छत्रपति शिवाजी महाराज और अफजल खान का वध

Team Maunam
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— एक ऐसी मुलाकात जिसने इतिहास बदल दिया —


“वह छोटा था कद में, लेकिन पहाड़ था इरादे में। अफजल खान आया था शिकार करने — शिकार हो गया खुद।”


प्रस्तावना: एक मुलाकात जो दो दुनियाओं की टक्कर थी

सन् १६५९।

भारत की धरती पर एक ऐसी घटना घटने वाली थी जो सदियों तक याद रही।

एक तरफ था — अफजल खान। बीजापुर सल्तनत का सबसे खूँखार सेनापति। सात फुट लंबा। तीन सौ पाउंड वजन। जिसने अपने जीवन में अनेक राजाओं को मार डाला था। जिसके नाम से पूरा दक्कन काँपता था।

दूसरी तरफ था — शिवाजी महाराज। एक युवा मराठा योद्धा। पाँच फुट पाँच इंच। पतला, चुस्त, चालाक। जिसके पास न बड़ी सेना थी, न बड़ा खजाना था। लेकिन जिसके पास था — एक दृष्टि, एक साहस, और एक ऐसी बुद्धि जो अफजल खान जैसे दानव को भी मात दे सकती थी।

उनकी मुलाकात हुई — १० नवंबर, १६५९ — प्रतापगढ़ की पहाड़ियों में।

और उस मुलाकात में जो हुआ, वह इतिहास बन गया।

यह सिर्फ दो इंसानों की लड़ाई नहीं थी।

यह एक विचारधारा की जीत थी।

यह स्वराज्य की जीत थी।

आइए — उस पूरी कहानी में चलते हैं। शुरू से।


भाग एक: शिवाजी — एक सपने का जन्म

अध्याय १: जीजाबाई की गोद और एक बच्चे का संकल्प

सन् १६३०। शिवनेरी किला। पुणे के पास।

एक बच्चे का जन्म हुआ।

माँ का नाम था — जीजाबाई। एक ऐसी माँ जो खुद एक योद्धा थी — दिल से, विचार से, संस्कार से।

पिता थे — शाहजी भोंसले। मराठा सरदार, जो बीजापुर सल्तनत की सेवा में थे।

बच्चे का नाम रखा गया — शिवाजी।

जीजाबाई ने अपने बेटे को रामायण और महाभारत की कहानियाँ सुनाईं। राम के आदर्श, भीम का बल, अर्जुन की कुशलता, कृष्ण की चातुरी — ये सब जीजाबाई ने शिवाजी के मन में बो दिए।

लेकिन जीजाबाई ने एक बात और सिखाई।

एक दिन छोटे शिवाजी ने पूछा, “आई, हमारा राज्य कहाँ है?”

जीजाबाई ने कहा, “बेटा, अभी नहीं है। लेकिन होगा।”

“कैसे होगा?”

जीजाबाई ने शिवाजी की आँखों में देखा और कहा, “जब मेरा शिवा बड़ा होगा।”

उस दिन का वह बच्चा — बड़ा होकर — छत्रपति शिवाजी महाराज बना।

और जीजाबाई का सपना सच हुआ।


अध्याय २: तोरणा से स्वराज्य तक — पहले कदम

शिवाजी सोलह वर्ष के थे।

उन्होंने तोरणा किला जीता।

यह उनका पहला किला था। और यहीं से शुरू हुआ — स्वराज्य का सपना।

लेकिन यह आसान नहीं था।

चारों तरफ दुश्मन थे।

उत्तर में — मुगल साम्राज्य। दक्षिण-पश्चिम में — बीजापुर सल्तनत। पश्चिम में — समुद्र। पूर्व में — निजाम।

शिवाजी के पास था — अरावली नहीं, बल्कि सह्याद्री। पश्चिमी घाट की वे पहाड़ियाँ जो उनका घर थीं, उनकी सेना थीं, उनकी ताकत थीं।

एक के बाद एक किले जीतते गए शिवाजी।

रायगढ़। राजगढ़। पुरंदर। प्रतापगढ़।

और जब भी कोई किला जीतते, वहाँ स्वराज्य का ध्वज लहराते।

लेकिन बीजापुर सल्तनत यह सब चुपचाप नहीं देख सकती थी।


अध्याय ३: बीजापुर की बेचैनी

आदिलशाही सल्तनत — बीजापुर।

सुल्तान अली आदिलशाह द्वितीय।

वह परेशान था।

उसका एक-एक किला, एक-एक इलाका शिवाजी जीतता जा रहा था।

उसके दरबार में बड़ी-बड़ी बैठकें हुईं।

“इस मराठे को रोको,” सुल्तान ने आदेश दिया।

पहले भेजा गया — मुसे खान। शिवाजी ने उसे हरा दिया।

फिर भेजा गया — रुस्तम जमाँ। वह भी विफल।

फिर भेजा गया — फजल खान। वह भी वापस आया — खाली हाथ।

सुल्तान का धैर्य टूट गया।

उसने दरबार में घोषणा की:

“मुझे ऐसा सेनापति चाहिए जो शिवाजी को जड़ से उखाड़ दे। जो उसे मारे। जो उसका नामोनिशान मिटा दे।”

दरबार में एक आदमी उठ खड़ा हुआ।

भारी भरकम। ऊँचा। उसके उठने से ही जमीन काँपती लगी।

“जहाँपनाह,” उसने कहा, “मुझे भेजिए।”

यह था — अफजल खान।


भाग दो: अफजल खान — एक राक्षस का परिचय

अध्याय ४: अफजल खान — कौन था यह दानव?

