चॉकलेट का जंगल

Team Maunam
Disclosure: This website may contain affiliate links, which means I may earn a commission if you click on the link and make a purchase. I only recommend products or services that I personally use and believe will add value to my readers. Your support is appreciated!

एक समय की बात है, एक बहुत ही शांत और सुंदर गाँव ‘नीलगिरी’ में दो भाई-बहन रहते थे – चिंटू और चिनकी। चिंटू आठ साल का था और चिनकी अभी छह साल की थी। उनके माता-पिता बहुत गरीब थे और गाँव में छोटी सी खेती करके अपना गुजारा करते थे। गाँव के बच्चे अक्सर शहर से आने वाली रंग-बिरंगी मिठाइयों और चॉकलेट्स की बातें करते थे, लेकिन चिंटू और चिनकी के लिए वे खुशियाँ किसी सपने जैसी थीं। चिंटू बहुत शरारती था, लेकिन उसका दिल सोने जैसा साफ था। चिनकी अपनी गुड़िया के साथ खेलती और हमेशा कल्पनाओं की दुनिया में खोई रहती।

एक रात, जब दोनों बच्चे अपने फटे हुए कंबल में सिमटे हुए थे, चिनकी ने धीरे से पूछा, ‘भैया, क्या सच में ऐसी कोई जगह है जहाँ पेड़ों पर चॉकलेट उगती है?’ चिंटू मुस्कुराया और बोला, ‘हाँ चिनकी, दादाजी कहते थे कि अगर कोई बच्चा सच्चे मन से पहाड़ के उस पार जाए, तो उसे चॉकलेट का एक गुप्त जंगल मिल सकता है।’ उस रात दोनों ने उसी जंगल का सपना देखा। अगले दिन सुबह होते ही, चिंटू और चिनकी ने तय किया कि वे उस जंगल की तलाश में निकलेंगे। उन्होंने अपने छोटे से थैले में कुछ रोटियाँ रखीं और गाँव की सीमा पार कर घने जंगलों की ओर चल दिए। चलते-चलते दोपहर हो गई। पक्षियों की चहचहाहट और बहते झरनों की आवाज़ के बीच, उन्हें एक अजीब सी खुशबू आने लगी। यह खुशबू ताजी पिघली हुई चॉकलेट और वेनिला जैसी थी। ‘भैया! देखो, वो क्या है?’ चिनकी ने चिल्लाते हुए एक बड़े बरगद के पेड़ की ओर इशारा किया।

वह पेड़ आम पेड़ों जैसा नहीं था। उसकी छाल गहरे कत्थई रंग की थी और वह बिल्कुल डार्क चॉकलेट जैसी लग रही थी। जैसे ही चिंटू ने उस पेड़ को छुआ, एक चमत्कार हुआ। पेड़ की जड़ों के बीच से एक सुनहरी रोशनी निकली और एक छोटा सा रास्ता खुल गया। दोनों भाई-बहन एक-दूसरे का हाथ थामकर अंदर चले गए। जैसे ही वे दूसरी ओर पहुँचे, उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उनके सामने एक अद्भुत दुनिया थी। यह ‘चॉकलेट का जंगल’ था। वहाँ की घास हरे रंग की नहीं, बल्कि पुदीने वाली चॉकलेट की पतली-पतली कतरनें थीं। सामने बहती नदी पानी की नहीं, बल्कि गाढ़ी दूधिया चॉकलेट की थी। चिनकी दौड़कर नदी के किनारे गई और उसने अपनी उँगली डाली। ‘भैया, यह तो सच में गरम कोको है!’ उसने खुशी से उछलते हुए कहा। पेड़ों पर आम और अमरूद नहीं, बल्कि किटकैट, डेयरी मिल्क और लॉलीपॉप लटके हुए थे।

चिंटू ने एक पेड़ से लाल रंग की टॉफी तोड़ी, जो बिल्कुल किसी हीरे की तरह चमक रही थी। जैसे ही उसने उसे चखा, उसे ऐसा लगा जैसे उसके मुँह में खुशियों का विस्फोट हो गया हो। वे जंगल के अंदर और गहरे चले गए। वहाँ के पत्थर मार्शमैलो के बने थे, जो इतने नरम थे कि उन पर पैर रखते ही पैर धँस जाते थे। तभी उन्हें एक छोटी सी आवाज सुनाई दी, ‘रुको! तुम यहाँ क्या कर रहे हो?’ उन्होंने मुड़कर देखा तो एक छोटा सा खरगोश खड़ा था।

