिर्फ एक नाम नहीं था, यह उस साम्राज्य की नींव पर पहली चोट थी। ‘चुप रहो! मूर्ख बालक, क्या तू अपनी मौत को दावत दे रहा है? अगर तेरे पिता ने यह सुन लिया, तो वह हमें भी नहीं छोड़ेंगे!’

प्रह्लाद ने शांत स्वर में उत्तर दिया, ‘गुरुदेव, सत्य कभी छिपता नहीं। मेरे पिता सम्राट हो सकते हैं, लेकिन जगत का स्वामी तो वही है जो कण-कण में वास करता है।’

उस दिन गुरुओं को समझ आ गया कि यह कोई साधारण बालक नहीं है। उन्होंने प्रह्लाद को डराया, धमकाया, भूखा रखा, लेकिन हर सजा के बाद प्रह्लाद के चेहरे पर वही अलौकिक मुस्कान वापस आ जाती। वह मिट्टी से घरौंदे बनाता और उनमें नारायण की छवि खोजता।

सम्राट की पहली परीक्षा

कुछ महीनों बाद, हिरण्यकश्यप ने अपने बेटे को दरबार में बुलाया। वह देखना चाहता था कि उसके बेटे ने क्या सीखा है। पूरा दरबार भरा हुआ था। दानव सेनापति, मंत्री और डरे हुए दरबारी सांसें रोके खड़े थे। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को अपनी गोद में बिठाया। यह शायद आखिरी बार था जब उसने अपने बेटे को पिता की नजर से देखा था।

‘पुत्र प्रह्लाद, बताओ तुमने गुरुओं से अब तक की सबसे श्रेष्ठ बात क्या सीखी है?’ हिरण्यकश्यप की आवाज पूरी सभा में गूँजी।

प्रह्लाद ने पिता की आँखों में आँखें डालकर बिना किसी डर के कहा, ‘पिताश्री, मैंने सीखा है कि यह संसार माया है। जो मनुष्य इस अंधकूप (संसार) को छोड़कर श्रीहरि के चरणों में शरण लेता है, वही वास्तव में सुखी है।’

पूरा दरबार जैसे पत्थर का हो गया। हिरण्यकश्यप की पकड़ प्रह्लाद के कंधों पर मजबूत हो गई। उसकी नसें तन गईं। उसकी आँखें क्रोध से लाल होने लगीं। उसने प्रह्लाद को अपनी गोद से झटके से नीचे गिरा दिया।

‘किसने सिखाया तुझे यह? नारायण? वह मेरा शत्रु है! उसने मेरे भाई हिरण्याक्ष का वध किया है! तू मेरे ही घर में पल रहा एक सांप है!’ हिरण्यकश्यप की दहाड़ से महल की छत से धूल गिरने लगी।

मौत के साए में बचपन

हिरण्यकश्यप ने अपने सैनिकों को आदेश दिया—’इस बालक को ले जाओ! इसकी हर सांस मेरे साम्राज्य के लिए खतरा है। इसे ऐसी मौत दो कि दुनिया फिर कभी उस विष्णु का नाम लेने की हिम्मत न करे।’

प्रह्लाद को कालकोठरी में डाल दिया गया। एक पांच साल का बच्चा, चारों तरफ अंधेरा और मौत का इंतज़ार। लेकिन वह डरा नहीं। उसने आँखें बंद कीं और ध्यान में मग्न हो गया। उसके चारों ओर एक नीली आभा चमकने लगी।

पहली कोशिश हुई जहर के प्याले से। सम्राट के सबसे वफादार दासों ने प्रह्लाद को हलाहल जहर पिलाया। यह वो जहर था जिसकी एक बूंद से हाथी मर सकता था। हिरण्यकश्यप बाहर खड़ा खिड़की से देख रहा था। उसने सोचा अब प्रह्लाद तड़प कर मरेगा। लेकिन जैसे ही प्रह्लाद ने जहर पिया, उसके चेहरे की कांति और बढ़ गई। जहर अमृत बन चुका था।

हिरण्यकश्यप का माथा ठनका। ‘यह कोई जादू है? या उस विष्णु की माया?’ उसने अगला आदेश दिया—’इसे हाथियों के पैरों तले कुचलवा दो!’

पागल हाथियों का घेरा

मैदान तैयार था। प्रह्लाद को बीच में खड़ा किया गया। मदमस्त, विशालकाय हाथियों को शराब पिलाई गई ताकि वे और भी हिंसक हो जाएं। हाथी चिंघाड़ते हुए प्रह्लाद की तरफ बढ़े। लोग अपनी आँखें बंद कर चुके थे। किसी को यकीन नहीं था कि वह छोटा सा शरीर इस प्रहार को झेल पाएगा।

जैसे ही सबसे बड़ा हाथी प्रह्लाद के पास पहुँचा, वह अचानक रुक गया। उसने अपनी सूंड ऊपर उठाई और प्रह्लाद के सामने झुक गया, जैसे किसी राजा को सलामी दे रहा हो। हाथियों ने प्रह्लाद को मारने के बजाय उसे अपने घेरे में लेकर उसकी रक्षा करनी शुरू कर दी।

हिरण्यकश्यप अपने सिंहासन से खड़ा हो गया। उसका चेहरा गुस्से से काला पड़ रहा था। ‘ये जानवर भी बिक गए? सैनिकों! इसे पहाड़ की चोटी से नीचे फेंक दो!’

