हिमालय की गगनचुंबी चोटियों के बीच बसा एक छोटा सा गाँव था—’उजाला’। इस गाँव की विशेषता यह थी कि यहाँ साल के छह महीने बर्फ की सफेद चादर बिछी रहती थी। यहाँ के बच्चे बर्फ के गोले बनाकर खेलते, बर्फ के घर बनाते और पहाड़ी ढलानों पर फिसलते थे। इसी गाँव में दस साल का एक छोटा और जिज्ञासु लड़का रहता था, जिसका नाम था चिंटू। चिंटू बाकी बच्चों से थोड़ा अलग था। जहाँ दूसरे बच्चे बर्फ में खेलना पसंद करते थे, चिंटू अक्सर गाँव के किनारे लगी एक पुरानी चट्टान पर बैठकर दूर क्षितिज को देखता रहता था। उसका एक बहुत बड़ा और अनोखा सपना था—उसे ‘समंदर’ देखना था।
उजाला गाँव के किसी भी व्यक्ति ने कभी समंदर नहीं देखा था। पहाड़ों के उस पार क्या है, यह किसी को ठीक से पता नहीं था। चिंटू ने पहली बार समंदर के बारे में अपनी फटी-पुरानी भूगोल की किताब में पढ़ा था। उसमें एक तस्वीर थी—नीला पानी, जिसकी कोई सीमा नहीं थी, और किनारे पर सुनहरी रेत। उस दिन से चिंटू की आँखों में बस वही नीला रंग बस गया था। वह अक्सर अपने दादाजी से पूछता, ‘दादू, क्या समंदर सच में इतना बड़ा होता है कि उसका दूसरा सिरा नहीं दिखता?’ दादू हँसते और कहते, ‘बेटा, मैंने भी कहानियों में ही सुना है। कहते हैं कि समंदर इतना विशाल है कि उसमें हज़ारों हिमालय समा सकते हैं। उसका पानी खारा होता है और वह निरंतर गरजता रहता है।’
चिंटू का यह सपना उसके दोस्तों के लिए मज़ाक का विषय था। उसका सबसे अच्छा दोस्त, गोलू, अक्सर कहता, ‘अरे चिंटू, तू पागल है क्या? हम पहाड़ों के लोग हैं। हमारा नसीब इन बर्फीली वादियों में है। समंदर तो यहाँ से हज़ारों मील दूर है। वहाँ जाने के लिए बहुत पैसा और किस्मत चाहिए, जो हमारे पास नहीं है।’ चिंटू को बुरा तो लगता, लेकिन उसका विश्वास नहीं डगमगाता। वह रोज़ शाम को घर के पीछे वाली मिट्टी के ढेर पर जाता और गीली मिट्टी से छोटी-छोटी आकृतियाँ बनाता। वह बर्फ के बीच रेत का किला बनाने की कोशिश करता। वह सोचता कि एक दिन वह सच में ऐसी ही रेत पर खड़ा होगा और लहरें उसके पैरों को छुएँगी।
एक दिन गाँव के स्कूल में एक घोषणा हुई। ज़िले के मुख्यालय में एक बड़ी विज्ञान और कला प्रदर्शनी आयोजित होने वाली थी। इस प्रतियोगिता का विषय था—’मेरा सपना, मेरा भारत’। विजेता को एक बहुत बड़ा पुरस्कार मिलने वाला था—भारत के किसी भी एक राज्य की पूरी यात्रा का खर्च सरकार उठाएगी। जैसे ही चिंटू ने यह सुना, उसकी आँखों में चमक आ गई। उसे लगा कि उसके सपने को पंख मिलने वाले हैं। उसने तुरंत अपना नाम लिखवा दिया। मास्टर जी ने उसे टोका, ‘चिंटू, बेटा, तुम क्या बनाओगे? बाकी बच्चे पहाड़ों के मॉडल, जड़ी-बूटियों की प्रदर्शनी या स्थानीय संस्कृति पर प्रोजेक्ट बना रहे हैं।’