अफजल खान।

यह नाम सुनते ही दक्कन में लोग थर्रा जाते थे।

वह बीजापुर का सबसे भरोसेमंद और सबसे क्रूर सेनापति था।

कद: लगभग सात फुट। वजन: तीन सौ पाउंड से ज्यादा। ताकत: कहा जाता था वह एक हाथ से हाथी को धक्का दे सकता था।

लेकिन उसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी क्रूरता थी।

उसने अपने जीवन में कितने राजाओं को मारा — गिनती नहीं।

उसकी एक आदत थी — जब वह किसी को “आलिंगन” करने के बहाने बुलाता, तो उस व्यक्ति को जिंदा नहीं छोड़ता। वह अपनी बाँहों में इतनी ताकत से दबाता कि हड्डियाँ चटख जातीं।

और एक बात और।

उसकी ख्याति थी — उसने एक बार किसी राजा को मारने के बाद उसका सिर काटकर बीजापुर भेजा था — उपहार के रूप में।

यह इंसान नहीं था।

यह एक राक्षस था।

और इसी राक्षस को सुल्तान ने शिवाजी के पास भेजा।


अध्याय ५: अफजल खान की क्रूरता — वह पाप जो उसे ले डूबा

अफजल खान ने बीजापुर से निकलने से पहले एक काम किया जो उसकी क्रूरता की पराकाष्ठा थी।

उसकी कई पत्नियाँ थीं — साठ से भी ज्यादा।

उसने तय किया — अगर वह शिवाजी से लड़ने गया और मारा गया, तो उसकी मृत्यु के बाद उसकी पत्नियाँ किसी और के पास जाएँगी। यह उसे मंजूर नहीं था।

और इसलिए उसने एक ऐसा काम किया जो इंसानियत की सीमा से परे था।

उसने अपनी अधिकांश पत्नियों को —

मार डाला।

हत्या। ठंडे खून में।

और उन्हें बीजापुर के बाहर एक कुएँ में दफना दिया।

वह कुआँ आज भी मौजूद है — सत्ती का कुआँ के नाम से।

यह सुनकर जीजाबाई ने कहा था — “जो इतनी बेकसूर औरतों का खून करता है, उसका खून जरूर एक दिन इसी धरती पर बहेगा।”

और जीजाबाई गलत नहीं थीं।


अध्याय ६: अफजल खान का मार्च — भय का जुलूस

अफजल खान ने बीजापुर से कूच किया।

उसके साथ थी — एक विशाल सेना।

दस हजार से अधिक घुड़सवार। हाथी। तोपखाना। और ऐसे सैनिक जो पूरे दक्कन में अपनी बर्बरता के लिए जाने जाते थे।

लेकिन अफजल खान सिर्फ सैनिक ताकत से नहीं आया।

वह मनोवैज्ञानिक दबाव भी लाया।

रास्ते में जो भी हिंदू मंदिर मिले — उसने तोड़े।

तुलजापुर का भवानी मंदिर — जो शिवाजी की कुलदेवी थीं — उसे तोड़ा।

पंढरपुर का विट्ठल मंदिर — उसे नुकसान पहुँचाया।

क्यों?

ताकि शिवाजी क्रोध में आकर गलती करें। ताकि मराठा जनता डरे। ताकि शिवाजी पर मनोवैज्ञानिक दबाव पड़े।

यह अफजल खान की चाल थी।

और शिवाजी ने यह खबर सुनी।

उनके सरदार क्रोध में थे।

“महाराज, अभी निकलिए! इस राक्षस को सबक सिखाइए!”

लेकिन शिवाजी ने ठंडे दिमाग से कहा:

“रुको। क्रोध में लड़ाई नहीं होती। लड़ाई बुद्धि से होती है।”

और वे सोचने बैठ गए।


भाग तीन: शिवाजी की बुद्धि — एक जाल बुना जाता है

अध्याय ७: प्रतापगढ़ — वह किला जो चुना गया

शिवाजी ने अपने सरदारों को बुलाया।

“अफजल खान कहाँ है?”

“महाराज, वह वाई तक पहुँच गया है।”

“उसकी सेना कितनी है?”

“कम से कम दस हजार।”

शिवाजी ने नक्शा देखा।

उन्होंने प्रतापगढ़ की तरफ देखा।

प्रतापगढ़ — सह्याद्री की पहाड़ियों पर बना एक किला। चारों तरफ घने जंगल। संकरे रास्ते। ऊँची-ऊँची चट्टानें।

“हम यहाँ लड़ेंगे,” शिवाजी ने कहा।

“महाराज, लेकिन अफजल खान आएगा क्यों? वह तो खुले मैदान में लड़ना चाहेगा — जहाँ उसकी सेना की संख्या काम आए।”

शिवाजी मुस्कुराए।

“इसीलिए हमें उसे यहाँ बुलाना होगा। और उसके लिए — हमें कुछ ऐसा करना होगा जो उसे लगे कि हम डरे हुए हैं।”

सरदार समझ नहीं पाए।

लेकिन शिवाजी की योजना बन रही थी — धीरे-धीरे, सावधानी से, एक-एक धागे को बुनते हुए।


अध्याय ८: डर का नाटक — वह चाल जिसने अफजल को फँसाया

शिवाजी ने एक काम किया जो उनके सरदारों को हैरान कर गया।

उन्होंने अफजल खान को संदेश भेजा।

संदेश में लिखा था (भावार्थ):

“आप जैसे महान सेनापति से मिलकर बड़ा सम्मान होगा। मैं आपसे व्यक्तिगत रूप से मिलना चाहता हूँ। मुझे बीजापुर की सेवा करने में खुशी होगी। कृपया एक बैठक का आयोजन करें।”

अफजल खान ने यह संदेश पढ़ा।

और वह हँसा।

“देखो! यह पहाड़ी चूहा डर गया! भाग नहीं सकता तो सरेंडर करना चाहता है!”

