जादुई पेंसिल

Team Maunam
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हिमालय की तलहटी में बसा एक छोटा सा गाँव था—नीलकोट। यहाँ की हवाओं में देवदार के वृक्षों की महक और पास ही बहती अलकनंदा की कल-कल ध्वनि गूँजती रहती थी। इसी गाँव में दस साल का एक बच्चा रहता था जिसका नाम था समर। समर के पिता गाँव के एक साधारण किसान थे और माँ घर का कामकाज संभालती थीं। समर को बचपन से ही चित्रकारी का बहुत शौक था। वह गाँव की मिट्टी पर लकड़ियों से चित्र बनाता, कभी पत्थरों पर कोयले से आकृतियाँ उकेरता। उसके पास न तो सुंदर रंगों के डिब्बे थे और न ही बढ़िया कागज़। लेकिन उसके सपनों में रंगों का एक असीमित संसार था।

एक दिन समर स्कूल से लौट रहा था। रास्ते में एक पुरानी हवेली पड़ती थी जिसे लोग ‘खंडहर’ कहते थे। उस दिन वहाँ एक अजीब सी चमक दिखाई दी। जिज्ञासावश समर अंदर चला गया। धूल और जालों से भरी उस हवेली के एक कोने में उसे एक पुरानी लकड़ी की मेज दिखी। मेज की दराज आधी खुली थी, जिसमें से एक मद्धम सुनहरी रोशनी छनकर बाहर आ रही थी। समर ने घबराते हुए दराज पूरी खोली। वहाँ मखमल के एक फटे हुए कपड़े के ऊपर एक पेंसिल रखी थी। वह पेंसिल कोई साधारण पेंसिल नहीं थी। वह गहरे महोगनी रंग की थी और उस पर बारीक चांदी के तार से नक्काशी की गई थी। समर ने जैसे ही उसे हाथ लगाया, उसे एक हल्की सी सिहरन महसूस हुई। उसने सोचा, ‘शायद किसी कलाकार की पेंसिल होगी,’ और वह उसे लेकर घर आ गया।

उस रात समर को बहुत भूख लगी थी। घर में उस दिन अनाज खत्म हो गया था और उसके माता-पिता चिंतित होकर सो गए थे। समर ने अपनी फटी हुई ड्राइंग बुक निकाली और उस नई पेंसिल से एक बड़ी सी ‘रोटी’ का चित्र बनाया। जैसे ही उसने अंतिम रेखा खींची, एक जादुई चमक हुई और कागज पर बनी वह रोटी अचानक असली हो गई! समर की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने रोटी को छूकर देखा—वह गरम थी और उसमें से ताजी पकी हुई महक आ रही थी। समर ने आधी रोटी खुद खाई और आधी अपने सोते हुए माता-पिता के सिरहाने रख दी। वह समझ गया था कि यह कोई साधारण पेंसिल नहीं बल्कि एक ‘जादुई पेंसिल’ है।

अगले दिन समर ने पेंसिल की परीक्षा लेनी चाही। उसने एक छोटा सा सेब बनाया। पलक झपकते ही लाल रसीला सेब उसके हाथ में था। फिर उसने अपनी फटी हुई चप्पलों को देखकर एक नई जोड़ी जूतों का चित्र बनाया। देखते ही देखते शानदार नीले जूते उसके पैरों में थे। समर खुशी से नाच उठा। लेकिन समर स्वभाव से बहुत दयालु और समझदार था। उसने सोचा कि अगर वह अपनी हर जरूरत इस पेंसिल से पूरी करेगा, तो वह आलसी हो जाएगा। उसने तय किया कि वह इस जादू का उपयोग केवल दूसरों की मदद के लिए करेगा।

गाँव में एक बूढ़ी दादी रहती थीं जिन्हें ‘काकी’ कहा जाता था। काकी की आँखों की रोशनी बहुत कम हो गई थी और वह ठीक से देख नहीं पाती थीं। समर उनके पास गया और एक कागज पर सुंदर सा चश्मा बनाया। जैसे ही जादू हुआ, काकी के सामने एक चश्मा प्रकट हो गया। काकी ने उसे पहना और खुशी से चिल्ला उठीं, ‘बेटा, मुझे सब कुछ साफ दिख रहा है! तुमने यह चमत्कार कैसे किया?’ समर बस मुस्कुरा दिया और वहाँ से चला गया। धीरे-धीरे समर ने गाँव के बीमार लोगों के लिए दवाइयाँ, गरीब बच्चों के लिए किताबें और टूटे हुए घरों की मरम्मत के लिए ईंटें बनाना शुरू कर दिया। वह रात के अंधेरे में चुपचाप लोगों की मदद करता ताकि किसी को उसके राज का पता न चले।

