खोया हुआ खिलौना

Team Maunam
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सुंदरवन नाम की एक छोटी सी बस्ती में सात साल का एक बच्चा रहता था जिसका नाम था चीकू। चीकू बहुत ही प्यारा और हँसमुख लड़का था। उसके पास खिलौनों का एक बड़ा पिटारा था जिसमें रंग-बिरंगी कारें, बोलने वाली गुड़िया, उड़ने वाले हवाई जहाज और न जाने क्या-क्या भरा हुआ था। लेकिन उन सब में चीकू का सबसे प्यारा दोस्त था—गुल्लू। गुल्लू कोई साधारण खिलौना नहीं था। वह एक छोटा सा, नीले रंग का मखमली हाथी था जिसकी बाईं आँख का बटन थोड़ा ढीला होकर लटक गया था और उसकी सूँड पर एक छोटा सा सफ़ेद दाग था। गुल्लू उसे उसके दादाजी ने उसके पाँचवें जन्मदिन पर दिया था। दादाजी अब इस दुनिया में नहीं थे, इसलिए गुल्लू सिर्फ एक खिलौना नहीं, बल्कि दादाजी की आखिरी निशानी और चीकू का सबसे करीबी साथी था। चीकू गुल्लू को अपने साथ हर जगह ले जाता था—चाहे वह खाना खाना हो, सोना हो या फिर पार्क में खेलने जाना।

एक सुनहरी दोपहर की बात है। सूरज की किरणें पेड़ों के पत्तों से छनकर ज़मीन पर सुनहरी आकृतियाँ बना रही थीं। चीकू की माँ ने उसे पास के ‘खुशहाल पार्क’ में खेलने के लिए भेजा। चीकू ने अपनी छोटी सी पीठ पर अपना बैग टाँगा और गुल्लू को बड़े प्यार से अपनी गोदी में दबाकर पार्क की ओर चल पड़ा। पार्क में बहुत चहल-पहल थी। बच्चे झूलों पर झूल रहे थे, कुछ तितलियों के पीछे भाग रहे थे और कुछ रेत के घर बना रहे थे। चीकू अपनी पसंदीदा जगह, यानी बड़े वाले पीपल के पेड़ के नीचे बनी बेंच पर जाकर बैठ गया। उसने गुल्लू को बेंच पर अपने पास बिठाया और कहा, “गुल्लू, तुम यहीं बैठना और मेरा इंतज़ार करना। मैं ज़रा उस ऊँचे वाले फिसल पट्टी (स्लाइड) पर होकर आता हूँ।”

गुल्लू की वह ढीली आँख मानों कह रही थी, “ठीक है चीकू, मैं यहीं हूँ।” चीकू दौड़ता हुआ स्लाइड की ओर चला गया। वह खेल में इतना मशगूल हो गया कि उसे समय का पता ही नहीं चला। उसने झूला झूला, गोल-गोल घूमने वाले चक्र पर सवारी की और नए दोस्तों के साथ पकड़म-पकड़ाई खेली। तभी अचानक आसमान में काले बादल छाने लगे और ठंडी हवाएँ चलने लगीं। माँ की आवाज़ गूँजी, “चीकू! जल्दी आओ बेटा, बारिश होने वाली है!” चीकू हड़बड़ी में अपनी माँ की ओर भागा। उसने अपना बैग उठाया और माँ का हाथ पकड़कर घर की तरफ दौड़ लगा दी। वह भूल गया कि वह गुल्लू को बेंच पर अकेला छोड़ आया है।