अफजल खान को जो चाहिए था, वह मिल रहा था — शिवाजी सामने आ रहे थे।

यही तो शिवाजी चाहते थे।

अफजल खान ने जवाब भेजा — “ठीक है। मिलते हैं। जावली की घाटी में। एक-एक सरदार के साथ।”

शिवाजी ने स्थान बदला।

“नहीं। मुलाकात प्रतापगढ़ के पास होगी।”

अफजल खान ने सोचा — प्रतापगढ़ पहाड़ पर है। शिवाजी वहाँ छिपना चाहता है। लेकिन अगर मैं खुद जाऊँगा और उसे पकड़ लूँगा, तो सुल्तान को क्या तोहफा दूँगा!

वह मान गया।

जाल बिछ गया था।

लेकिन किसका जाल?

यही तो रहस्य था।


अध्याय ९: जीजाबाई की चेतावनी और माँ भवानी का आशीर्वाद

मुलाकात से पहले शिवाजी अपनी माँ जीजाबाई के पास गए।

जीजाबाई वृद्ध हो चली थीं। लेकिन उनकी आँखें उतनी ही तेज थीं।

“शिवा,” उन्होंने कहा, “तू जानता है यह मुलाकात खतरनाक है?”

“जानता हूँ, आई।”

“अफजल खान ने अनेक राजाओं को इसी तरह — मिलने के बहाने — मार डाला है।”

“जानता हूँ।”

“तो फिर क्यों जा रहा है?”

शिवाजी ने अपनी माँ की आँखों में देखा।

“आई, अगर मैं नहीं गया, तो वह इन पहाड़ियों को जलाएगा। हमारे लोगों को मारेगा। मंदिरों को तोड़ेगा। इस राक्षस का अंत यहीं होना चाहिए।”

जीजाबाई की आँखें भर आईं।

“सावधान रहना।”

“रहूँगा।”

उसके बाद शिवाजी तुलजापुर गए — माँ भवानी के मंदिर में।

(यही वह मंदिर था जिसे अफजल खान ने नुकसान पहुँचाया था।)

शिवाजी ने घुटने टेके।

“माँ भवानी, तुम्हारे मंदिर को तोड़ने वाला आ रहा है। उसका न्याय करो।”

और एक किंवदंती है — कि उस रात माँ भवानी ने शिवाजी को सपने में दर्शन दिए और कहा: “डरो मत। मैं तुम्हारे साथ हूँ।”

सच हो या किंवदंती — लेकिन उस रात के बाद शिवाजी में एक अलग आत्मविश्वास आ गया।


अध्याय १०: हथियार की तैयारी — बाघनख और कट्यार

शिवाजी ने अपनी योजना अपने सबसे विश्वासपात्र सरदारों को बताई।

नेताजी पालकर। कान्होजी जेधे। येसाजी कंक। जीवा महाला।

और उन्होंने जो योजना बताई — वह सुनकर सब स्तब्ध रह गए।

“महाराज, यह बहुत खतरनाक है।”

“हाँ। लेकिन और कोई रास्ता नहीं।”

शिवाजी ने अपने हाथ में एक विशेष हथियार लिया।

बाघनख।

यह एक ऐसा हथियार था जो उँगलियों में पहना जाता था — ठीक बाघ के पंजे की तरह। चार धारदार नोकें। बंद मुट्ठी में छिपा जाता था।

और दूसरा हथियार — कट्यार। एक छोटा, तेज खंजर।

दोनों हथियार कपड़ों के नीचे छिपाए जा सकते थे।

“जब अफजल खान मुझे गले लगाने आएगा,” शिवाजी ने कहा, “तब मैं इनका उपयोग करूँगा।”

जीवा महाला — शिवाजी के निजी अंगरक्षक — ने कहा:

“महाराज, मैं आपके पास रहूँगा। जो भी होगा, मैं संभाल लूँगा।”

यह वादा जीवा महाला ने किया।

और इस वादे ने इतिहास में अपना नाम लिखवाया।


अध्याय ११: दोनों तरफ की तैयारी — एक ही समय, दो षड्यंत्र

यहाँ एक रोचक बात है।

जब शिवाजी अपनी योजना बना रहे थे — उसी समय अफजल खान भी अपनी योजना बना रहा था।

अफजल खान ने अपने खास आदमी कृष्णाजी भास्कर को — जो उसका दूत था और खुद एक हिंदू ब्राह्मण था — शिवाजी के पास भेजा।

कृष्णाजी भास्कर एक दोहरा खेल खेल रहा था।

वह देखना चाहता था कि शिवाजी की योजना क्या है।

लेकिन शिवाजी के पास भी अपना गुप्तचर नेटवर्क था — बहिर्जी नाईक के नेतृत्व में।

बहिर्जी नाईक — शिवाजी के सबसे महान जासूस।

बहिर्जी ने शिवाजी को खबर दी — “महाराज, कृष्णाजी भास्कर दोहरा खेल खेल रहा है।”

शिवाजी ने मुस्कुराते हुए कहा, “ठीक है। हम भी दोहरा खेल खेलेंगे।”

उन्होंने कृष्णाजी भास्कर को बुलाया।

और उसे इतना सम्मान दिया, इतना प्यार दिया, इतनी मिठाई खिलाई — कि कृष्णाजी भास्कर का दिल बदल गया।