लेकिन रहस्य ज्यादा दिनों तक छिपते नहीं हैं। गाँव का एक लालची साहूकार था—धनीराम। धनीराम की नजर हमेशा दूसरों की संपत्ति पर रहती थी। उसने देखा कि अचानक समर के पड़ोसियों के पास नई चीजें कहाँ से आ रही हैं। एक रात उसने समर की खिड़की से झाँक कर देखा। उसने देखा कि समर एक कागज पर सोने के सिक्कों की थैली बना रहा है। जैसे ही पेंसिल की नोक कागज से हटी, सोने के सिक्कों की गूँज कमरे में सुनाई दी। धनीराम की आँखें लालच से चमक उठीं। उसने सोचा, ‘अगर यह पेंसिल मेरे पास हो, तो मैं पूरी दुनिया का सबसे अमीर आदमी बन जाऊँगा।’

अगले दिन जब समर स्कूल गया था, धनीराम चुपके से उसके घर में घुसा और वह जादुई पेंसिल चुरा ली। वह दौड़ता हुआ अपने घर गया और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। उसने एक बड़ा सा कागज फैलाया और उस पर हीरे-जवाहरात का एक बड़ा ढेर बनाना शुरू किया। लेकिन जैसे ही उसने चित्र पूरा किया, कागज से हीरे नहीं निकले, बल्कि काले बिच्छू और सांप निकल आए! धनीराम डर के मारे चिल्लाने लगा। उसने सोचा शायद चित्र ठीक नहीं बना। उसने फिर से सोने के महल का चित्र बनाया, लेकिन इस बार कागज से केवल धुआँ और राख निकली। धनीराम समझ नहीं पा रहा था कि समर के लिए जो पेंसिल वरदान थी, वह उसके लिए अभिशाप क्यों बन गई।

घबराकर धनीराम समर के पास पहुँचा और पेंसिल उसके सामने फेंक दी। ‘यह जादुई पेंसिल नहीं, यह तो राक्षसी पेंसिल है!’ वह चिल्लाया। समर ने शांत भाव से पेंसिल उठाई और पूछा, ‘काका, आपने इससे क्या बनाने की कोशिश की?’ धनीराम ने हिचकिचाते हुए अपनी लालच की बात बताई। समर मुस्कुराया और बोला, ‘काका, इस पेंसिल की शक्ति कलाकार के दिल से जुड़ी है। अगर दिल में लालच और नफरत होगी, तो यह पेंसिल केवल विनाशकारी चीजें ही बनाएगी। यह केवल निस्वार्थ भाव से किए गए कार्यों के लिए ही जादू करती है।’

धनीराम को अपनी गलती का अहसास हुआ, लेकिन उसका लालच पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था। उसने गाँव वालों को भड़काना शुरू कर दिया कि समर के पास कोई जादू टोना है जिससे वह गाँव को खतरे में डाल सकता है। गाँव के कुछ लोग उसकी बातों में आ गए और समर के घर के बाहर इकट्ठा हो गए। समर के पिता डर गए। उन्होंने समर से कहा, ‘बेटा, यह पेंसिल हमारे लिए मुसीबत बन रही है। इसे कहीं फेंक दो।’

समर दुखी हो गया। उसने पेंसिल की ओर देखा। वह पेंसिल अब धीरे-धीरे छोटी हो रही थी। उसे समझ आया कि हर जादू की एक कीमत होती है और एक सीमा भी। तभी अचानक गाँव में एक आपदा आ गई। पहाड़ियों से भारी पत्थर खिसकने लगे और भूस्खलन शुरू हो गया। गाँव के एकमात्र रास्ते पर एक बहुत बड़ा पत्थर गिर गया जिससे लोगों का बाहर निकलना बंद हो गया। ऊपर से और भी पत्थर गिर रहे थे। लोग अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे। समर ने देखा कि गाँव का छोटा सा स्कूल, जहाँ बच्चे पढ़ रहे थे, उस पर एक बड़ी चट्टान गिरने वाली है।

समर ने बिना समय गंवाए पेंसिल उठाई। उसने अपनी पूरी एकाग्रता जुटाई और स्कूल के ऊपर एक बहुत बड़ी और मजबूत ढाल (Shield) का चित्र बनाना शुरू किया। यह उसका अब तक का सबसे कठिन चित्र था। उसका हाथ काँप रहा था और पेंसिल की नोक घिसती जा रही थी। जैसे ही उसने ढाल पूरी की, एक दिव्य रोशनी पूरे गाँव में फैल गई। स्कूल के ऊपर एक पारदर्शी लेकिन अभेद्य कवच बन गया। ऊपर से गिरने वाली चट्टानें उस ढाल से टकराकर चकनाचूर हो गईं। गाँव वाले दंग रह गए। उनकी आँखों के सामने समर ने मौत को मात दी थी।

लेकिन इस महान कार्य के बाद, वह पेंसिल अब केवल एक इंच की बची थी। समर थका हुआ था, लेकिन उसके चेहरे पर एक सुकून था। गाँव वालों ने अपनी गलती के लिए समर से माफी माँगी। धनीराम भी शर्मिंदा होकर वहाँ से चला गया। समर ने देखा कि पेंसिल अब लगभग खत्म हो चुकी है। उसने अंतिम बार उस पेंसिल को हाथ में लिया। उसने सोचा कि वह अपने लिए कुछ माँगे? शायद एक बड़ा घर या बहुत सारा धन? लेकिन फिर उसे गाँव के वे सूखे खेत दिखे जहाँ पानी की कमी के कारण फसलें बर्बाद हो रही थीं।

