सुंदरवन नाम का एक विशाल और हरा-भरा जंगल था। इस जंगल में ऊंचे-ऊंचे पहाड़, कल-कल करती नदियाँ और घने पेड़ों की ओट में छिपे अनगिनत राज थे। इसी जंगल के सबसे ऊंचे और पुराने बरगद के पेड़ पर रहता था—जग्गू। जग्गू एक छोटा, भूरे रंग का और बेहद फुर्तीला बंदर था। उसकी आँखों में हमेशा एक अजीब सी चमक रहती थी, जो उसकी अगली शरारत का संकेत देती थी। जंगल का शायद ही कोई ऐसा जानवर होगा, जो जग्गू की शरारतों से परेशान न हो। कभी वह सोते हुए शेर की मूंछ खींच देता, तो कभी हाथी दादा की सूंड में खुजली वाली घास डाल देता।
जग्गू की माँ, ‘मटकी’, हमेशा उसे समझाती थी, “जग्गू, बेटा! शरारत उतनी ही अच्छी होती है जिससे किसी का दिल न दुखे। एक दिन तेरी यही आदत तुझे बड़ी मुसीबत में डाल देगी।” लेकिन जग्गू की फितरत तो हवा के झोंके जैसी थी, जिसे बांधना नामुमकिन था। जग्गू का सबसे प्रिय मित्र ‘गोलू’ नाम का एक कछुआ था। गोलू बहुत धीरे चलता था, जबकि जग्गू बिजली की तरह तेज़ था। जग्गू अक्सर गोलू की पीठ पर बैठकर सवारी करता और उसे ‘सुपर-फास्ट एक्सप्रेस’ कहता।
एक दिन जंगल में एक खबर फैली कि जंगल के दूसरी ओर इंसानों की एक बस्ती में मेला लगा है। जग्गू ने कभी इंसान नहीं देखे थे, बस उनके बारे में सुना था। उसने गोलू से कहा, “गोलू भाई, आज तो मेले की सैर करेंगे। सुना है वहाँ रंग-बिरंगी चीज़ें और मीठी-मीठी मिठाइयाँ मिलती हैं।” गोलू डर गया, उसने मना किया, पर जग्गू कहाँ मानने वाला था। वह छलांगें मारता हुआ बस्ती की ओर बढ़ गया।
मेले का नज़ारा अद्भुत था। जग्गू एक पेड़ की टहनी पर छिपकर सब देख रहा था। वहाँ एक जादूगर अपना खेल दिखा रहा था। जादूगर के पास एक सुनहरी टोपी थी, जिसे पहनकर वह गायब होने का नाटक करता था। जग्गू को वह टोपी बहुत पसंद आई। उसने सोचा, “अगर यह टोपी मेरे पास हो, तो मैं शेर को परेशान करूँगा और उसे पता भी नहीं चलेगा!” जैसे ही जादूगर अपनी आँखों पर पट्टी बांधकर करतब दिखाने लगा, जग्गू ने एक लंबी छलांग लगाई, झपट्टे से टोपी उठाई और पेड़ के घने पत्तों में ओझल हो गया।
मेले में हड़कंप मच गया। लोग चिल्लाने लगे, “बंदर! बंदर! चोर बंदर!” जग्गू अपनी कामयाबी पर फूले नहीं समा रहा था। वह टोपी पहनकर वापस जंगल की ओर भागा। रास्ते में उसे गज्जू हाथी मिला। जग्गू ने सोचा, चलो आज गज्जू दादा को डराते हैं। उसने टोपी पहनी और एक झाड़ी के पीछे छिप गया। लेकिन उसे यह नहीं पता था कि वह टोपी जादुई नहीं थी, बस एक साधारण टोपी थी। गज्जू ने उसे आसानी से देख लिया और हंसते हुए कहा, “जग्गू, यह क्या लाल रंग का कटोरा सिर पर लादे घूम रहे हो?” जग्गू का चेहरा उतर गया। उसे लगा था कि वह गायब हो जाएगा।
तभी अचानक, जंगल के शांत माहौल में कुछ अजीब आहटें सुनाई दीं। जग्गू ने अपनी तेज़ आँखों से देखा कि कुछ शिकारी जाल और बंदूकें लेकर जंगल के अंदर आ रहे थे। वे आपस में बात कर रहे थे कि आज वे सुंदरवन के दुर्लभ जानवरों को पकड़कर शहर के चिड़ियाघर में बेच देंगे। जग्गू का दिल धक-धक करने लगा। उसे अपनी माँ की बात याद आई कि शरारत और खेल अलग हैं, पर अपनों की रक्षा करना सबसे बड़ा धर्म है।
जग्गू ने तुरंत एक योजना बनाई। वह जानता था कि वह अकेला शिकारियों का मुकाबला नहीं कर सकता। वह फुर्ती से भागकर बूढ़े बरगद के पास पहुँचा, जहाँ जंगल की पंचायत होती थी। उसने सभी जानवरों को इकट्ठा किया। जग्गू ने हाफते हुए कहा, “दोस्त! आज हमारी मस्ती का दिन नहीं है। शिकारी आए हैं और वे हमें पकड़ना चाहते हैं। हमें मिलकर उन्हें रोकना होगा।”