वह अफजल खान का नहीं रहा।

वह शिवाजी का हो गया।


भाग चार: वह दिन — १० नवंबर १६५९

अध्याय १२: प्रभात — दो योद्धाओं की आखिरी सुबह

१० नवंबर, १६५९।

प्रतापगढ़ की पहाड़ियाँ।

सुबह का धुंध।

पश्चिमी घाट में नवंबर की सुबह ठंडी होती है। घने जंगल। कोहरा। और एक अजीब सन्नाटा।

लेकिन उस सन्नाटे में — दो सेनाएँ थीं।

एक तरफ — अफजल खान का शिविर। पहाड़ के नीचे। दस हजार सैनिक।

दूसरी तरफ — शिवाजी की सेना। पहाड़ के ऊपर और जंगल में। संख्या में कम, लेकिन तैनात। हर पेड़ के पीछे एक मावला सैनिक।

मावला — शिवाजी के सैनिक। सह्याद्री के जंगलों में पले-बढ़े। हर पत्थर, हर पगडंडी उनकी जानी-पहचानी थी।

मुलाकात का स्थान तय हुआ — पहाड़ के नीचे, एक मैदान में। एक तंबू लगाया गया। तय हुआ — दोनों पक्ष से केवल एक-एक आदमी आएगा।

अफजल खान ने अपने आदमियों से कहा, “मैं जाता हूँ। जब मैं इस मराठे को पकड़ूँगा, तब तुम्हें संकेत मिलेगा।”

उधर शिवाजी ने अपने सरदारों से कहा, “मैं जाता हूँ। जो भी हो — घाटी खाली मत करो।”


अध्याय १३: तंबू की तरफ — दो अलग चालें

अफजल खान चला।

उसके साथ था — सैयद बंडा। एक खास अंगरक्षक, जिसे तलवार चलाने में महारत थी।

शिवाजी चले।

उनके साथ था — जीवा महाला। छोटे कद का, लेकिन ताँबे जैसे कसे हुए बदन वाला। उसके हाथ में एक लंबा भाला था।

दोनों तरफ से चलते-चलते वे पास आए।

अफजल खान ने शिवाजी को देखा।

और उसके मन में क्या आया?

शायद हँसी।

यह छोटा सा आदमी — जिसकी इतनी चर्चा है — यही है? इसे तो एक हाथ से उठाकर फेंक दूँगा।

लेकिन शिवाजी की आँखें देखीं होतीं — तो शायद वह डर जाता।

उन आँखों में थी — एकाग्रता। शांति। और एक ऐसा निर्धारण जो पहाड़ भी नहीं तोड़ सकते।


अध्याय १४: तंबू के भीतर — वह क्षण जो अनंत काल तक याद रहा

दोनों मिले।

तंबू के भीतर।

अफजल खान ने बड़ी गर्मजोशी दिखाई।

“आओ शिवाजी! तुम्हारा स्वागत है! मैं बहुत खुश हूँ कि तुमने समझदारी दिखाई।”

शिवाजी ने विनम्रता से झुककर नमस्कार किया।

“खान साहब, आपसे मिलकर सम्मान हुआ।”

बातें हुईं।

लेकिन दोनों के मन में बातें नहीं, योजनाएँ चल रही थीं।

अफजल खान सोच रहा था — “कब गले लगाऊँ? कब इसकी हड्डियाँ तोड़ूँ?”

शिवाजी सोच रहे थे — “कब वह करीब आए? कब मैं बाघनख का उपयोग करूँ?”

फिर अफजल खान उठा।

“शिवाजी, आओ — गले मिलो। दोस्ती करते हैं।”

और उसने अपनी विशाल बाँहें फैलाईं।

शिवाजी आगे बढ़े।

यह वह क्षण था।


अध्याय १५: बाघनख — वह एक पल जिसने इतिहास बदला

अफजल खान ने शिवाजी को अपनी बाँहों में लिया।

और फिर उसने वही किया जो वह हमेशा करता था —

दबाया।

पूरी ताकत से।

शिवाजी छोटे थे, पतले थे।

अफजल खान को लगा — बस, यह हो गया।

लेकिन…

शिवाजी ने भी एक काम किया।

अपनी बंद मुट्ठी — जिसमें बाघनख थे — उन्होंने अफजल खान के पेट में घुसा दिए।

चार धारदार नोकें।

एक झटके में।

अफजल खान की चीख निकली।

“आह!”

वह पीछे हटा।

शिवाजी ने दूसरे हाथ से कट्यार निकाली।

और एक और वार।

अफजल खान — वह राक्षस जो अजेय लगता था — घायल था।

लेकिन वह मरा नहीं था।

वह इतना ताकतवर था कि घायल होने पर भी उसने अपनी तलवार निकाल ली।

और शिवाजी पर वार किया।


अध्याय १६: जीवा महाला — वह वादा जो निभाया गया

अफजल खान की तलवार शिवाजी की तरफ आई।

लेकिन —

जीवा महाला आगे आ गए।

उन्होंने अपने भाले से अफजल खान की तलवार को रोका।

और फिर उन्होंने एक ऐसा काम किया जो इतिहास में दर्ज हो गया।

उन्होंने अफजल खान पर ऐसा वार किया कि वह जमीन पर गिर गया।

तंबू के बाहर खड़े सैयद बंडा ने यह देखा।

वह अंदर दौड़ा — तलवार लेकर।

लेकिन बाहर खड़े येसाजी कंक — शिवाजी के एक और सरदार — ने उसे रोका।

उन दोनों में भी भयंकर लड़ाई हुई।

सैयद बंडा ताकतवर था। येसाजी भी कम नहीं थे।

और अंत में — सैयद बंडा मारा गया।


अध्याय १७: अफजल खान का अंत

अफजल खान — घायल, खून से लथपथ — तंबू से बाहर निकला।

वह चिल्लाया:

“बचाओ! बचाओ!”

