ट्रेन नंबर 666 का रहस्य

Team Maunam
Disclosure: This website may contain affiliate links, which means I may earn a commission if you click on the link and make a purchase. I only recommend products or services that I personally use and believe will add value to my readers. Your support is appreciated!
ट्रेन नंबर 666 का नाम मैंने पहले भी सुना था।

लोग धीरे से बोलते थे। जैसे उसका नाम लेने से भी कुछ बुरा हो जाए।

लेकिन उस रात — मैंने उसे सिर्फ सुना नहीं। मैंने उसे देखा।

और काश… काश मैंने उस दिन टिकट ही न लिया होता।

— ✦ —

इंदौर से दिल्ली का अचानक बना प्लान था। आखिरी वक्त पर सिर्फ एक सीट बची थी। मैंने IRCTC खोला — और स्क्रीन पर लिखा था:

Train No. 666 | Seat No. 27 | Coach S5
Available

मेरे हाथ एक पल के लिए रुक गए। फिर मैंने सोचा — “शायद नंबर ही ऐसा है। ज़्यादा मत सोच।”

बुकिंग हो गई।

— ✦ —

रात के 11 बजे। प्लेटफॉर्म लगभग खाली था।

जून का महीना था — लेकिन हवा में वो ठंडक थी जो मौसम से नहीं आती। जो अंदर से उठती है।

घड़ी की टिक-टिक… दूर भौंकते कुत्ते… और अनाउंसमेंट जो आधे में कट जाती थी — जैसे कोई बोलना नहीं चाहता हो।

तभी ट्रेन आई।

धीरे-धीरे। बिना किसी हड़बड़ी के।

और उसके साथ आई — एक अजीब सी खामोशी।

न ज़्यादा यात्री। न कोई शोर। न कुली। न चाय वाला।

बस… सन्नाटा।

— ✦ —

कोच S5 में घुसते ही एक गंध आई। पुराने लोहे जैसी। गीली मिट्टी जैसी। जैसे ट्रेन बरसों से कहीं दफन रही हो।

मैं सीट नंबर 27 पर बैठा।

सामने एक बुजुर्ग था।

वो मुझे देख रहा था।

बिना पलक झपकाए।

मैंने नजरें हटा लीं। खिड़की देखी। अंधेरा। खुद से बोला — सब ठीक है।

ट्रेन चल पड़ी।

— ✦ —

कुछ मिनट सब ठीक रहा।

फिर लाइट झपकी।

एक बार।

दो बार।

और फिर — पूरी बोगी अंधेरे में डूब गई।

उन चंद सेकंडों में… किसी ने मेरे कान के एकदम पास आकर कहा —

“मत आना चाहिए था…”मैं झटके से पीछे हटा। दिल गले में आ गया।

लाइट वापस आई।

सब वैसा ही था।

सामने वही बुजुर्ग। लेकिन अब वो मुस्कुरा रहा था। धीरे। बहुत धीरे।

जैसे उसे पता हो — क्या हुआ अभी।

— ✦ —

मैंने पानी पिया। खुद को समझाया — थका हुआ हूँ। दिमाग ट्रिक कर रहा है।

लेकिन तभी —

टिक… टिक… टिक…घड़ी की आवाज।

मैंने अपनी कलाई देखी।

मेरी घड़ी बंद थी।

तो ये आवाज… कहाँ से आ रही थी?