घर पहुँचते ही बारिश तेज़ हो गई। बादल गरजने लगे और बिजली कड़कने लगी। चीकू ने अपने कपड़े बदले और जैसे ही सोने के लिए अपने बिस्तर पर गया, उसने तकिए के नीचे हाथ डाला। गुल्लू वहाँ नहीं था। उसने चादर हटाकर देखी, बिस्तर के नीचे झाँका, अपने खिलौनों के पिटारे को पूरा खाली कर दिया, लेकिन गुल्लू कहीं नहीं था। चीकू का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसे याद आया—गुल्लू तो पार्क की उस ठंडी लकड़ी की बेंच पर अकेला बैठा है! चीकू की आँखों में आँसू भर आए। वह दौड़कर खिड़की के पास गया। बाहर घनघोर अंधेरा था और मूसलाधार बारिश हो रही थी। उसने रोते हुए अपनी माँ से कहा, “माँ! गुल्लू पार्क में रह गया है। वह भीग रहा होगा, उसे डर लग रहा होगा। कृपया मुझे उसे लेने जाने दें!”

माँ ने उसे गले से लगाया और समझाया, “बेटा, बाहर बहुत तेज़ तूफ़ान है। हम इस वक्त बाहर नहीं जा सकते। जैसे ही सुबह होगी, हम सबसे पहले गुल्लू को ढूँढने चलेंगे। तब तक प्रार्थना करो कि वह सुरक्षित रहे।” उस रात चीकू एक पल के लिए भी नहीं सो सका। वह बस खिड़की से बाहर गिरती बूंदों को देखता रहा और सोचता रहा कि गुल्लू क्या सोच रहा होगा। क्या उसे ठंड लग रही होगी? क्या कोई आवारा कुत्ता उसे ले गया होगा? चीकू ने अपनी आँखें मूँद लीं और कल्पना करने लगा कि गुल्लू के साथ क्या हो रहा होगा।

उधर पार्क में, गुल्लू वाकई बहुत अकेला और डरा हुआ था। बारिश की बड़ी-बड़ी बूंदें उसके मखमली शरीर को भिगो रही थीं। उसकी एक आँख से पानी की बूंदें ऐसे गिर रही थीं जैसे वह भी रो रहा हो। तभी उसे एक भारी आहट सुनाई दी। एक बड़ा सा कुत्ता, जिसका नाम शेरू था, बारिश से बचने के लिए बेंच के नीचे आकर बैठ गया। शेरू ने अपनी नाक से गुल्लू को सूंघा। गुल्लू को लगा कि अब वह गया! शेरू उसे अपने दाँतों से चबा डालेगा। लेकिन शेरू एक समझदार कुत्ता था। उसने देखा कि यह छोटा सा हाथी भी उसकी तरह अकेला है। उसने गुल्लू को अपने मुंह में धीरे से पकड़ा और बेंच के नीचे एक सूखी जगह पर रख दिया। शेरू उसके पास ही सटकर बैठ गया, जिससे गुल्लू को थोड़ी गर्माहट महसूस होने लगी। रात भर वह कुत्ता उस नन्हे खिलौने का पहरेदार बना रहा।

सुबह हुई। बारिश थम चुकी थी और ताजी मिट्टी की खुशबू हवा में तैर रही थी। सूरज की पहली किरण के साथ ही चीकू और उसके पिताजी पार्क की ओर भागे। चीकू का दिल उम्मीद और डर के बीच झूल रहा था। जब वे उस पीपल के पेड़ के पास पहुँचे, तो चीकू की नज़र उस बेंच पर पड़ी। बेंच खाली थी! चीकू की चीख निकल गई, “पिताजी! गुल्लू यहाँ नहीं है! उसे कोई ले गया!”