उसके सैनिक दौड़े।

लेकिन —

पहाड़ियों से एक आवाज आई।

“हर हर महादेव!”

और शिवाजी की सेना — मावले, पहाड़ के जंगलों से — टूट पड़ी।

अफजल खान के सैनिकों पर एक साथ।

अफजल खान कुछ दूर तक गया।

उसके बाद — एक मावला सैनिक ने उसका काम तमाम कर दिया।

और अफजल खान — बीजापुर का सबसे भयानक सेनापति — प्रतापगढ़ की मिट्टी में गिर गया।

हमेशा के लिए।


अध्याय १८: युद्ध का तूफान — प्रतापगढ़ की घाटी में कयामत

अफजल खान की मौत के बाद —

सब कुछ एक साथ हुआ।

शिवाजी ने संकेत दिया।

पहाड़ियों पर तैनात मावला सैनिकों ने धावा बोला।

दस हजार की मुगल-बीजापुरी सेना पर — एक अप्रत्याशित, भयानक हमला।

घाटी में अफरा-तफरी मच गई।

मुगल सैनिकों को समझ ही नहीं आया — आक्रमण कहाँ से हो रहा है।

हर तरफ से मावले आ रहे थे।

पेड़ों से। पत्थरों से। घाटी की दीवारों से।

यह कोई आमने-सामने की लड़ाई नहीं थी।

यह छापामार युद्ध था — जो शिवाजी का सबसे बड़ा हथियार था।

बीजापुरी सेना भागने लगी।

नेताजी पालकर — शिवाजी के घुड़सवार सेनापति — ने भागती हुई सेना का पीछा किया।

मीलों तक।

जो भागे वे भी नहीं बचे।

उस दिन बीजापुरी सेना का एक बड़ा हिस्सा —

नष्ट हो गया।


भाग पाँच: उसके बाद — एक जीत की गूँज

अध्याय १९: प्रतापगढ़ पर विजय-ध्वज

जब सूरज ढला —

प्रतापगढ़ के किले पर स्वराज्य का ध्वज लहरा रहा था।

शिवाजी उस किले की प्राचीर पर खड़े थे।

नीचे — पहाड़ियों में वह मैदान था जहाँ कुछ घंटे पहले अफजल खान मरा था।

शिवाजी ने एक लंबी साँस ली।

उनके सरदार आए। एक-एक करके।

“महाराज की जय!” “छत्रपति शिवाजी महाराज की जय!” “हर हर महादेव!”

वह जयकार पहाड़ियों में गूँजी।

जंगलों में गूँजी।

और दूर-दूर तक पहुँची।


अध्याय २०: जीजाबाई को खबर — एक माँ की खुशी

खबर जीजाबाई तक पहुँची।

“माँ साहेब! महाराज जीत गए! अफजल खान मारा गया!”

जीजाबाई की आँखें भर आईं।

उन्होंने एकलिंग… नहीं — उन्होंने माँ भवानी की मूर्ति के सामने हाथ जोड़े।

“माँ, तुमने सुना। तुमने मेरे शिवा की रक्षा की।”

और उन्होंने एक संकल्प लिया — तुलजापुर मंदिर का जीर्णोद्धार होगा। जिसे अफजल खान ने नुकसान पहुँचाया था, उसे फिर से बनाया जाएगा।

और वह हुआ।


अध्याय २१: बीजापुर में सन्नाटा

बीजापुर के सुल्तान को जब खबर मिली —

दरबार में सन्नाटा छा गया।

अफजल खान — जो अजेय था, जो भयानक था, जिसने कभी हार नहीं मानी — वह मारा गया?

एक छोटे से मराठे ने?

“यह कैसे हुआ?” सुल्तान ने पूछा।

कोई जवाब नहीं दे सका।

क्योंकि जवाब एक ही था — शिवाजी महाराज।


अध्याय २२: इतिहास की सबसे बड़ी रणनीति

अफजल खान की मृत्यु सिर्फ एक लड़ाई की जीत नहीं थी।

यह मनोवैज्ञानिक क्रांति थी।

इस एक घटना ने पूरे दक्कन को बता दिया:

शिवाजी हराए नहीं जा सकते।

जब दक्कन की जनता ने सुना — एक छोटे से मराठे ने अफजल खान को मार डाला — तो उनमें एक नई ऊर्जा आई।

हजारों युवा शिवाजी की सेना में भर्ती होने आए।

गाँव-गाँव से।

मावले, कोली, भील, कुनबी — सब।

यह जीत स्वराज्य की नींव बन गई।


भाग छः: पूरी कहानी के अनसुने पहलू

अध्याय २३: बहिर्जी नाईक — वह जासूस जिसे कोई नहीं जानता

इस पूरी कहानी में एक नाम है जो बहुत कम सुना जाता है।

बहिर्जी नाईक।

शिवाजी के मुख्य गुप्तचर।

जिन्होंने अफजल खान की पूरी योजना शिवाजी को पहले ही बता दी थी।

बहिर्जी नाईक — एक साधारण दिखने वाला आदमी। कभी साधु के वेश में, कभी व्यापारी के, कभी जोगी के।

वे अफजल खान के शिविर में घुसे।

उन्होंने वहाँ के सिपाहियों से बातें कीं।

उन्होंने अफजल खान की योजना सुनी — कि वह शिवाजी को गले लगाकर मारेगा।

और उन्होंने यह खबर शिवाजी तक पहुँचाई।

इसीलिए शिवाजी तैयार थे।

बहिर्जी नाईक के बिना — शायद इतिहास कुछ और होता।


अध्याय २४: अफजल खान के बेटे — बदला जो कभी नहीं लिया गया

अफजल खान के बेटे थे।

उन्हें पता चला कि उनके पिता मारे गए।

वे बदला लेने की बात करते थे।

लेकिन शिवाजी की बढ़ती शक्ति के सामने कोई कुछ नहीं कर सका।

और एक रोचक बात —

शिवाजी ने अफजल खान के मारे गए सैनिकों को उचित सम्मान से दफनाने दिया।

उन्होंने कहा, “दुश्मन के सैनिक भी इंसान हैं।”