लेकिन वह साधारण खरगोश नहीं था, वह सफेद चॉकलेट का बना हुआ था और उसकी आँखें नीली जेम्स की थीं। ‘मेरा नाम ‘कोको’ है,’ खरगोश ने कहा। ‘तुम इंसानी बच्चे यहाँ कैसे आए?’ चिंटू ने डरते हुए पूरी बात बताई। कोको मुस्कुराया और बोला, ‘यह जंगल केवल उन बच्चों को दिखता है जो लालची नहीं होते। लेकिन सावधान रहना, यहाँ एक ‘शुगर विच’ (शक्कर वाली चुड़ैल) भी रहती है, जो बच्चों को अपनी मीठी बातों में फँसाकर उन्हें खुद चॉकलेट का पुतला बना देती है।’ चिनकी थोड़ा डर गई, लेकिन चिंटू ने उसका हाथ पकड़कर उसे ढांढस बँधाया। कोको उन्हें जंगल के सबसे सुंदर हिस्से ‘कैंडी केन पर्वत’ की ओर ले गया। रास्ते में उन्होंने देखा कि वहाँ के फूल वेनिला क्रीम के बने थे और उन पर उड़ने वाली तितलियाँ रंगीन वेफर्स की थीं। सब कुछ इतना सुंदर और स्वादिष्ट था कि चिंटू और चिनकी का मन कर रहा था कि वे वहीं बस जाएँ। लेकिन तभी आसमान अचानक गहरा काला हो गया।

खुशबू की जगह एक कड़वी सी गंध आने लगी। ‘भागो! शुगर विच आ रही है!’ कोको चिल्लाया। एक बड़ी सी काली परछाईं उनके ऊपर मंडराने लगी। वह चुड़ैल पूरी तरह से जली हुई चीनी (कैरामेल) की बनी थी और उसकी उँगलियाँ कड़वी कोको बीन्स जैसी लंबी थीं। ‘आह! ताजे बच्चे! बहुत दिनों बाद मुझे मेरे महल के लिए नए खिलौने मिलेंगे,’ वह जोर से हंसी। उसने अपनी छड़ी घुमाई और चिनकी के चारों ओर एक जेली का घेरा बना दिया। चिनकी उसमें फंस गई और रोने लगी। चिंटू घबरा गया, लेकिन उसे याद आया कि दादाजी कहते थे कि अच्छाई हमेशा बुराई को हराती है। उसने देखा कि चुड़ैल को कड़वी कोको की गंध पसंद है, लेकिन उसे सादे पानी और नमक से डर लगता है। सौभाग्य से, चिंटू के थैले में गाँव के कुएँ का थोड़ा सा पानी और सूखी रोटियों के साथ थोड़ा सा नमक बचा था।

जैसे ही चुड़ैल चिनकी की ओर बढ़ी, चिंटू ने फुर्ती से नमक वाला पानी उस पर छिड़क दिया। चुड़ैल चिल्लाने लगी, क्योंकि नमक उसके चीनी के शरीर को गलाने लगा था। ‘नहीं! यह क्या किया तुमने!’ वह धीरे-धीरे पिघलने लगी और देखते ही देखते एक काले गुड़ के ढेर में बदल गई। चिनकी आजाद हो गई। पूरे जंगल में फिर से सुनहरी रोशनी छा गई। तभी वहाँ एक सुंदर परी प्रकट हुई, जिसका नाम ‘मिश्री’ था। वह इस जंगल की रक्षक थी। उसने कहा, ‘चिंटू, तुमने अपनी बहादुरी और सूझबूझ से न केवल अपनी बहन को बचाया, बल्कि इस जंगल को भी उस दुष्ट चुड़ैल से मुक्त कर दिया। माँगों, तुम्हें क्या चाहिए?’ चिंटू और चिनकी ने एक-दूसरे की ओर देखा। वे चाहते तो ढेर सारी चॉकलेट माँग सकते थे, लेकिन चिंटू ने कहा, ‘परी माँ, हमारे गाँव में बहुत गरीबी है। क्या आप हमें कुछ ऐसा दे सकती हैं जिससे हमारे गाँव के लोगों का भला हो सके?’ परी चिंटू की निस्वार्थ भावना से बहुत प्रसन्न हुई। उसने उन्हें एक जादुई थैला दिया और कहा, ‘इस थैले में कभी न खत्म होने वाले चॉकलेट के बीज हैं।

इन्हें अपने गाँव की मिट्टी में बो देना। इनसे जो पेड़ उगेंगे, वे न केवल चॉकलेट देंगे, बल्कि आपकी जमीन को भी उपजाऊ बना देंगे।’ बच्चों ने परी को धन्यवाद दिया और कोको खरगोश को विदा कहकर वापस अपने गाँव की ओर चल दिए। जब वे गाँव पहुँचे, तो किसी को उनकी बातों पर यकीन नहीं हुआ। लेकिन जैसे ही उन्होंने वे बीज बोए, रातों-रात वहाँ जादुई पेड़ उग आए। अब नीलगिरी गाँव कभी गरीब नहीं रहा। वहाँ के बच्चे अब कभी भूखे नहीं सोते थे। चिंटू और चिनकी बड़े होकर भी उस चॉकलेट के जंगल की कहानी सबको सुनाते रहे, और यह याद दिलाते रहे कि सबसे बड़ी मिठास चॉकलेट में नहीं, बल्कि दूसरों की मदद करने और निस्वार्थ रहने में होती है। और इस तरह, चॉकलेट के उस जंगल ने एक पूरे गाँव की तकदीर बदल दी।

Share This Article