मैंने चारों तरफ देखा। कोई घड़ी नहीं। लेकिन आवाज रुक नहीं रही थी।

टिक… टिक… टिक…जैसे किसी काउंटडाउन की आखिरी साँसें हों।

— ✦ —

करीब 1:00 AM —

ट्रेन एक अनजाने स्टेशन पर रुकी।

कोई नाम नहीं। कोई बोर्ड नहीं। कोई रोशनी नहीं।

बस घनी धुंध। और एक ऐसा सन्नाटा जो कानों में दर्द करे।

मैंने खिड़की से बाहर झाँका।

प्लेटफॉर्म पर एक लड़की खड़ी थी।

सफेद कपड़े। बिखरे बाल। और आँखें —

बिल्कुल काली। जैसे वहाँ कुछ था ही नहीं।

वो सीधे मुझे देख रही थी।

मैंने पलक झपकाई —

वो गायब।

मैं काँपते हाथों से सामने वाले बुजुर्ग की तरफ मुड़ा।

“ये… ये स्टेशन कौन सा है?”

वो हँसा। धीमे से।

बोला —

“यहाँ नाम नहीं होते। बस लोग होते हैं… जो वापस नहीं जाते।”मेरे हाथ बर्फ हो गए।

मैं कुछ पूछना चाहता था — लेकिन उसने खिड़की की तरफ इशारा किया।

मैंने देखा —

अब प्लेटफॉर्म पर दर्जनों लोग खड़े थे।

सब चुप। सब स्थिर। सब — मुझे ही देख रहे थे।

अचानक ट्रेन चल पड़ी।

और जैसे ही वो स्टेशन पीछे छूटा —

सब गायब। एक पल में। जैसे कभी थे ही नहीं।

— ✦ —

मैंने फोन निकाला। कोई नेटवर्क नहीं।

स्क्रीन पर वक्त देखा —

2:59 AM

टिक… टिक… टिक…आवाज और तेज़ हो गई। जैसे मेरे सिर के अंदर से आ रही हो।

3:00 AM

और उसी पल —

बोगी के दरवाजे अपने आप खुल गए।

तेज़ हवा। ठंडी। चुभती हुई।

और उसके साथ — वो लड़की।

वही। सफेद कपड़े। काली आँखें।

वो अंदर आई। बिना आवाज़ के। जैसे हवा में तैर रही हो।

मेरे सामने आकर रुकी।

मैं हिल नहीं सकता था। बोल नहीं सकता था। साँस भी नहीं ले पा रहा था।

उसने धीरे से कहा —

“तुम्हारी सीट… मेरी थी।”मेरी आँखें फटी रह गईं।

“क… क्या मतलब?”

वो और पास आई। उसकी आँखें और गहरी। और अंधेरी।

“तुम उसकी जगह बैठे हो… जो यहाँ से कभी नहीं उतर पाया।”मैं चिल्लाना चाहता था। आवाज नहीं निकली।

तभी —

सामने वाला बुजुर्ग उठ खड़ा हुआ।

उसने लड़की की तरफ देखा। फिर मेरी तरफ।

और बोला —

“समय हो गया है।”सब कुछ घूमने लगा। रोशनियाँ। आवाज़ें। हवा। सब धुंधला। सब खत्म।

और फिर —

सन्नाटा।

— ✦ —

जब आँख खुली —

मैं प्लेटफॉर्म पर था।

सुबह हो चुकी थी। भीड़ थी। चाय की खुशबू थी। सब सामान्य था।

जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

मैंने एक आदमी को रोका।

“ट्रेन नंबर 666 — कब आएगी?”

वो मुझे घूरने लगा। फिर बोला —

“भाई, वो ट्रेन तो 10 साल पहले बंद हो गई। उसमें हादसा हुआ था। पूरी एक बोगी… गायब हो गई थी। आज तक नहीं मिली।”

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसकी।

काँपते हाथों से जेब में हाथ डाला।

और निकाला —

एक पुराना, जंग लगा, आधा गला हुआ टिकट।

TrainNo. 666
CoachS5
Seat27
Name[जो मेरा नहीं था]

मैंने अपनी कलाई देखी।

घड़ी अब चल रही थी।

लेकिन वक्त —

3:00 AM

पर अटकी हुई थी।

और तभी…

मेरे कान के एकदम पास — वही आवाज़।

“अब… तुम वापस नहीं जाओगे।”

Share This Article