समर ने कागज के आखिरी टुकड़े पर एक गहरी नहर का चित्र बनाया जो सीधे अलकनंदा नदी से जुड़ती थी। उसने अपनी पूरी जान उस चित्र में झोंक दी। जैसे ही चित्र पूरा हुआ, धरती में एक हलचल हुई और गाँव के बीचों-बीच से शीतल जल की एक धारा बहने लगी। यह एक स्थायी चमत्कार था जिसने पूरे नीलकोट का भविष्य बदल दिया।

अब पेंसिल पूरी तरह से खत्म हो चुकी थी। वह एक साधारण लकड़ी के टुकड़े में बदल गई और फिर हवा में विलीन हो गई। समर थोड़ा उदास हुआ, लेकिन उसे एक बड़ी सीख मिल चुकी थी। उसे समझ आ गया था कि असली जादू पेंसिल में नहीं, बल्कि उसके हाथों के हुनर और उसके इरादों में था।

सालों बीत गए। समर अब एक बड़ा और प्रसिद्ध चित्रकार बन चुका था। उसके पास अब दुनिया के सबसे महंगे रंग और ब्रश थे, लेकिन वह हमेशा अपनी साधारण पेंसिल से ही अभ्यास शुरू करता था। उसने गाँव में एक कला विद्यालय खोला जहाँ वह बच्चों को सिखाता था कि कला केवल कागज पर रंग भरने का नाम नहीं है, बल्कि यह दूसरों के जीवन में रंग भरने का एक माध्यम है।

नीलकोट गाँव अब एक खुशहाल जगह बन चुका था। वह नहर आज भी वहाँ बहती है, जिसे गाँव वाले ‘समर की धारा’ कहते हैं। लोग आज भी उस जादुई पेंसिल की कहानियाँ सुनाते हैं, लेकिन समर जानता था कि जादू पेंसिल के चले जाने के बाद भी उसके भीतर जीवित था। उसे याद आता था कि कैसे उस पेंसिल ने उसे लालच और परोपकार के बीच का अंतर सिखाया था।

एक शाम, समर अपनी गैलरी में बैठा एक चित्र बना रहा था। तभी एक छोटा बच्चा उसके पास आया। उसके हाथ में एक पुराना, टूटा हुआ लकड़ी का टुकड़ा था। बच्चे ने कहा, ‘सर, क्या मैं इससे चित्र बना सकता हूँ? मेरे पास पैसे नहीं हैं।’ समर की आँखों में आँसू आ गए। उसने उस बच्चे को अपने पास बैठाया, उसे एक नया ब्रश दिया और कहा, ‘बेटा, चित्र पेंसिल से नहीं, दिल से बनाए जाते हैं। अगर तुम्हारा इरादा नेक है, तो हर पेंसिल जादुई बन जाएगी।’

समर ने महसूस किया कि उस जादुई पेंसिल का सबसे बड़ा चमत्कार यह नहीं था कि उसने चीजें बनाईं, बल्कि यह था कि उसने एक साधारण लड़के को एक महान इंसान बना दिया। वह समझ गया था कि असली जादुई पेंसिल हमारी मेहनत, हमारी सोच और हमारी करुणा है। जब हम दूसरों के आँसू पोंछने के लिए कुछ करते हैं, तो कुदरत खुद हमारे चित्रों में रंग भरने आ जाती है।

नीलकोट की वादियों में आज भी वह कहानी गूँजती है। कहा जाता है कि आज भी अगर कोई बच्चा निस्वार्थ भाव से गाँव की भलाई के लिए मिट्टी पर कोई चित्र बनाता है, तो वह सच हो जाता है। लोग कहते हैं कि वह जादुई पेंसिल कहीं गई नहीं है, वह आज भी उन बच्चों के हाथों में है जो दुनिया को एक सुंदर जगह बनाना चाहते हैं। समर की वह जादुई पेंसिल अब एक परंपरा बन चुकी थी—एक ऐसी परंपरा जो उम्मीद, साहस और निस्वार्थ प्रेम की प्रतीक थी।

गाँव के उस स्कूल की ढाल तो गायब हो गई थी, लेकिन वहाँ के बच्चों के दिलों में जो सुरक्षा और विश्वास का भाव पैदा हुआ था, वह कभी खत्म नहीं हुआ। समर ने अपनी पूरी जिंदगी में हजारों पेंटिंग्स बनाईं, लेकिन उसके लिए सबसे सुंदर चित्र वही था जो उसने उस दिन गाँव के स्कूल को बचाने के लिए बनाया था। उसे पता था कि कला का असली उद्देश्य केवल प्रशंसा पाना नहीं, बल्कि परिवर्तन लाना है। और यही उस जादुई पेंसिल का अंतिम संदेश था।

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