पिताजी ने उसे ढांढस बँधाया और आसपास ढूँढने लगे। उन्होंने घास में देखा, कूड़ेदान के पास तलाश की, यहाँ तक कि माली काका से भी पूछा। माली काका ने कहा, “बेटा, मैंने तो यहाँ सुबह कोई खिलौना नहीं देखा। रात में बहुत तेज़ बारिश थी, शायद पानी के बहाव में कहीं बह गया हो।” चीकू फूट-फूटकर रोने लगा। उसे लग रहा था जैसे उसने अपने सबसे अच्छे दोस्त को हमेशा के लिए खो दिया है। पिताजी उसे घर ले जाने लगे, लेकिन चीकू का मन नहीं मान रहा था। वह मुड़-मुड़कर उस पेड़ को देख रहा था। तभी उसकी नज़र झाड़ियों के पीछे चमकते हुए किसी नीले रंग के कपड़े पर पड़ी।

चीकू पागलों की तरह उस तरफ भागा। झाड़ियों के पीछे एक छोटा सा गड्ढा था, और वहाँ गुल्लू पड़ा हुआ था। लेकिन वह बहुत ही बुरी हालत में था। वह कीचड़ से पूरी तरह लथपथ हो चुका था, उसका नीला रंग अब मटमैला दिख रहा था और उसकी वह ढीली आँख अब पूरी तरह से गायब हो चुकी थी। चीकू ने उसे उठा लिया और अपने सीने से लगा लिया। उसे इस बात का दुख नहीं था कि गुल्लू गंदा हो गया है या उसकी आँख टूट गई है, उसे बस इस बात की खुशी थी कि उसका दोस्त उसे मिल गया था।

घर आकर माँ ने गुल्लू को बहुत ही सावधानी से साफ़ किया। उन्होंने उसे गुनगुने पानी और साबुन से नहलाया। चीकू पास ही बैठा सब देख रहा था। सूखने के बाद, माँ ने अपनी सिलाई की टोकरी निकाली। उन्होंने एक सुंदर सा सफ़ेद मोती ढूँढा और उसे गुल्लू की आँख की जगह टाँक दिया। अब गुल्लू पहले से भी ज़्यादा प्यारा लग रहा था। उसकी एक आँख काली थी और एक मोती जैसी सफ़ेद, जो उसे एक अनोखी पहचान दे रही थी।

इस घटना ने चीकू को एक बड़ा सबक सिखाया। उसने समझा कि ज़िम्मेदारी क्या होती है। उसने सीखा कि जो चीज़ें हमें प्रिय होती हैं, उनका ध्यान रखना कितना ज़रूरी है। लेकिन उससे भी बड़ी बात जो उसने सीखी, वह थी ‘आशा’ और ‘दोस्ती’। उसे समझ आया कि भले ही गुल्लू एक निर्जीव खिलौना था, लेकिन उसका प्यार उसके लिए असली था। उस दिन के बाद से, चीकू ने कभी भी अपने खिलौनों को यहाँ-वहाँ नहीं छोड़ा। वह अब और भी ज़्यादा संवेदनशील हो गया था। उसने पार्क में एक छोटा सा ‘लॉस्ट एंड फ़ाउंड’ (खोया-पाया) कोना बनाने का सुझाव भी दिया, ताकि अगर किसी और बच्चे का खिलौना खो जाए, तो उसे वापस मिल सके।

एक शाम, जब चीकू अपने कमरे में बैठा गुल्लू के साथ खेल रहा था, उसने खिड़की से बाहर देखा। वही शेरू कुत्ता पार्क की दीवार के पास बैठा हुआ था। चीकू को याद आया कि माली काका ने बताया था कि रात को एक कुत्ते को बेंच के पास बैठा देखा गया था। चीकू समझ गया कि उसकी गैर-मौजूदगी में गुल्लू का ख्याल किसने रखा था। वह दौड़कर रसोई में गया, एक बिस्कुट का पैकेट लिया और दौड़ता हुआ शेरू के पास पहुँचा। उसने शेरू को बिस्कुट खिलाए और उसके सिर पर हाथ फेरा। गुल्लू भी उसकी जेब से झाँक रहा था, मानो वह भी शेरू को शुक्रिया कह रहा हो।