पहले तो किसी ने जग्गू पर विश्वास नहीं किया। लोमड़ी बोली, “शायद यह तुम्हारी कोई नई शरारत है जग्गू!” लेकिन जब गज्जू हाथी ने भी शिकारियों की आहट की पुष्टि की, तो सब गंभीर हो गए। जग्गू ने अपनी योजना सबको समझाई। उसने अपनी ‘शरारती बुद्धि’ का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में करने का फैसला किया।
शिकारी जंगल में गहराई तक पहुँच चुके थे। मुख्य शिकारी, जिसका नाम ‘खूंखार सिंह’ था, ने एक बड़ा जाल बिछाया। तभी अचानक, उसके सिर पर एक बड़ा सा पका हुआ बेल का फल गिरा। “आह!” वह चिल्लाया। ऊपर देखा तो जग्गू उसे चिढ़ा रहा था। खूंखार सिंह को गुस्सा आ गया। “इस बंदर को पकड़ो!” वह चिल्लाया। जग्गू एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर कूदने लगा। शिकारियों ने उसका पीछा करना शुरू कर दिया। जग्गू उन्हें ठीक उस दलदल की ओर ले गया, जिसे पत्तों से ढका गया था।
शिकारी जग्गू को पकड़ने के चक्कर में अंधे हो चुके थे। जैसे ही वे दलदल के पास पहुँचे, जग्गू ने ज़ोर से सीटी बजाई। यह एक संकेत था। हाथियों की टोली ने पीछे से आकर ज़ोर से चिंघाड़ना शुरू किया। शिकारी घबराकर आगे भागे और सीधे दलदल में जा गिरे। वे गले तक कीचड़ में फंस गए। जग्गू यहीं नहीं रुका। उसने जादूगर की वह लाल टोपी खूंखार सिंह के चेहरे पर डाल दी और ऊपर से मधुमक्खियों का एक खाली छत्ता (जो उसने पहले ही तोड़ रखा था) उनके पास फेंक दिया।
मधुमक्खियों के डर से शिकारी रहम की भीख मांगने लगे। उन्होंने कसम खाई कि वे फिर कभी जंगल की ओर मुड़कर नहीं देखेंगे। जानवरों ने उन्हें डरा-धमका कर जंगल से बाहर खदेड़ दिया। उस रात जंगल में जश्न का माहौल था। सब जग्गू की तारीफ कर रहे थे। शेर राजा ने जग्गू को अपने पास बुलाया और कहा, “जग्गू, आज तुम्हारी चतुराई और तुम्हारी शरारत करने की कला ने हमें बचा लिया। तुम केवल शरारती ही नहीं, बहादुर भी हो।”
जग्गू की आँखों में आँसू थे। उसने अपनी माँ की गोद में सिर रखकर कहा, “माँ, आपने सही कहा था। आज मुझे समझ आया कि असली ताकत दूसरों को परेशान करने में नहीं, बल्कि उनकी मदद करने में है।” उस दिन के बाद, जग्गू बदल गया। वह अब भी शरारतें करता था, लेकिन उसकी शरारतें अब सबको हंसाने के लिए होती थीं, न कि परेशान करने के लिए।
समय बीतता गया और जग्गू जंगल का ‘सुरक्षा मंत्री’ बन गया। उसने बंदरों की एक ऐसी सेना बनाई जो जंगल की सीमाओं पर नज़र रखती थी। वह लाल टोपी आज भी उस बरगद की सबसे ऊंची टहनी पर टंगी है, जो हर किसी को यह याद दिलाती है कि एक छोटा सा बंदर भी अपनी सूझबूझ से बड़े से बड़ा संकट टाल सकता है।
एक शाम, जब सूरज ढल रहा था और आसमान संतरी रंग में रंगा था, जग्गू अपने मित्र गोलू के साथ नदी किनारे बैठा था। गोलू ने पूछा, “जग्गू, क्या तुम्हें उस दिन डर नहीं लगा?” जग्गू मुस्कुराया और बोला, “डर तो लगा था गोलू भाई, पर जब इरादे नेक हों और हाथ में एक अच्छी योजना हो, तो डर भी आपसे डरने लगता है।”
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि बुद्धि और चपलता का सही दिशा में उपयोग किया जाए, तो वह वरदान बन जाती है। बच्चों के बीच जग्गू की यह कहानी आज भी बड़े चाव से सुनाई जाती है, और सुंदरवन के बच्चे आज भी जब किसी बंदर को टोपी पहने देखते हैं, तो वे खुशी से चिल्लाते हैं— “देखो! जग्गू आ गया!”
जंगल की हर सरसराहट अब जग्गू की बहादुरी का गीत गाती है। वह बरगद का पेड़ अब सिर्फ एक पेड़ नहीं, बल्कि न्याय और एकता का प्रतीक बन चुका है। जग्गू ने सिखाया कि हर किसी के अंदर एक विशेष गुण होता है, बस ज़रूरत है उसे सही समय पर सही तरीके से पहचानने की। और इस तरह, सुंदरवन का वह शरारती बंदर, पूरे जंगल का सबसे प्यारा और सम्मानित नायक बन गया।