यह था शिवाजी का चरित्र।

वे एक महान योद्धा थे। लेकिन क्रूर नहीं।


अध्याय २५: शिवाजी की सेना — वे अनसुने नायक

प्रतापगढ़ की लड़ाई में अनेक नायक थे जिनके नाम इतिहास ने भुला दिए।

येसाजी कंक — जिन्होंने सैयद बंडा को रोका और उसे मार डाला।

नेताजी पालकर — जिन्होंने भागती बीजापुरी सेना का पीछा किया और भारी नुकसान पहुँचाया।

कान्होजी जेधे — जो घाटी की रक्षा में थे।

तानाजी मालुसरे — जो इस लड़ाई में थे और बाद में सिंहगढ़ की लड़ाई में अमर हुए।

और हजारों अनाम मावला सैनिक — जिनके नाम कहीं नहीं लिखे, लेकिन जिनकी वीरता ने यह जीत दिलाई।


अध्याय २६: एक रहस्य — अफजल खान की कब्र

प्रतापगढ़ के पास — आज भी अफजल खान की कब्र है।

यह एक ऐतिहासिक तथ्य है।

शिवाजी ने अफजल खान को वहीं दफनाया। उसकी कब्र बनाई।

क्यों?

क्योंकि शिवाजी क्रूर नहीं थे।

वे धर्म के नाम पर लड़ते थे — लेकिन किसी धर्म के विरुद्ध नहीं।

वे स्वराज्य के लिए लड़ते थे।

और स्वराज्य में सबके लिए जगह थी।

आज भी वह कब्र वहाँ है।

और हर साल लाखों लोग प्रतापगढ़ जाते हैं — उस जगह को देखने जहाँ इतिहास बना था।


भाग सात: शिवाजी का चरित्र — वह जो इतिहास में अमर है

अध्याय २७: स्त्री सम्मान — शिवाजी की अनोखी नीति

एक बात जो शिवाजी को बाकी सब से अलग बनाती थी।

स्त्री सम्मान।

उस युग में जब युद्ध में जीती गई औरतों को गुलाम बनाना सामान्य था —

शिवाजी ने एक कड़ा नियम बनाया:

“मेरी सेना में कोई भी स्त्री का अपमान नहीं करेगा।”

एक बार एक सरदार ने एक खूबसूरत मुस्लिम औरत को शिवाजी के पास “उपहार” में भेजा।

शिवाजी ने उस औरत को देखा।

फिर उस सरदार को बुलाया।

“यह क्या है?”

“महाराज, यह जीती हुई…”

“वापस ले जाओ। और इसे इसके घर पहुँचाओ। अगर मेरी सेना में कोई भी किसी स्त्री को इस तरह लाया, तो उसे कड़ी सजा मिलेगी।”

यह था शिवाजी का चरित्र।


अध्याय २८: धर्म निरपेक्षता — एक मध्यकालीन राजा का आधुनिक विचार

शिवाजी हिंदू थे। गहरे धार्मिक थे।

लेकिन उन्होंने कभी किसी दूसरे धर्म का अपमान नहीं किया।

उनकी सेना में मुसलमान थे। उनके दरबार में मुसलमान सरदार थे। उनके नौसेना में मुसलमान नाविक थे।

इब्राहिम खान — उनके एक प्रमुख नौसेना अधिकारी। दौलत खान — उनके एक महत्वपूर्ण सरदार। सिद्दी इब्राहिम — उनकी सेना में।

जब भी कोई मस्जिद या कुरान उनके नियंत्रण में आती — शिवाजी उसकी रक्षा करते।

उन्होंने एक बार अपने सरदार को फटकारा था जब उसने एक मस्जिद को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की।

“मेरे राज्य में सब धर्म बराबर हैं।”

यह था शिवाजी का स्वराज्य।


अध्याय २९: अफजल खान से पहले — वे लड़ाइयाँ जिन्होंने शिवाजी को बनाया

अफजल खान की घटना समझने के लिए यह जानना जरूरी है —

शिवाजी यहाँ तक कैसे पहुँचे?