वक्त गुज़रता गया, चीकू बड़ा हो गया, स्कूल जाने लगा, नए दोस्त बने, लेकिन गुल्लू हमेशा उसके कमरे की सबसे खास जगह पर रहा। जब कभी चीकू उदास होता या उसे अपने दादाजी की याद आती, वह गुल्लू को अपने पास रख लेता। गुल्लू की वह एक मोती वाली आँख उसे याद दिलाती थी कि मुश्किलों के बाद भी चीज़ें फिर से सुधर सकती हैं, बस हमें उन्हें सहेजने की ज़रूरत होती है। खोया हुआ खिलौना तो मिल गया था, लेकिन उस सफर में चीकू ने एक ऐसी परिपक्वता पा ली थी जो उसे जीवन भर काम आने वाली थी। वह अब जान चुका था कि दुनिया में सबसे कीमती चीज़ वह नहीं है जिसे हम पैसों से खरीदते हैं, बल्कि वह है जिसके साथ हमारी भावनाएँ और यादें जुड़ी होती हैं।

सालों बाद, जब चीकू के अपने बच्चे हुए, तो उसने उन्हें भी गुल्लू की कहानी सुनाई। उसने उन्हें सिखाया कि खिलौने सिर्फ खेलने की वस्तु नहीं होते, वे हमारे बचपन के गवाह होते हैं। और इस तरह, वह नीला मखमली हाथी पीढ़ी दर पीढ़ी प्यार और ज़िम्मेदारी की कहानी सुनाता रहा। उस छोटे से खोए हुए खिलौने ने एक पूरे परिवार को यह सिखा दिया कि खोई हुई चीज़ें तब तक नहीं खोतीं, जब तक उन्हें ढूँढने की उम्मीद ज़िंदा रहती है। चीकू के घर में आज भी वह पुराना हाथी रखा हुआ है, जिसकी एक आँख आज भी उस बरसाती रात और उस अनूठी दोस्ती की याद दिलाती है।

एक दिन चीकू के छोटे बेटे, जिसका नाम आरव था, ने पूछा, “पापा, क्या गुल्लू सच में आपसे बात करता है?” चीकू मुस्कुराया और आरव को अपने पास बिठाया। उसने कहा, “बेटा, खिलौने शब्दों में बात नहीं करते। वे दिल की आवाज़ से बात करते हैं। जब तुम किसी से बहुत प्यार करते हो और उसका ख्याल रखते हो, तो वह तुम्हारे दिल में हमेशा ज़िंदा रहता है। गुल्लू ने मुझे सिखाया कि हार नहीं माननी चाहिए। जब वह पार्क में अकेला था, उसने हार नहीं मानी। जब वह कीचड़ में दबा था, उसे विश्वास था कि मैं उसे ढूँढने आऊँगा। यह विश्वास ही सबसे बड़ी ताकत है।”

आरव ने बड़े गौर से गुल्लू की उस मोती वाली आँख को देखा। उसे लगा जैसे गुल्लू उसे देखकर मुस्कुरा रहा है। आरव ने धीरे से गुल्लू को उठाया और अपने सीने से लगा लिया। चीकू की आँखों में चमक आ गई। उसने देखा कि जो प्यार उसे दादाजी से मिला था, और जो रिश्ता उसने गुल्लू के साथ बनाया था, वह अब उसके बेटे के हाथों में सुरक्षित है। पार्क की वह घटना केवल एक हादसा नहीं थी, बल्कि एक ऐसी कड़ी थी जिसने चीकू के बचपन को एक गहरा अर्थ दे दिया था।

आज भी जब कभी बारिश होती है और बादल गरजते हैं, चीकू अपनी खिड़की से बाहर देखता है। उसे वह पार्क, वह बेंच और वह झाड़ी याद आती है। वह मुड़कर गुल्लू को देखता है जो अब थोड़ा और पुराना हो गया है, जिसका रंग थोड़ा और फीका पड़ गया है, लेकिन उसकी चमक कम नहीं हुई है। वह खिलौना उसे याद दिलाता है कि बचपन की मासूमियत को हमेशा अपने अंदर बचाकर रखना चाहिए। खोया हुआ खिलौना मिल जाने का सुख दुनिया के किसी भी खजाने से बड़ा होता है, क्योंकि उसमें हमारी रूह का एक टुकड़ा बसा होता है।