हजारों फीट ऊँची खाई। नीचे नुकीले पत्थर और उफनती नदी। सैनिकों ने प्रह्लाद को जंजीरों में बांधकर नीचे धक्का दे दिया। प्रह्लाद हवा में था, गिर रहा था, लेकिन उसके होंठों पर अब भी वही नाम था। कहते हैं कि साक्षात् भगवान ने अपनी बाहों में उस बालक को थाम लिया और उसे फूलों की सेज पर सुला दिया।

वह रात और होलिका का प्रवेश

हिरण्यकश्यप अब हारने लगा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि एक नन्हा सा बच्चा उसकी पूरी सत्ता को चुनौती कैसे दे सकता है। तभी उसकी बहन होलिका वहाँ आई। उसे ब्रह्मा से एक चादर मिली थी, जिसे ओढ़ने के बाद आग उसे जला नहीं सकती थी।

‘भाई, चिंता मत करो। मैं इस बालक को अपनी गोद में लेकर चिता पर बैठूंगी। आग मुझे छुएगी नहीं और यह शत्रु का अंश राख हो जाएगा,’ होलिका ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा।

चिता तैयार की गई। पूरे नगर को इकट्ठा किया गया ताकि वे प्रह्लाद की ‘अंत’ देख सकें। प्रह्लाद को होलिका की गोद में बिठाया गया। लकड़ियों में आग लगा दी गई। लपटें आसमान छूने लगीं। धुएं के गुबार के बीच लोगों को लगा कि अब सब खत्म हो गया।

तभी अचानक हवा का रुख बदला। एक जोरदार बवंडर उठा। वह चमत्कारी चादर होलिका के शरीर से उड़कर प्रह्लाद के ऊपर आ लिपटी। पूरी सभा ने देखा कि होलिका आग में जलकर भस्म हो गई, जबकि प्रह्लाद उस आग के बीच ऐसे बैठा था जैसे शीतल जल के कुंड में हो।

जब आग शांत हुई, प्रह्लाद बाहर निकला—बिल्कुल सुरक्षित। हिरण्यकश्यप के सब्र का बांध अब टूट चुका था। वह अब और इंतज़ार नहीं कर सकता था। उसने अपनी तलवार निकाली और प्रह्लाद की ओर बढ़ा।

खंभे में कौन है?

‘कहाँ है तेरा वो भगवान? कहाँ छिपा है वह? अगर वह हर जगह है, तो क्या इस खंभे में भी है?’ हिरण्यकश्यप ने महल के एक विशाल पत्थर के खंभे पर लात मारते हुए पूछा। उसकी आवाज में पागलपन था।

प्रह्लाद ने हाथ जोड़कर कहा, ‘हाँ पिताश्री, वह इस खंभे में भी है, वह मुझमें भी है और वह आपमें भी है।’

‘मुझमें? मुझमें सिर्फ मैं हूँ!’ हिरण्यकश्यप ने अपनी भारी गदा उठाई और उस पत्थर के खंभे पर पूरी ताकत से वार किया। ‘अगर इसमें तेरा भगवान नहीं निकला, तो आज मैं तेरा सिर कलम कर दूँगा और देखूँगा कि कौन तुझे बचाने आता है!’

खंभा चटकने लगा। महल की जमीन फटने लगी। एक ऐसी आवाज गूँजी जो न किसी इंसान की थी, न किसी जानवर की। वह आवाज ब्रह्मांड के फटने जैसी थी। दरबारी कान बंद करके जमीन पर गिर पड़े। हिरण्यकश्यप पहली बार पीछे हटा। उसके चेहरे पर खौफ की पहली लकीर उभरी।

खंभे के बीच से एक ऐसी आकृति उभर रही थी जिसे देखकर काल भी कांप जाए। आधा शरीर शेर का, आधा इंसान का। बड़ी-बड़ी डरावनी आँखें, बाहर निकली हुई जीभ और नाखूनों की जगह लंबी तलवारें।

भगवान नृसिंह का अवतार हो चुका था।

लेकिन क्या हिरण्यकश्यप का वरदान उसे बचा पाएगा? क्या वह अमरता की शर्तों के पीछे छिप पाएगा? जंग अभी खत्म नहीं हुई थी। असली महासंग्राम तो अब शुरू होने वाला था।

(जारी रहेगा… अगले भाग में देखिए नृसिंह अवतार और हिरण्यकश्यप का अंत)

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