तोरणा — पहला किला। शिवाजी सोलह साल के थे।

राजगढ़ — दूसरा किला। बिना लड़ाई के जीता — कूटनीति से।

चाकण — एक कठिन लड़ाई।

कोंढाणा (सिंहगढ़) — बाद में इसी किले पर तानाजी मालुसरे ने प्राण दिए।

जावली — यहाँ शिवाजी ने एक चतुर चाल से चंद्रराव मोरे को हराया।

यह सब लड़ाइयाँ शिवाजी की पाठशाला थीं।

और अफजल खान उनका सबसे कठिन इम्तिहान था।


अध्याय ३०: शिवाजी की रणनीति — छापामार युद्ध का जन्मदाता

शिवाजी को गुरिल्ला वारफेयर का पिता कहा जाता है।

उनकी रणनीति सरल थी — लेकिन प्रभावी।

पहला सिद्धांत: कभी खुले मैदान में मत लड़ो जहाँ दुश्मन की संख्या काम आए।

दूसरा सिद्धांत: पहाड़ों, जंगलों और रात का उपयोग करो।

तीसरा सिद्धांत: तेज मारो, तेज भागो। दुश्मन को थकाओ।

चौथा सिद्धांत: सूचना सबसे बड़ा हथियार है — बहिर्जी नाईक इसका प्रमाण।

पाँचवाँ सिद्धांत: जनता का दिल जीतो — वे तुम्हारी सबसे बड़ी सेना हैं।

अफजल खान के साथ भी यही हुआ।

शिवाजी ने उसे अपनी जमीन पर, अपनी शर्तों पर लड़वाया।

और जीते।


भाग आठ: बड़ी तस्वीर — स्वराज्य का उदय

अध्याय ३१: अफजल खान के बाद — विजय का सिलसिला

अफजल खान की मृत्यु के बाद शिवाजी रुके नहीं।

यह उनका स्वभाव था — एक जीत के बाद अगली जीत की ओर बढ़ना।

पन्हाला किला जीता। कोल्हापुर पर धावा। मिर्ज राजा जयसिंह के साथ टकराव। आगरा में कैद और अद्भुत पलायन।

हर कदम पर शिवाजी एक नई कहानी लिखते रहे।

और अंत में —

६ जून, १६७४।

रायगढ़ किले पर।

छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक।

एक मराठा योद्धा जो पहाड़ियों में छापामार लड़ाई लड़ता था — आज छत्रपति बना।

पूरे हिंदुस्तान में यह खबर गूँजी।

और अफजल खान की कब्र पर — शायद उस रात हवा कुछ अलग तरह से बही।


अध्याय ३२: बीजापुर का पतन — एक भविष्यवाणी जो सच हुई

अफजल खान की मृत्यु एक शुरुआत थी।

बीजापुर सल्तनत का पतन उसी दिन शुरू हो गया था — प्रतापगढ़ की उस घाटी में।

एक-एक करके मराठाओं ने बीजापुर के किले जीते।

और अंत में — सन् १६८६ में — बीजापुर सल्तनत का अंत हो गया।

जो शिवाजी ने शुरू किया था, उनके बेटे संभाजी और उनके उत्तराधिकारियों ने पूरा किया।

अफजल खान जिस सल्तनत के लिए लड़ा — वह नहीं रही।

शिवाजी जिस स्वराज्य के लिए लड़े — वह आज भी महाराष्ट्र की आत्मा में जीवित है।


भाग नौ: किंवदंतियाँ और गहरे रहस्य

अध्याय ३३: वह रात जब शिवाजी को सपना आया

एक किंवदंती है।

अफजल खान से मुलाकात से एक रात पहले।

शिवाजी सो नहीं पा रहे थे।

वे एकलिंग… नहीं — वे माँ भवानी से प्रार्थना कर रहे थे।

और उस रात — सपने में — उन्हें एक स्त्री दिखी।

दिव्य। तेजस्वी।

उसने कहा, “डरो मत। तुम्हारे हाथों में मेरी तलवार है।”

शिवाजी जागे।

उनके हाथ में भवानी तलवार थी — जो उनकी प्रिय तलवार थी।

और उन्होंने महसूस किया — कल जो होगा, वह उनके अकेले के हाथों नहीं होगा।

भवानी माँ उनके साथ होंगी।


अध्याय ३४: अफजल खान का आखिरी विचार — एक कल्पना

इतिहास यह नहीं बताता।

लेकिन अगर हम सोचें — अफजल खान के आखिरी क्षण में उसके मन में क्या था?

वह शायद सोच रहा था — “यह कैसे हुआ? मैं अजेय था। मैंने कितने राजाओं को मारा। मेरा नाम सुनकर पूरा दक्कन काँपता था।”

“और इस छोटे से मराठे ने…”

और शायद उस आखिरी क्षण में उसे वे पत्नियाँ याद आई होंगी — जिन्हें उसने मार डाला था।

जिनका खून उसके हाथों पर था।

जीजाबाई ने जो कहा था वह सच हुआ:

“जो इतनी बेकसूर औरतों का खून करता है, उसका खून जरूर एक दिन इसी धरती पर बहेगा।”


अध्याय ३५: बाघनख — वह हथियार जो आज भी है

आज वह बाघनख — जिससे शिवाजी ने अफजल खान पर वार किया था —

सातारा के संग्रहालय में है।

लंदन के एक संग्रहालय में भी इसकी एक प्रतिकृति है।

जब भी कोई उसे देखता है, उसे महसूस होता है — यह सिर्फ एक हथियार नहीं।

यह स्वाभिमान का प्रतीक है।

यह साहस का प्रतीक है।

यह शिवाजी महाराज का प्रतीक है।


अध्याय ३६: प्रतापगढ़ आज — एक जीवित इतिहास

प्रतापगढ़ आज भी खड़ा है।

महाराष्ट्र के सातारा जिले में।

समुद्र तल से ३,५०० फुट की ऊँचाई पर।

घने जंगलों के बीच।

जब आप वहाँ जाते हैं, तो एक अजीब अनुभव होता है।

वह घाटी जहाँ अफजल खान मारा गया — वहाँ खड़े होइए।

हवा में कुछ है।

वह कुछ है — इतिहास की साँस।

उन हजारों मावला योद्धाओं की साँस।

शिवाजी महाराज की उस अदृश्य उपस्थिति।


भाग दस: शिवाजी महाराज — एक युग, एक विरासत

अध्याय ३७: शिवाजी और समुद्र — एक और अनसुना पहलू

बहुत कम लोग जानते हैं —

शिवाजी भारत की नौसेना के जनक हैं।

उन्होंने एक मजबूत नौसेना बनाई — ऐसे समय में जब कोई भारतीय राजा समुद्र को नहीं देखता था।