कहानी का अंत यहाँ नहीं होता, बल्कि यह एक नई शुरुआत थी। चीकू ने अपने शहर में एक संस्था शुरू की जिसका नाम रखा—’दोस्त की तलाश’। इस संस्था का काम था उन बच्चों की मदद करना जिनके खिलौने या पालतू जानवर खो जाते थे। चीकू का मानना था कि एक बच्चे के लिए उसका खिलौना खोना किसी बड़े नुकसान से कम नहीं होता। उसने पार्क में बड़े-बड़े बोर्ड लगवाए और लोगों को जागरूक किया। धीरे-धीरे, पूरा शहर इस मुहिम में जुड़ गया। अब अगर किसी बच्चे का गुड़िया या भालू पार्क में छूट जाता, तो उसे कोई न कोई सुरक्षित जगह पर पहुँचा देता।

चीकू की यह छोटी सी कोशिश उस नीले हाथी की देन थी। एक छोटे से खोए हुए खिलौने ने न केवल एक बच्चे को ज़िम्मेदार बनाया, बल्कि पूरे समाज में सहानुभूति और प्रेम के बीज बो दिए। गुल्लू की वह एक आँख, जो कभी कमज़ोरी लगती थी, अब साहस का प्रतीक बन चुकी थी। आरव भी अब बड़ा हो रहा था और वह अपने पिता के साथ इस काम में हाथ बँटाने लगा। एक दिन, एक छोटी सी बच्ची अपनी खोई हुई गुड़िया पाकर इतनी खुश हुई कि उसने चीकू को गले लगा लिया। उस समय चीकू को लगा जैसे वह खुद सात साल का हो गया है और उसे उसका गुल्लू वापस मिल गया है।

ज़िंदगी के इस लंबे सफ़र में, हम बहुत कुछ खोते हैं और बहुत कुछ पाते हैं। लेकिन कुछ यादें ऐसी होती हैं जो कभी धुंधली नहीं होतीं। चीकू के लिए गुल्लू सिर्फ एक खिलौना नहीं, एक गुरु था। उसने सिखाया कि टूटी हुई चीज़ों को फेंकने के बजाय उन्हें सँवारना चाहिए। उसने सिखाया कि अकेलेपन में भी धैर्य रखना चाहिए। और सबसे महत्वपूर्ण, उसने सिखाया कि प्यार की कोई सीमा नहीं होती, चाहे वह किसी इंसान से हो या मखमली हाथी से।

शाम ढल रही थी। चीकू अपने बगीचे में बैठा था। आरव पास ही खेल रहा था। हवा में एक सुकून था। चीकू ने अपने पास रखे पुराने बॉक्स को खोला और गुल्लू को बाहर निकाला। उसने गुल्लू की मोती वाली आँख को चूमा और धीरे से कहा, “शुक्रिया मेरे दोस्त, मुझे ‘इंसान’ बनाने के लिए।” तभी उसे महसूस हुआ कि हवा ने गुल्लू के कानों को हल्का सा हिलाया, मानो वह कह रहा हो, “हमेशा तुम्हारे साथ हूँ, चीकू।” और इस तरह, एक खोए हुए खिलौने की कहानी एक कभी न खत्म होने वाले प्यार की दास्तान बन गई। यह कहानी आज भी हर उस बच्चे को सुनाई जाती है जो अपनी किसी प्यारी चीज़ को खोकर उदास हो जाता है, ताकि उसे याद रहे कि प्यार कभी नहीं खोता, वह बस वापस आने का रास्ता ढूँढता है।

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