चिंटू ने दृढ़ता से कहा, ‘मास्टर जी, मैं समंदर का मॉडल बनाऊँगा।’ मास्टर जी हैरान रह गए। उन्होंने कहा, ‘लेकिन चिंटू, तुमने तो कभी समंदर देखा ही नहीं है। तुम उसे कैसे बनाओगे?’ चिंटू ने मुस्कुराकर जवाब दिया, ‘सर, मैंने उसे अपनी आँखों से नहीं देखा, लेकिन अपने दिल से रोज़ देखता हूँ।’ अगले एक महीने तक चिंटू ने दिन-रात एक कर दिया। उसके पास समंदर दिखाने के लिए न तो नीला पेंट था और न ही कोई महँगा सामान। उसने गाँव की नीली स्याही इकट्ठा की, पुरानी बोतलों को तोड़कर कांच के बारीक टुकड़े बनाए ताकि वे पानी की तरह चमक सकें। उसने नदी के किनारे से सबसे महीन बालू के कण इकट्ठे किए और उन्हें सुखाया।
प्रतियोगिता का दिन आ गया। चिंटू के पास शहर जाने के लिए बस का किराया भी मुश्किल से जुटा था। वह अपना भारी-भरकम मॉडल लेकर ज़िले के स्कूल पहुँचा। वहाँ बड़े-बड़े शहरों के बच्चे आए थे, जिनके पास बिजली से चलने वाले मॉडल और रोबोट्स थे। चिंटू का मॉडल एक साधारण लकड़ी के तख्ते पर था। जब चिंटू की बारी आई, तो जज उसके पास आए। चिंटू का मॉडल अद्भुत था। उसने नीली स्याही और कांच के टुकड़ों से समंदर की लहरें बनाई थीं, जो धूप में चमक रही थीं। उसने सीपियों की जगह अखरोट के छिलकों को तराश कर रखा था। लेकिन सबसे खास बात वह ध्वनि थी, जो उसके मॉडल से आ रही थी। चिंटू ने मॉडल के नीचे एक पुरानी बांसुरी और हवा का एक ऐसा इंतजाम किया था कि जब हवा चलती, तो समंदर की लहरों जैसी ‘शू-शू’ की आवाज़ आती थी।
जजों ने पूछा, ‘चिंटू, तुमने यह सब कैसे सोचा?’ चिंटू की आँखों में आँसू थे। उसने कहा, ‘सर, मैं उस गाँव से आता हूँ जहाँ केवल सफेदी है। मैंने कभी नीला रंग नहीं देखा था। मैंने यह मॉडल इसलिए बनाया क्योंकि मैं बताना चाहता हूँ कि एक छोटे से पहाड़ के बच्चे का सपना भी समंदर जितना गहरा हो सकता है। मैं उस शोर को महसूस करना चाहता हूँ जो लहरें किनारे पर आकर करती हैं।’ पूरी हॉल तालियों की गूँज से भर गया। उस दिन चिंटू ने न केवल प्रथम पुरस्कार जीता, बल्कि जजों का दिल भी जीत लिया।
पुरस्कार के रूप में चिंटू को केरल की यात्रा का टिकट मिला। वह अपने दादू को भी साथ ले गया। जब वह पहली बार सचमुच के समंदर के सामने खड़ा हुआ, तो वह स्तब्ध रह गया। उसे लगा जैसे उसकी किताब की वह छोटी सी तस्वीर हकीकत बनकर उसके सामने नाच रही हो। वह दौड़कर पानी के पास गया। जैसे ही पहली लहर ने उसके पाँव छुए, वह चिल्ला उठा, ‘दादू! यह सच है! यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा मैंने सोचा था! बल्कि उससे भी सुंदर!’ चिंटू ने वहाँ की रेत से एक बड़ा सा किला बनाया। उसने एक कांच की बोतल में समंदर का थोड़ा सा पानी और कुछ असली सीपियाँ भरीं।
जब वह अपने गाँव वापस लौटा, तो पूरे गाँव ने उसका स्वागत एक नायक की तरह किया। चिंटू ने वह बोतल अपने स्कूल की मेज पर रख दी और कहा, ‘यह इस बात का सबूत है कि अगर आप सपने देखने की हिम्मत रखते हैं और उन पर अडिग रहते हैं, तो पूरी कायनात उन्हें सच करने में जुट जाती है।’ उजाला गाँव के बच्चे अब सिर्फ बर्फ से नहीं खेलते थे, वे अब चिंटू की सीपियों को कान से लगाकर समंदर की गूँज सुनते थे और अपने-अपने नए सपने बुनते थे। चिंटू ने सिखा दिया था कि पहाड़ की ऊँचाइयों से भी ऊँचा इंसान का हौसला होता है, जो उसे समंदर की गहराई तक ले जा सकता है। उसका वह छोटा सा सपना अब पूरे गाँव की प्रेरणा बन चुका था।