उन्होंने सिंधुदुर्ग जैसे समुद्री किले बनाए।

पुर्तगालियों, डचों, और अंग्रेजों को चुनौती दी।

यह भी उनके स्वराज्य का हिस्सा था।

स्वराज्य — यानी न सिर्फ जमीन पर, बल्कि समुद्र पर भी।


अध्याय ३८: शिवाजी की प्रशासनिक प्रतिभा

शिवाजी सिर्फ योद्धा नहीं थे।

वे एक महान प्रशासक भी थे।

उन्होंने अष्टप्रधान मंत्रिमंडल बनाया।

उन्होंने मराठी को राजभाषा बनाया — फारसी की जगह।

उन्होंने किसानों की रक्षा की — उनके खेतों को नष्ट होने से बचाया।

उन्होंने रोहिणी (लगान प्रणाली) को सुधारा।

उनके राज्य में न्याय सबके लिए बराबर था।

यह था स्वराज्य — जहाँ राजा जनता का सेवक है, मालिक नहीं।


अध्याय ३९: शिवाजी का संदेश — आज भी जीवित

शिवाजी ने एक बार कहा था:

“यह स्वराज्य व्हावे ही श्री ची इच्छा आहे।”

(यह स्वराज्य होना चाहिए — यह भगवान की इच्छा है।)

यह वाक्य आज भी महाराष्ट्र में गूँजता है।

हर घर में।

हर स्कूल में।

हर दिल में।

शिवाजी ने यह सिखाया —

स्वतंत्रता कोई दे नहीं सकता। उसे लेना पड़ता है।

सम्मान भीख में नहीं मिलता। उसे अर्जित करना पड़ता है।

और अगर रास्ता कठिन हो — तो बुद्धि और साहस से हर रास्ता खुलता है।


अध्याय ४०: अफजल खान और शिवाजी — एक शाश्वत पाठ

इस पूरी कहानी से हम क्या सीखते हैं?

अफजल खान — शक्ति, घमंड, और क्रूरता का प्रतीक। उसके पास सब था — सेना, ताकत, अनुभव। लेकिन उसके पास नहीं था — नैतिक बल।

शिवाजी महाराज — बुद्धि, साहस, और न्याय का प्रतीक। उनके पास कम था — सेना, संसाधन। लेकिन उनके पास था — एक महान उद्देश्य।

और इतिहास बताता है —

उद्देश्य हमेशा ताकत से बड़ा होता है।

जब किसी के पास एक महान लक्ष्य हो, एक निर्मल विचार हो, और उसे प्राप्त करने का साहस हो —

तो कोई अफजल खान उसे नहीं रोक सकता।


उपसंहार: वह गूँज जो कभी नहीं मरती

प्रतापगढ़ की आखिरी शाम

आज — जब आप प्रतापगढ़ जाते हैं।

शाम को।

जब सूरज पश्चिम की पहाड़ियों में डूबने लगता है।

जब जंगल सोने के रंग में नहाते हैं।

जब हवा में एक अजीब शांति होती है।

तब —

अगर आप ध्यान से सुनें —

आपको एक आवाज सुनाई देगी।

वह आवाज है — हजारों मावला सैनिकों की। वह आवाज है — जीवा महाला के भाले की। वह आवाज है — चेतक नहीं — बल्कि शिवाजी के घोड़े की टाप। वह आवाज है — उस महान माँ जीजाबाई की जिसने एक बेटे को सपना दिखाया।

और सबसे ऊपर —

वह आवाज है — छत्रपति शिवाजी महाराज की:

“स्वराज्य माझा जन्मसिद्ध हक्क आहे!”

(स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है!)


“अफजल खान आया था, पहाड़ जैसा, तूफान जैसा। लेकिन शिवा तो शिव थे — तूफान में भी दीपक जैसा।”


परिशिष्ट: ऐतिहासिक तथ्य और संदर्भ

महत्वपूर्ण तिथियाँ

घटनातिथि
शिवाजी महाराज का जन्म१९ फरवरी, १६३०
तोरणा किला विजय१६४५
अफजल खान का वध१० नवंबर, १६५९
राज्याभिषेक६ जून, १६७४
शिवाजी महाराज का निधन३ अप्रैल, १६८०

प्रमुख व्यक्तित्व

शिवाजी की तरफ:

  • जीजाबाई (माँ)
  • जीवा महाला (अंगरक्षक)
  • येसाजी कंक (सरदार)
  • नेताजी पालकर (घुड़सवार सेनापति)
  • बहिर्जी नाईक (मुख्य जासूस)
  • तानाजी मालुसरे (सरदार)
  • कान्होजी जेधे (सरदार)

अफजल खान की तरफ:

  • अफजल खान (सेनापति)
  • सैयद बंडा (अंगरक्षक)
  • कृष्णाजी भास्कर (दूत — बाद में शिवाजी का)

हथियार

बाघनख: उँगलियों में पहना जाने वाला, बाघ के पंजे जैसा हथियार। शिवाजी ने इसी से अफजल खान पर वार किया। आज सातारा संग्रहालय में सुरक्षित।

कट्यार: एक छोटा, तेज खंजर। शिवाजी के पास था।

भवानी तलवार: शिवाजी की प्रिय तलवार।

प्रतापगढ़ के बारे में

  • स्थान: महाराष्ट्र, सातारा जिला
  • ऊँचाई: समुद्र तल से ३,५०० फुट
  • निर्माण: शिवाजी ने १६५६ में बनवाया
  • युद्ध: १० नवंबर, १६५९
  • आज: पर्यटन स्थल और राष्ट्रीय स्मारक

“शिवाजी महाराज की जय!” “हर हर महादेव!” “जय भवानी!”


— यह गाथा उन सभी को समर्पित है जो अन्याय के विरुद्ध खड़े होते हैं — भले ही दुश्मन कितना भी बड़ा हो।


समाप्त

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